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	<title>भारतपीडिया - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
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		<title>पार्वती</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;103.206.51.168: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{धर्म प्राथमिक|date=दिसम्बर 2014}}&lt;br /&gt;
{{redirect|गौरी | अन्य | गौरी (बहुविकल्पी)}}&lt;br /&gt;
{{Hdeity infobox| &amp;lt;!--Wikipedia:WikiProject Hindu mythology--&amp;gt;&lt;br /&gt;
 image          = A goddess probably Parvati as Durga riding on a lion present Wellcome V0045026.jpg&lt;br /&gt;
| type           = hindu&lt;br /&gt;
| name           = पार्वती&lt;br /&gt;
| caption         = देवी पार्वती गणेश के साथ &lt;br /&gt;
| devanagari        = पार्वती&lt;br /&gt;
| sanskrit_transliteration = Pārvatī&lt;br /&gt;
| affiliation       = [[देवी]], [[शक्ति]], [[आदि शक्ति]],आदि पराशक्ति&lt;br /&gt;
| god_of          = शक्ति, सुंदरता, सद्भाव, उर्वरता, प्रेम , विवाह, संतति की देवी एवम साक्षात् प्रकृति स्वरूपा,शिवानी (शिव की पटरानी)&lt;br /&gt;
| abode          = [[कैलास पर्वत|कैलाश]] (ससुराल)&lt;br /&gt;
हिमालय (पैतृक घर)&lt;br /&gt;
| mantra          = ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डयै विच्चै॥ ॥ ॐ उमामहेश्वराभ्याम नमः॥&lt;br /&gt;
॥ ॐ गिरिजाय विद्माहे शिवप्रियाय धीमहि तन्नो उमा &lt;br /&gt;
प्रचोद्यात ॥&lt;br /&gt;
॥ ॐ सर्वसमोहन्ये विद्महे विश्वजनन्ये धीमहि तन्नो शक्ति प्रचोद्यात॥&lt;br /&gt;
॥ ॐ नमो देव्ये महादेव्ये शिवाये सततम नमः॥&lt;br /&gt;
॥ ॐ नमः प्रकृत्यः भद्राया नियतः प्रणतास्मितः॥&lt;br /&gt;
| weapon          = त्रिशूल, पाश, गदा, वज्र , आग की कटोरी , शंख, [[चक्र]] भाला, डमरू , खप्पर , कमल , परशु , रस्सी, धनुष बाण, कुंत, मूसल, खड्ग, तलवार, परशु, यम दंड एवं विश्व के समस्त दिव्यास्त्र&lt;br /&gt;
| consort         = [[शिव]]&lt;br /&gt;
| other_names  = [[शक्ति]], [[सती]], [[शिवानी]], [[शाकम्भरी]] , शताक्षी, [[दुर्गा]], [[चंडी|चामुंडा]], [[काली]], आदि पराशक्ति , आदि शक्ति&lt;br /&gt;
| mount          = शेर &lt;br /&gt;
| children      = [[कार्तिकेय]], [[गणेश]], [[अशोकसुन्दरी]] , [[ मनसा देवी ]], [[ज्योति ]], और  [[अय्यप्पा]]( सौतेले पुत्र )  &lt;br /&gt;
|member_of=त्रिदेवी|battles=महिषासुर एवं देवी के महिषासुरमर्दिनी रूप का युद्ध&lt;br /&gt;
चंड मुंड एवं देवी के काली रूप का युद्ध&lt;br /&gt;
धूम्रलोचन एवं देवी के चंडी रूप का युद्ध&lt;br /&gt;
दुर्गामासुर एवं देवी के दुर्गा रूप का युद्ध&lt;br /&gt;
शुंभ निशुंभ एवं देवी के कौशीकी रूप का युद्ध|day=[[सोमवार]] और [[शुक्रवार]]|mother=मैनावती|father=हिमावन|texts=[[वेद]], श्री देवी भागवत पुराण, [[काली पुराण]], तंत्र चुरामणि, देवी महातम्यम, [[रामायण]], श्री दुर्गा सप्तशती, श्री चंडी पाठ, [[शिव महापुराण]], [[विष्णु पुराण]], [[गणेश पुराण]], स्कंद पुराण, उपनिषद, श्री पार्वती महात्मय , श्री माता पार्वती चालीसा, श्री 52 शक्ति पीठ महात्म्य एवं अन्य कई धार्मिक ग्रंथ और किंवदंतियां|festivals=गंगौर, [[महाशिवरात्रि]], दुर्गाष्टमी, [[नवरात्रि]], दुर्गा पूजा, हरितालिका तीज, श्रावण, गौरी पूजन, तीज, काली पूजा, गौरी तृतीय, शीतलाष्टमी,|deity_of=शक्ति, सुंदरता, देवत्व, दिव्य शक्ति, ऊर्जा, सुहाग, सद्भाव, प्रजनन क्षमता, प्रेम , विवाह, संतति की देवी एवम साक्षात् प्रकृति स्वरूपा,शिवानी (शिव की पटरानी), जगजन्नी, जगतमाता, महादेवी|siblings=[[विष्णु]] बड़े भाई  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माता [[गंगा]] बड़ी बहन  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[अदिति]] पूर्व जन्म में माता [[सती]] की बड़ी बहन  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिति पूर्व जन्म में माता [[सती ]] की बड़ी बहन   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कद्रु पूर्व जन्म में माता [[सती ]]की बड़ी बहन&lt;br /&gt;
विनीता पूर्व जन्म में माता [[ सती ]] की बड़ी बहन}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;पार्वती&#039;&#039;&#039;, उमा या गौरी मातृत्व, शक्ति, प्रेम, सौंदर्य, सद्भाव, विवाह, संतान की देवी हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;H.V. Dehejia, Parvati: Goddess of Love, Mapin, {{ISBN|978-8185822594}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;James Hendershot, Penance, Trafford, {{ISBN|978-1490716749}}, pp 78&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref name=suchan&amp;gt;Suresh Chandra (1998), Encyclopedia of Hindu Gods and Goddesses, {{ISBN|978-8176250399}}, pp 245–246&amp;lt;/ref&amp;gt;देवी पार्वती कई अन्य नामों से जानी जाती है, वह सर्वोच्च हिंदू देवी परमेश्वरी [[आदिशक्ति|आदि पराशक्ति]] (शिवशक्ति) की पूर्ण- अवतार या साकार रूप है और [[शाक्त सम्प्रदाय]] या हिन्दू धर्म मे एक उच्चकोटि या प्रमुख देवी है और उनके कई गुण,रूप और पहलू हैं। उनके प्रत्येक पहलुओं को एक अलग नाम के साथ व्यक्त किया जाता है, जिससे उनके भारत की क्षेत्रीय हिंदू कहानियों में 10000 से अधिक नाम मिलते हैं।&amp;lt;ref name=kar6/&amp;gt; लक्ष्मी और सरस्वती के साथ, वह हिंदू देवी-देवताओं (त्रिदेवी) की त्रिमूर्ति का निर्माण करती हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;Frithjof Schuon (2003), Roots of the Human Condition, {{ISBN|978-0941532372}}, pp 32&amp;lt;/ref&amp;gt; माता पार्वती हिंदू भगवान शिव की पत्नी हैं । वह पर्वत राजा [[हिमवान]] और [[रानी मेना]] की बेटी हैं।&amp;lt;ref name=&amp;quot;H.V. Dehejia, Parvati pp 11&amp;quot;&amp;gt;H.V. Dehejia, Parvati: Goddess of Love, Mapin, {{ISBN|978-8185822594}}, pp 11&amp;lt;/ref&amp;gt;पार्वती हिंदू देवी  देवताओं में से  गणेश, [[कार्तिकेय]], [[अशोक सुंदरी|अशोकसुंदरी‌]], [[ज्योति]] और [[मनसा देवी]] की मां और [[अय्यप्पा]] की सौतेली माता  हैं। पुराणों में उन्हें श्री [[विष्णु]] की बहन कहाँ गया है। वे ही मूल प्रकृति और कारणरूपा है। &amp;lt;ref&amp;gt;Edward Washburn Hopkins, {{Google books|-H0eiuvcG5IC|Epic Mythology|page=224}}, pp. 224–226&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref name=wjw295&amp;gt;William J. Wilkins, [https://archive.org/stream/hindumythologyve00inwilk#page/294/mode/2up Uma – Parvati] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160410221315/https://archive.org/stream/hindumythologyve00inwilk#page/294/mode/2up |date=10 अप्रैल 2016 }}, Hindu Mythology – Vedic and Puranic, Thacker Spink London, pp 295&amp;lt;/ref&amp;gt;शिव विश्व के चेतना है तो पार्वती विश्व की ऊर्जा हैं। पार्वती माता जगतजननी अथवा परब्रह्मस्वरूपिणी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==नामवाली==&lt;br /&gt;
[[File:Another view of the ascetic Shiva and the well-dressed Parvati (bazaar art, c.1950&#039;s).jpg|thumb|शिव-पार्वती]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ललिता सहस्रनाम में पार्वती (ललिता के रूप में) के 1,000 नामों की सूची है। &amp;lt;ref&amp;gt;name=kar6&amp;gt;Keller and Ruether (2006), Encyclopedia of Women and Religion in North America, Indiana University Press, {{ISBN|978-0253346858}}, pp 663&amp;lt;/ref&amp;gt; पार्वती के सबसे प्रसिद्ध दो में से एक उमा और अपर्णा हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book|title=India through the ages|url=https://archive.org/details/indiathroughages00mada|last=Gopal|first=Madan|year= 1990| page= [https://archive.org/details/indiathroughages00mada/page/68 68]|editor=K.S. Gautam|publisher=Publication Division, Ministry of Information and Broadcasting, Government of India}}&amp;lt;/ref&amp;gt; स्कन्द पुराण के अनुसार,देवी पार्वती के द्वारा दुर्गमसुर को मारने के बाद देवी पार्वती का नाम दुर्गा पड़ा। उमा नाम का उपयोग सती (शिव की पहली पत्नी, जो पार्वती के रूप में पुनर्जन्म हुआ है) के लिए किया जाता है, रामायण में देवी पार्वती को उमा नाम से भी संबोधित किया गया है,देवी पार्वती को अपर्णा के रूप में संदर्भित किया जाता है (&#039;जो सबका भरण पोषण करती है&#039;)। देवी पार्वती अंबिका (&#039;प्रिय मां&#039;), शक्ति (&#039;शक्ति&#039;), माताजी (&#039;पूज्य माता&#039;), माहेश्वरी (&#039;महान देवी&#039;), दुर्गा (अजेय), भैरवी (&#039;क्रूर&#039;), भवानी (&#039;उर्वरता&#039;) आदि नामों से जानी जाती हैं। पार्वती प्रेम और भक्ति की देवी हैं, या कामाक्षी; प्रजनन, बहुतायत और भोजन / पोषण की देवी अन्नपूर्णा कहा गया है । &amp;lt;ref&amp;gt;Kinsley pp. 142–143&amp;lt;/ref&amp;gt;देवी पार्वती एक क्रूर महाकाली भी है जो तलवार उठाती है, गंभीर सिर की माला पहनती है, और अपने भक्तों की रक्षा करती है और दुनिया और प्राणियों की दुर्दशा करने वाली सभी बुराईयों को नष्ट करती है।&lt;br /&gt;
देवी पार्वती को स्वर्ण, गौरी, काली या श्यामा के रूप में संबोधित किया जाता है, इनका एक शांत रूप गौरी है, तो दूसरा भयंकर रूप काली है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इतिहास में पार्वती==&lt;br /&gt;
[[File:Parvati Statue 3968 (36a).jpg|thumb|देवी पार्वती की इंडोनेशिया के राष्ट्रीय संग्रहालय में मूर्ति]]&lt;br /&gt;
पर्वती शब्द वैदिक साहित्य में प्रयोग नही किया जाता था। इसके बजाय, अंबिका, रुद्राणी का प्रयोग किया गया है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;Kinsley p.36&amp;quot;&amp;gt;Kinsley p.36&amp;lt;/ref&amp;gt; उपनिषद काल (वेदांत काल) के दूसरे प्रमुख उपनिषद [[केनोपनिषद]] में देवी पार्वती का जिक्र मिलता है,वहाँ उन्हें हेमवती उमा नाम से जाना जाता है &amp;lt;ref name=&amp;quot;Kinsley p.36&amp;quot;/&amp;gt;तथा वहां पर उन्हें ब्रह्मविद्या भी जानने को मिलता है और इन्हें दुनिया की माँ की तरह दिखाया गया है।&amp;lt;ref name=johnmuir&amp;gt;John Muir, {{Google books|wNPaeose9K4C|Original Sanskrit Texts on the Origin and History of the People of India|page=422}}, pp 422–436&amp;lt;/ref&amp;gt; यहां देवी पार्वती को सर्वोच्च परब्रह्म की शक्ति, या आवश्यक शक्ति के रूप में प्रकट किया गया है। उनकी प्राथमिक भूमिका एक मध्यस्थ के रूप में है, जो अग्नि, वायु और वरुण को ब्रह्म ज्ञान देती है, जो राक्षसों के एक समूह की हालिया हार के बारे में घमंड कर रहे थे।&amp;lt;ref&amp;gt;&#039;&#039;Kena Upanisad&#039;&#039;, III.1–-IV.3, cited in Müller and in Sarma, pp. &#039;&#039;xxix-xxx&#039;&#039;.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
देवी का सती-पार्वती नाम महाकाव्य काल (400 ईसा पूर्व -400 ईस्वी) में प्रकट होता है,जहाँ वह शिव की पत्नी है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;Kinsley p.36&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
वेबर का सुझाव है कि जैसे शिव विभिन्न वैदिक देवताओं रुद्र और अग्नि का संयोजन है, वैसे ही पुराण पाठ में पार्वती रुद्र की पत्नियों की एक संयोजन है। दूसरे शब्दों में, पार्वती की प्रतीकात्मकता और विशेषताएं समय के साथ उमा, हेमावती, अंबिका,गौरी को एक पहलू में और अधिक क्रूर, विनाशकारी काली, नीरति के रूप में विकसित हुईं।&amp;lt;ref name=johnmuir/&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;Weber in Hindu Mythology, Vedic and Puranic By William J. Wilkins p.239&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;Tate p.176&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शारीरिक रूप और प्रतीक==&lt;br /&gt;
देवी पार्वती को आमतौर पर निष्पक्ष, सुंदर और परोपकारी के रूप में दर्शाया जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;Wilkins pp.247&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;Harry Judge (1993), &#039;&#039;Devi&#039;&#039;, Oxford Illustrated Encyclopedia, Oxford University Press, pp 10&amp;lt;/ref&amp;gt;वह आमतौर पर एक लाल पोशाक (अक्सर एक साड़ी) पहनती है ।और क्रोध अवस्था मे काली के रूप में भी दर्शाया गया है। जब शिव के साथ चित्रित किया जाता है, तो वह आमतौर पर दो भुजाओं के साथ दिखाई देती है, लेकिन जब वह अकेली हो तो उसे चार हाथों में चित्रित किया जा सकता है। इन हाथों में त्रिशूल, दर्पण, माला, फूल (जैसे कमल) हो सकते हैं। प्राचीन मंदिरों में, पार्वती की मूर्ति अक्सर एक बछड़े या गाय के पास चित्रित होती है - भोजन का एक स्रोत। उनकी मूर्ति के लिए कांस्य मुख्य धातु रहा है, जबकि पत्थर आम सामग्री रहा है। &amp;lt;ref name=suchan/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवी पार्वती के अन्य रूप==&lt;br /&gt;
 {{multiple image&lt;br /&gt;
 | direction = horizontal&lt;br /&gt;
 | width1 = 196&lt;br /&gt;
 | width2 = 190&lt;br /&gt;
 | footer = देवी पार्वती दुर्गा के रूप में&lt;br /&gt;
 | image1 = &lt;br /&gt;
 | image2 = Durga idol 2011 Burdwan.jpg&lt;br /&gt;
 }}&lt;br /&gt;
कई हिंदू कहानियां पार्वती के वैकल्पिक पहलुओं को प्रस्तुत करती हैं, जैसे कि क्रूर, हिंसक पहलू। उनका रूप एक क्रोधित, रक्त-प्यासे, उलझे हुए बालों वाली देवी, खुले मुंह वाली और एक टेढ़ी जीभ के साथ किया गया है। इस देवी की पहचान आमतौर पर भयानक [[महाकाली]] (समय) के रूप में की जाती है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;Kinsley p.46&amp;quot; /&amp;gt; लिंग पुराण के अनुसार, पार्वती ने शिव के अनुरोध पर एक असुर (दानव) दारुक को नष्ट करने के लिए अपने नेत्र से काली को प्रकट किया। दानव को नष्ट करने के बाद भी, काली के प्रकोप को नियंत्रित नहीं किया जा सका। काली के क्रोध को कम करने के लिए, शिव उनके पैरों के नीचे जा कर सो गए,जब काली का पैर शिव के छाती पर पड़ा तो काली का जीभ शर्म से बाहर निकल आया, और काली शांत हो गई।&amp;lt;ref&amp;gt;Kennedy p.338&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
स्कंद पुराण में, पार्वती एक योद्धा-देवी का रूप धारण करती हैं और दुर्ग नामक एक राक्षस को हरा देती हैं जो भैंस का रूप धारण करता है। इस पहलू में, उन्हें दुर्गा के नाम से जाना जाता है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;Kinsley p.96&amp;quot;&amp;gt;Kinsley p.96&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
देवी भागवत पुराण के अनुसार, पार्वती अन्य सभी देवियो की वंशावली हैं। इन्हें कई रूपों और नामों के साथ पूजा जाता है। देवी पार्वती का रूप या अवतार उसके भाव पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुर्गा पार्वती का एक भयानक रूप है, और कुछ ग्रंथों में लिखा है कि पार्वती ने दुर्गा के रूप में राक्षस दुर्गमासुर का वध किया था। नवदुर्गा नामक नौ रूपों में दुर्गा की पूजा की जाती है। नौ पहलुओं में से प्रत्येक में पार्वती के जीवन के एक बिंदु को दर्शाया गया है। वह दुर्गा के रूप में भी राक्षस महिषासुर, शुंभ और निशुंभ के वध के लिए भी पूजी जाती हैं। वह बंगाली राज्यों में अष्टभुजा दुर्गा, और तेलुगु राज्यों में कनकदुर्गा के रूप में पूजी जाती हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महाकाली पार्वती का सबसे क्रूर रूप है,यह समय और परिवर्तन की देवी के रूप में, साहस और अंतिम सांसारिक प्रलय का प्रतिनिधित्व करती है। काली, दस महाविद्याओं में से एक देवी हैं,जो नवदुर्गा की तरह हैं जो पार्वती की अवतार हैं। काली को दक्षिण में भद्रकाली और उत्तर में दक्षिणा काली के रूप में पूजा जाता है। पूरे भारत में उन्हें महाकाली के रूप में पूजा जाता है। वह त्रिदेवियों में से एक देवी है और त्रिदेवी का स्रोत भी है। वह परब्रह्म की पूर्ण शक्ति है, क्योंकि वह सभी प्राण ऊर्जाओं की माता है। वह आदिशक्ति का सक्रिय रूप है। वह तामस गुण का प्रतिनिधित्व करती है, और वह तीनो गुणों से परे है, महाकाली शून्य अंधकार का भौतिक रूप है जिसमें ब्रह्मांड मौजूद है, और अंत में महाकाली सबकुछ अपने भीतर घोल लेती है। वह त्रिशक्ति की &amp;quot;क्रिया शक्ति&amp;quot; हैं, और अन्य शक्ति का स्रोत है। वह कुंडलिनी शक्ति है जो हर मौजूदा जीवन रूप के मूल में गहराई से समाया रहता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवी पार्वती का उपनिषद (वेदांत) में वर्णन==&lt;br /&gt;
108 उपनिषदों में से दूसरे सबसे प्रमुख उपनिषद &amp;quot;[[केनोपनिषद]]&amp;quot; के तृतिया और चतुर्थ खण्ड में देवी पार्वती का वर्णन है,यहाँ पर इन्हें हैमवती उमा नाम से पुकारा गया है। &amp;lt;ref name=&amp;quot;Kinsley p.36&amp;quot;/&amp;gt; जहाँ पर वो ब्रह्मविद्या, परब्रह्म की शक्ति और सांसारिक माँ के रूप में दिखाई गई हैं।&amp;lt;ref name=johnmuir&amp;gt;John Muir, {{Google books|wNPaeose9K4C|Original Sanskrit Texts on the Origin and History of the People of India|page=422}}, pp 422–436&amp;lt;/ref&amp;gt; और इनको परब्रह्म और देवो के बीच मे मध्यास्था करते हुए दिखया गया है।&lt;br /&gt;
[[File:Kena Upanishad 1.1 to 1.4 verses, Samaveda, Sanskrit, Devanagari.jpg|thumb|[[केनोपनिषद]] के कुछ पांडुलिपि]]&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;कथा&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
परब्रह्म ने देवताओं को अपने द्वारा विजय दिलवाई । परब्रह्म की उस विजय से देवताओं को अहंकार हो गया । वे समझने लगे कि यह हमारी ही विजय है । हमारी ही महिमा है । यह जानकर परब्रह्म देवताओं के सामने यक्ष के रूप में प्रकट हुए । और वे (देवता) परब्रह्म को ना जान सके कि ‘यह यक्ष कौन है’?&lt;br /&gt;
तब उन्होंने (देवों ने) अग्नि से कहा कि, ‘हे जातवेद ! इसे जानो कि यह यक्ष कौन है’ । अग्नि ने कहा – ‘बहुत अच्छा’। अग्नि यक्ष के समीप गया । परब्रह्म ने अग्नि से पूछा – ‘तू कौन है’ ? अग्नि ने कहा – ‘मैं अग्नि हूँ, मैं ही जातवेदा हूँ’। ऐसे तुझ अग्नि में क्या सामर्थ्य है ?’ अग्नि ने कहा – ‘इस पृथ्वी में जो कुछ भी है उसे जलाकर भस्म कर सकता हूँ’। तब यक्ष ने एक तिनका रखकर कहा कि ‘इसे जला’ । अपनी सारी शक्ति लगाकर भी उस तिनके को जलाने में समर्थ न होकर वह लौट गया । वह उस यक्ष को जानने में समर्थ न हो सका ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब उन्होंने ( देवताओं ने) वायु से कहा – ‘हे वायु ! इसे जानो कि यह यक्ष कौन है’ । वायु ने कहा – ‘बहुत अच्छा’ । वायु यक्ष के समीप गया । उसने वायु से पूछा – ‘तू कौन है’ । वायु ने कहा – ‘मैं वायु हूँ, मैं ही मातरिश्वा हूँ’ । ‘ऐसे तुझ वायु में क्या सामर्थ्य है’ ? वायु ने कहा – ‘इस पृथ्वी में जो कुछ भी है उसे ग्रहण कर सकता हूँ’। तब यक्ष ने एक तिनका रखकर कहा कि ‘इसे ग्रहण कर’ । अपनी सारी शक्ति लगाकर भी उस तिनके को ग्रहण करने में समर्थ न होकर वह लौट गया । वह उस यक्ष को जानने में समर्थ न हो सका ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब उन्होंने (देवताओं ने) इन्द्र से कहा – ‘हे मघवन् ! इसे जानो कि यह यक्ष कौन है’ । इन्द्र ने कहा – ‘बहुत अच्छा’ । इंद्र खुद यक्ष के समीप गया । उसके सामने यक्ष (परब्रह्म) अन्तर्धान हो गए । वह इन्द्र उसी आकाश में अतिशय शोभायुक्त देवी हेमवती उमा (पार्वती) को देखा और उनके पास आ पहुँचा, और उनसे पूछा कि ‘यह यक्ष कौन था’ ॥ देवी पार्वती ने स्पष्ट कहा की– वह यक्ष ‘ब्रह्म है’ । ‘उस ब्रह्म की ही विजय में तुम इस प्रकार महिमान्वित हुए हो’ । तब से ही इन्द्र ने यह जाना कि ‘यह ब्रह्म है’ ।&lt;br /&gt;
इस प्रकार ये देव – जो कि अग्नि, वायु और इन्द्र हैं, अन्य देवों से श्रेष्ठ हुए । उन्होंने ही इस ब्रह्म का समीपस्थ स्पर्श किया और उन्होंने ही सबसे पहले देवी के द्वारा जाना कि ‘यह ब्रह्म है’। इसी प्रकार इन्द्र अन्य सभी देवों से अति श्रेष्ठ हुआ । उसने ही इस ब्रह्म का सबसे समीपस्थ स्पर्श किया । उसने ही सबसे पहले जाना कि ‘यह ब्रह्म है’॥&amp;lt;ref&amp;gt;https://hi.m.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B7%E0%A4%A6&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके अलावा और भी कई उपनिषदों में देवी पार्वती का वर्णन मिलता है जहाँ देवी कुछ अलग नाम से भी जानी जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पूर्वजन्म की कथा ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पार्वती पूर्वजन्म में [[दक्ष प्रजापति]] की पुत्री [[सती]] थीं तथा उस जन्म में भी वे भगवान [[शिव|शंकर]] की ही पत्नी थीं। [[सती]] ने अपने पिता [[दक्ष प्रजापति]] के यज्ञ में, अपने पति का अपमान न सह पाने के कारण, स्वयं को योगाग्नि में भस्म कर दिया था। &lt;br /&gt;
तथा हिमनरेश हिमावन के घर पार्वती बन कर अवतरित हुईं |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पार्वती की तपस्या ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पार्वती को भगवान [[शिव]] को पति के रूप में प्राप्त करने के लिये वन में तपस्या करने चली गईं। अनेक वर्षों तक कठोर उपवास करके घोर तपस्या की तत्पश्चात वैरागी भगवान शिव ने उनसे विवाह करना स्वीकार किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== पार्वती की परीक्षा ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान [[शिव|शंकर]] ने पार्वती के अपने प्रति अनुराग की परीक्षा लेने के लिये सप्तऋषियों को पार्वती के पास भेजा। उन्होंने पार्वती के पास जाकर उसे यह समझाने के अनेक प्रयत्न किये कि शिव जी औघड़, अमंगल वेषधारी और जटाधारी हैं और वे तुम्हारे लिये उपयुक्त वर नहीं हैं। उनके साथ विवाह करके तुम्हें सुख की प्राप्ति नहीं होगी। तुम उनका ध्यान छोड़ दो। किन्तु पार्वती अपने विचारों में दृढ़ रहीं। उनकी दृढ़ता को देखकर [[सप्तर्षि|सप्तऋषि]] अत्यन्त प्रसन्न हुये और उन्हें सफल मनोरथ होने का आशीर्वाद देकर शिव जी के पास वापस आ गये। सप्तऋषियों से पार्वती के अपने प्रति दृढ़ प्रेम का वृत्तान्त सुन कर भगवान शंकर अत्यन्त प्रसन्न हुये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सप्तऋषियों ने शिव जी और पार्वती के विवाह का लग्न मुहूर्त आदि निश्चित कर दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== शिव जी के साथ विवाह ==&lt;br /&gt;
[[File:Shiva&#039;s wedding Nataraja Temple at Chidambaram, Tamil Nadu 2017.jpg|thumb|देवी पार्वती का शिव के साथ विवाह की कलाकृति]]&lt;br /&gt;
निश्चित दिन शिव जी बारात ले कर [[हिमालय]] के घर आये। वे बैल पर सवार थे। उनके एक हाथ में [[त्रिशूल]] और एक हाथ में [[डमरु|डमरू]] था। उनकी बारात में समस्त देवताओं के साथ उनके गण भूत, प्रेत, पिशाच आदि भी थे। सारे बाराती नाच गा रहे थे। सारे संसार को प्रसन्न करने वाली भगवान शिव की बारात अत्यंत मन मोहक थी, ब्रह्मा जी की उपस्थिति में विवाह समारोह शुरू हो गया।&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite web|url=https://www.aajtak.in/religion/story/know-the-beautiful-story-of-marriage-of-lord-shivs-and-parvati-tpral-644303-2019-02-27|title=जानिए भगवान शिव और माता पार्वती की विवाह कथा|website=आज तक|language=hi|access-date=2020-12-22}}&amp;lt;/ref&amp;gt; इस तरह शुभ घड़ी और शुभ मुहूर्त में शिव जी और पार्वती का विवाह हो गया और पार्वती को साथ ले कर शिव जी अपने धाम कैलाश पर्वत पर सुख पूर्वक रहने लगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवी पार्वती को समर्पित त्यौहार==&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;हरतालिका तीज&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
हरतालिका तीज को हरतालिका व्रत या तीजा भी कहते हैं। यह व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हस्त नक्षत्र के दिन होता है। इस दिन कुमारी और सौभाग्यवती स्त्रियाँ गौरी-शंकर की पूजा करती हैं। विशेषकर उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और बिहार में मनाया जाने वाला यह त्योहार करवाचौथ से भी कठिन माना जाता है क्योंकि जहां करवाचौथ में चांद देखने के बाद व्रत तोड़ दिया जाता है वहीं इस व्रत में पूरे दिन निर्जल व्रत किया जाता है और अगले दिन पूजन के पश्चात ही व्रत तोड़ा जाता है।&lt;br /&gt;
सौभाग्यवती स्त्रियां अपने सुहाग को अखण्ड बनाए रखने और अविवाहित युवतियां मन मुताबिक वर पाने के लिए हरितालिका तीज का व्रत करती हैं। इस दिन विशेष रूप से गौरी−शंकर का ही पूजन किया जाता है। इस दिन व्रत करने वाली स्त्रियां सूर्योदय से पूर्व ही उठ जाती हैं और नहा धोकर पूरा श्रृंगार करती हैं। पूजन के लिए केले के पत्तों से मंडप बनाकर गौरी−शंकर की प्रतिमा स्थापित की जाती है। इसके साथ पार्वती जी को सुहाग का सारा सामान चढ़ाया जाता है। रात में भजन, कीर्तन करते हुए जागरण कर तीन बार आरती की जाती है और शिव पार्वती विवाह की कथा सुनी जाती है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://dharm.raftaar.in/religion/hinduism/vrat-katha/hartalika-teej |title=हरतालिका तीज व्रत कथा |author= |date= |work=कथा |publisher=रफ़्तार |accessdate=३ अगस्त २०१६ |archive-url=https://web.archive.org/web/20160801215109/http://dharm.raftaar.in/religion/hinduism/vrat-katha/hartalika-teej |archive-date=1 अगस्त 2016 |url-status=dead }}&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;नवरात्रि&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
पार्वती की श्रद्धा में एक और लोकप्रिय त्योहार [[नवरात्रि]] है, जिसमें नौ दिनों तक उनकी सभी रूपो की पूजा की जाती है। पूर्वी भारत में विशेष रूप से बंगाल, ओडिशा, झारखंड और असम के साथ-साथ भारत के कई अन्य हिस्सों जैसे कि गुजरात में उनके नौ रूप यानी [[शैलपुत्री]], [[ब्रह्मचारिणी]], [[चंद्रघंटा]], [[कुष्मांडा]], [[स्कंदमाता]], [[कात्यायिनी]], [[कालरात्रि]], [[महागौरी]], [[सिद्धिदात्री]] की पूजा की जाती है।&amp;lt;ref&amp;gt;S Gupta (2002), Festivals of India, {{ISBN|978-8124108697}}, pp 68–71&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और भी कई स्थानीय त्यौहार है जो देवी पार्वती को समर्पित है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रमुख मंदिर==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पार्वती अक्सर शिव के साथ पूरे दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के शिव मंदिरों में मौजूद रहती हैं।&lt;br /&gt;
कुछ स्थान जैसे [[शक्ति पीठ]] को उनके ऐतिहासिक महत्व और हिंदू धर्म के प्राचीन ग्रंथों में उनकी उत्पत्ति के बारे में बताया गया है और विशेष माना गया है।&amp;lt;ref name=sleuthold&amp;gt;Steven Leuthold (2011), Cross-Cultural Issues in Art: Frames for Understanding, Routledge, {{ISBN|978-0415578004}}, pp 142–143&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[File:Kamakhya Temple by Vikramjit Kakati.jpg|thumb|कामाख्या शक्तिपीठ मंदिर, असम]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* 51 शक्तिपीठ के नाम&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{इक्यावन शक्तिपीठ}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवी पार्वती भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर==&lt;br /&gt;
{{multiple image&lt;br /&gt;
 | direction = horizontal&lt;br /&gt;
 | width1 = 125&lt;br /&gt;
 | width2 = 154&lt;br /&gt;
 | footer = उमा या दुर्गा की मूर्ति के रूप में देवी पार्वती दक्षिण पूर्व एशिया में पाई गई हैं। 8वीं शताब्दी की पार्वती [[कम्बोडिया]] (बाएं) और 14 वीं शताब्दी की पार्वती [[जावा (द्वीप)]],[[इंडोनेशिया]]&lt;br /&gt;
 | image1 = Uma Kambodscha Rietberg RHI 1.jpg &lt;br /&gt;
 | image2 = Javanese Queen as Parvati.jpg&lt;br /&gt;
 }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देवी पार्वती की प्रतिमा या मूर्तिकला, दक्षिण एशिया के मंदिरों और साहित्य में पाई गई हैं। उदाहरण के लिए, [[कम्बोडिया]] में खमेर के प्रारंभिक शैव शिलालेख, जो पांचवीं शताब्दी ईस्वी के आस पास के समय की है, उनमें पार्वती (उमा) और शिव का उल्लेख है। &amp;lt;ref&amp;gt;Sanderson, Alexis (2004), &amp;quot;The Saiva Religion among the Khmers, Part I.&amp;quot;, Bulletin de Ecole frangaise d&#039;Etreme-Orient, 90–91, pp 349–462&amp;lt;/ref&amp;gt; कई प्राचीन और मध्यकालीन युग के कंबोडियन मंदिर, पत्थर की कला और नदी तल की नक्काशी पाई गई है जो पार्वती और शिव को समर्पित हैं। &amp;lt;ref&amp;gt;Michael Tawa (2001), At Kbal Spean, Architectural Theory Review, Volume 6, Issue 1, pp 134–137&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;Helen Jessup (2008), The rock shelter of Peuong Kumnu and Visnu Images on Phnom Kulen, Vol. 2, National University of Singapore Press, {{ISBN|978-9971694050}}, pp. 184–192&amp;lt;/ref&amp;gt; बोइसेलियर ने [[वियतनाम]] में उमा के साक्ष्य की खोज चम्पा युग के मंदिरों में की है। &amp;lt;ref&amp;gt;[[Jean Boisselier]] (2002), &amp;quot;The Art of Champa&amp;quot;, in Emmanuel Guillon (Editor) – Hindu-Buddhist Art in Vietnam: Treasures from Champa, Trumbull, p. 39&amp;lt;/ref&amp;gt; शिव के साथ पार्वती को उमा के रूप में समर्पित दर्जनों प्राचीन मंदिर [[इंडोनेशिया]] और [[मलेशिया]] के द्वीपों में पाए गए हैं। दुर्गा के रूप में पार्वती का अवतार दक्षिण-पूर्व एशिया में भी पाया गया है।  &amp;lt;ref&amp;gt;Hariani Santiko (1997), The Goddess Durgā in the East-Javanese Period, Asian Folklore Studies, Vol. 56, No. 2 (1997), pp. 209–226&amp;lt;/ref&amp;gt;[[जावा (द्वीप)]] में कई मंदिर शिव-पार्वती को समर्पित हैं जो पहली सहस्राब्दी ईस्वी की दूसरी छमाही से हैं और कुछ बाद की शताब्दियों के।  &amp;lt;ref&amp;gt;R Ghose (1966), [http://hub.hku.hk/bitstream/10722/28763/1/FullText.pdf Saivism in Indonesia during the Hindu-Javanese period] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20141226041451/http://hub.hku.hk/bitstream/10722/28763/1/FullText.pdf |date=26 December 2014 }}, Thesis, Department of History, University of Hong Kong&amp;lt;/ref&amp;gt; माँ दुर्गा के चिह्न और पूजा के साक्ष्य 10 वीं से 13 वीं शताब्दी के बीच की मिली है। &amp;lt;ref&amp;gt;Peter Levenda (2011), Tantric Temples: Eros and Magic in Java, {{ISBN|978-0892541690}}, pp 274&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बाहरी कड़ियाँ ==&lt;br /&gt;
* [https://spiritualworld.co.in/religious-songs-and-vrat-kathayen/hindu-aarti-collection/shri-parwati-ji-ki-aarti-in-hindi-and-english श्री पार्वती जी की आरती]&lt;br /&gt;
* [https://spiritualworld.co.in/religious-songs-and-vrat-kathayen/hindu-aarti-collection/shri-gori-ambey-ji-ki-aarti-in-hindi-and-english श्री गौरी अम्बे जी की आरती]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू देवियाँ]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू धर्म]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== सन्दर्भ==&lt;br /&gt;
{{reflist}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>103.206.51.168</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%80&amp;diff=3588</id>
		<title>वासुकी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%80&amp;diff=3588"/>
		<updated>2021-08-26T12:01:58Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;103.206.51.168: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Kurma, the tortoise incarnation of Vishnu.jpg|right|thumb|300px|समुद्रमन्थन के लिये &#039;&#039;&#039;वासुकी&#039;&#039;&#039; ने रस्सी का काम किया।]]&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;वासुकी&#039;&#039;&#039; प्रसिद्ध [[नाग]] हैं महर्षि   [[कश्यप]] के पुत्र थे जो [[कद्रू]]  के गर्भ से हुए थे । इसकी पत्नी [[शतशीर्षा]] थी। नागधन्वातीर्थ में देवताओं ने इसे नागराज के पद पर अभिषिक्त किया था। [[शिव]] का परम भक्त होने के कारण यह उनके शरीर पर निवास था। जब भगवान [[शिव|शंकर]]  को  ज्ञात हुआ कि नागवंंश का नाश होनेे वाला है  तब भगवाान शिव और  माता पार्वती ने अपनी पुत्री जरत्कारू अर्थात् [[मनसा देवी|मनसा]] का विवाह [[जरत्कारु|जरत्कारू]] के साथ कर दिया और इनके पुुत्र आस्तीक ने  [[जनमेजय]] के [[जनमेजय|नागयज्ञ]] के समय  नागोंं की रक्षा की, नहीं तो नागवंंश उसी समय नष्ट हो गया होता। [[समुद्र मन्थन|समुद्रमंथन]] के समय वासुकी ने पर्वत का बांधने के लिए रस्सी का काम किया था। त्रिपुरदाह के समय वह शिव के [[धनुष]] की डोर बना था। वासुकी के पांंच फण हैंं। वासुकी के बड़े भाई [[शेषनाग]] हैं जो भगवान विष्णु के परम भक्त हैं उन्हें शैय्या के रूप में आराम देते हैं। १००० नागों में [[शेषनाग]] सबसे बड़े भाई हैं , दूसरे स्थान पर [[वासुकी]] और तीसरे स्थान पर [[तक्षक]] हैं ।        &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:पौराणिक पात्र]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू धर्म]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>103.206.51.168</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A4%B8%E0%A4%BE_%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A5%80&amp;diff=2155</id>
		<title>मनसा देवी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A4%B8%E0%A4%BE_%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A5%80&amp;diff=2155"/>
		<updated>2021-08-26T11:29:02Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;103.206.51.168: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{अविश्वसनीय स्रोत|date=फ़रवरी 2015}}&lt;br /&gt;
{{Hdeity infobox &lt;br /&gt;
| type = हिंदू , बुद्ध , जैन , सिख&lt;br /&gt;
| image          = Manasa Devi.jpg&lt;br /&gt;
| name           = मनसा देवी { विषहर माता }&lt;br /&gt;
| caption         = भगवान शिव और माता पार्वती की पुत्री , मनसा  देवी, विषहर मां&lt;br /&gt;
| devanagari        = मनसा देवी&lt;br /&gt;
| sanskrit_transliteration = Mānasā&lt;br /&gt;
| affiliation       = [[नागकन्या]], [[शिव]] और [[पार्वती]]  की  पुत्री&lt;br /&gt;
रूद्रांशी , [[भगवती]]&lt;br /&gt;
| god_of          = [[नाग|नागों]] ,वंश, मातृत्व और विष की देवी ; सभी इच्छापूर्ण करने वाली देवी , [[शिव ]] और [[पार्वती]] की पुत्री&lt;br /&gt;
| abode          =  [[कैलाश]] , [[ नाग लोक ]]&lt;br /&gt;
| mantra          =&lt;br /&gt;
| weapon          = त्रिशूल, चक्र, पाश, खड्ग, सर्प, शंख, वर मुद्रा, अभय मुद्रा&lt;br /&gt;
| consort         = [[जरत्कारु]]&lt;br /&gt;
| other_names  = [[नागकन्या]], [[रुद्रांश]], विषहर , नागेश्वरी , रक्ताम्बरी, मुकुटेश्वरी , विषेश्वरी&lt;br /&gt;
| mount          = कमल , हंस , सिंहासन&lt;br /&gt;
| children        = [[आस्तिक]]&lt;br /&gt;
|Devanagari=मनसा देवी, विषहर महारानी|associate=देवी , शक्ति|script=शिव पुराण, देवी भागवत पुराण, विष्णु पुराण, ऋग वेद, साम वेद, यजुर वेद, अथर्व वेद|father=[[शिव]] (जन्म दाता पिता ), [[कश्यप]] (पालक पिता)|offspring=[[आस्तिक]]|mother=[[पार्वती]] (जन्म दायिनी माता ), [[कद्रु]] (पालक माता) ||symbol=नाग और नागिन का जोड़ा|siblings=गणेश , अशोकसुन्दरी , ज्योति , कार्तिकेय , अय्यपा}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;मनसा&#039;&#039;&#039; देवी को भगवान शिव और माता पार्वती की  पुत्री हैं । इनका प्रादुर्भाव मस्तक से हुआ है इस कारण इनका नाम मनसा पड़ा। [[महाभारत ]]के अनुसार इनका वास्तविक नाम जरत्कारु है और इनके समान नाम वाले पति महर्षि जरत्कारु तथा पुत्र आस्तिक जी हैं। इनके भाई बहन गणेश जी, कार्तिकेय जी , देवी अशोकसुन्दरी , देवी ज्योति और भगवान अय्यपा हैं ,इनके प्रसिद्ध मंदिर एक शक्तिपीठ पर हरिद्वार में स्थापित है।&amp;lt;ref&amp;gt;[http://www.prabhasakshi.com/ShowArticle.aspx?ArticleId=111202-114134-141000 मनसा देवी मंदिर हरिद्वार] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20140606224341/http://www.prabhasakshi.com/ShowArticle.aspx?ArticleId=111202-114134-141000 |date=6 जून 2014 }} मनसा देवी नागों की देवी हैं, उनका मुख्य मंदिर हरिद्वार में है जो शक्तिपीठ पर स्थापित है। नवरात्रि को यहाँ बहुत भीड़ लगती है तथा तीर्थ के साथ ही यह पर्यटन स्थल भी है जो मन में शांति का अनुभव कराने वाला है।&amp;lt;/ref&amp;gt; समय आने पर भगवान शिव ने अपनी पुत्री का  विवाह जरत्कारू के साथ किया और इनके गर्भ से एक तेजस्वी पुत्र हुआ जिसका नाम आस्तिक रखा गया। आस्तिक ने नागों के वंश को नष्ट होने से बचाया। &amp;lt;ref&amp;gt;[http://koiaurhai.blogspot.in/2014/03/mata-mansa.html मनसा] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20140607003803/http://koiaurhai.blogspot.in/2014/03/mata-mansa.html |date=7 जून 2014 }} मनसा  शिव की पुत्री  हैं &amp;lt;/ref&amp;gt; राजा नहुष इनके जीजा लगते हैं | इनके बड़े भाई भगवान कार्तिकेय और  भगवान अय्यपा हैं तथा इनकी बड़ी बहन देवी अशोकसुन्दरी, और देवी ज्योति हैं | भगवान गणेश इनके छोटे भाई हैं |     &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== मूल ==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Manasa-popular.JPG|thumb|300px|मनसा देवी]]&lt;br /&gt;
[[यूनान|ग्रीस]] में भी मनसा नामक देवी का प्रसंग आता है।&amp;lt;ref&amp;gt;[https://en.wikipedia.org/wiki/List_of_Mycenaean_deities List Of Mycenaean deities] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20140819140006/http://en.wikipedia.org/wiki/List_of_Mycenaean_deities |date=19 अगस्त 2014 }} [[लीनियर]] बी में MA-NA-SA&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[http://books.google.com/books?id=GupJUn_xqkkC&amp;amp;pg=PA112&amp;amp;lpg=PA112&amp;amp;dq=Ma-na-sa+minaon&amp;amp;source=bl&amp;amp;ots=gLCRjj9h2_&amp;amp;sig=af-BXFWq8JHIK7NqrddWF_oW0ew&amp;amp;hl=en&amp;amp;sa=X&amp;amp;ei=n78RULbZDai36wGXt4AQ&amp;amp;ved=0CE8Q6AEwAQ#v=onepage&amp;amp;q=Ma-na-sa&amp;amp;f=false The Knossos Labyrinth] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20140702170754/http://books.google.com/books?id=GupJUn_xqkkC&amp;amp;pg=PA112&amp;amp;lpg=PA112&amp;amp;dq=Ma-na-sa+minaon&amp;amp;source=bl&amp;amp;ots=gLCRjj9h2_&amp;amp;sig=af-BXFWq8JHIK7NqrddWF_oW0ew&amp;amp;hl=en&amp;amp;sa=X&amp;amp;ei=n78RULbZDai36wGXt4AQ&amp;amp;ved=0CE8Q6AEwAQ#v=onepage&amp;amp;q=Ma-na-sa&amp;amp;f=false |date=2 जुलाई 2014 }} A New View of the Palace of Minos at Knossos&amp;lt;/ref&amp;gt; इन्हें शिव और पार्वती  की पुत्री तथा  विष की देवी के रूप में भी माना जाता है। 14 वी सदी के बाद इन्हे शिव के परिवार की तरह मंदिरों में आत्मसात किया गया। यह मान्यता भी प्रचलित है कि इन्होने शिव को हलाहल विष के पान के बाद बचाया था, परंतु यह भी कहा जाता है कि मनसा का जन्म [[समुद्र मन्थन|समुद्र मंथन]] के बाद हुआ।&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite web|url=https://www.punjabkesari.in/national/news/do-you-know-the-history-of-mata-mansa-devi-temple-598542|title=माता मनसा देवी मंदिर का इतिहास क्या आप जानते हैं, पौने दो सौ साल पहले हुआ मंदिर का निर्माण|date=2017-03-28|website=punjabkesari|access-date=2021-07-31}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विष की देवी के रूप में इनकी पूजा झारखंड बिहार और बंगाल बड़े धूमधाम से हिन्दी और बंग्ला पंचांग के अनुसार भादो महीने मे पूरी माह इनकी स्तुति होती है ।।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite book |title= 108 दैवीय स्थल|author = टेट, कारेन|coauthors= |year= 2005|publisher= CCC प्रकाशन|location= |isbn= 1-888729-11-2|pages= 194|url= }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इनके सात नामों के जाप से नाग  का भय नहीं रहता।&lt;br /&gt;
ये नाम इस प्रकार है &lt;br /&gt;
जरत्कारु, जगद्गौरी, मनसा, सिद्धयोगिनी, वैष्णवी, नागभगिनी, शैवी, नागेश्वरी, जरत्कारुप्रिया, आस्तिकमाता और विषहरी।&amp;lt;ref&amp;gt;[http://bhartiyelog.blogspot.in/2012/05/with-jaanu-vora-lalitha-nadaraja-ritesh.html मनसा के सात नाम] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20140606221947/http://bhartiyelog.blogspot.in/2012/05/with-jaanu-vora-lalitha-nadaraja-ritesh.html |date=6 जून 2014 }} इसके पाठ से सर्पभय जाता है।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== रूप ==&lt;br /&gt;
[[File:Manasa Devi Linden-Museum SA38226L.jpg|thumb|मनसा देवी आस्तिक को गोद में लिए हुए, 10वीँ सदी [[पाल वंश]], [[बिहार]]।]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनसा देवी मुख्यत: नाग से आच्छादित तथा कमल पर विराजित हैं 7 नाग उनके रक्षण में सदैव विद्यमान हैं। कई बार देवी के चित्रों तथा भित्ति चित्रों में उन्हें एक बालक के साथ दिखाया गया है जिसे वे गोद में लिये हैं, वह बालक देवी का पुत्र [[आस्तिक (ऋषि)|आस्तिक]] है।&amp;lt;ref&amp;gt;[http://www.ashram.org/HealthyLiving/GeneralTips/tabid/1341/articleid/2278/Default.aspx?dnnprintmode=true&amp;amp;mid=4303&amp;amp;SkinSrc=%5BG%5DSkins%2F_default%2FNo+Skin&amp;amp;ContainerSrc=%5BG%5DContainers%2F_default%2FNo+Container मुनि आस्तिक] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20150923175221/http://www.ashram.org/HealthyLiving/GeneralTips/tabid/1341/articleid/2278/Default.aspx?dnnprintmode=true&amp;amp;mid=4303&amp;amp;SkinSrc=%5BG%5DSkins%2F_default%2FNo+Skin&amp;amp;ContainerSrc=%5BG%5DContainers%2F_default%2FNo+Container |date=23 सितंबर 2015 }} इन्होनें ही जन्मेजय के सर्पेष्ठी यज्ञ से सर्पों की रक्षा की थी तथा ये मनसा के पुत्र थे।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== उपाख्यान ==&lt;br /&gt;
=== महाभारत ===&lt;br /&gt;
पाण्डुवंश में [[पाण्डव|पाण्डवों]] में से एक धनुर्धारी [[अर्जुन]] और उनकी द्वितीय पत्नी [[सुभद्रा]] जो श्री [[कृष्ण]] की बहन हैं, उनके पुत्र [[अभिमन्यु]] हुआ जो [[महाभारत]] के युद्ध में मारा गया। अभिमन्यु का पुत्र [[परीक्षित]] हुआ, जिसकी मृत्यु [[तक्षक]] सर्प के काटने से हुई।&amp;lt;ref&amp;gt;[http://hi.brajdiscovery.org/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BF%E0%A4%A4 परीक्षित] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20140606212055/http://hi.brajdiscovery.org/index.php?title=%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BF%E0%A4%A4 |date=6 जून 2014 }} ब्रजडिस्कवरी&amp;lt;/ref&amp;gt; परीक्षित पुत्र [[जन्‍मेजय]] ने अपने छ: भाइयों के साथ प्रतिशोध में सर्प जाति के विनाश के लिये सर्पेष्ठी यज्ञ किया। [[शिव ]] ने अपनी पुत्री  &#039;&#039;&#039;मनसा&#039;&#039;&#039; का विवाह किया तथा उसके पुत्र आस्तिक नें सर्पों को यज्ञ से बचाया।&amp;lt;ref&amp;gt;[http://www.dharmsansar.com/2012_09_01_archive.html नागकुल] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20140606221332/http://www.dharmsansar.com/2012_09_01_archive.html |date=6 जून 2014 }}, इस पृष्ठ में नागकुल का वर्णन है तथा द्वितीय कुल में वासुकि का वर्णन है&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा [[युधिष्ठिर]] ने भी माता मानसा की पूजा की थी जिसके फल स्वरूप वह महाभारत के युद्ध में विजयी हुए। जहाँ युधिष्ठिर ने पूजन किया वहाँ सालवन गाँव में भव्य मंदिर का निर्माण हुआ।&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite web |url=http://www.jagran.com/haryana/karnal-9777681.html |title=सालवन का प्रसिद्ध मंदिर |access-date=6 जून 2014 |archive-url=https://web.archive.org/web/20140606220818/http://www.jagran.com/haryana/karnal-9777681.html |archive-date=6 जून 2014 |url-status=live }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== पुराण ===&lt;br /&gt;
अलग अलग पुराणों में मनसा की अलग अलग किंवदंती है। पुराणों में बताया गया है कि इनका जन्म शिव  के मस्तिष्क से हुआ तथा मनसा किसी भी विष से अधिक शक्तिशाली थी इसलिये ब्रह्मा ने इनका नाम विषहरी रखा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== विष्णु पुराण ===&lt;br /&gt;
[[विष्णु पुराण]] के चतुर्थ भाग में एक नागकन्या का वर्णन है जो आगे चलकर मनसा के नाम से प्रचलित हुई।&amp;lt;ref&amp;gt;[http://bhartiyelog.blogspot.in/2012/05/with-jaanu-vora-lalitha-nadaraja-ritesh.html विष्णुपुराण का वृत्तांत] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20140606221947/http://bhartiyelog.blogspot.in/2012/05/with-jaanu-vora-lalitha-nadaraja-ritesh.html |date=6 जून 2014 }}, विष्णुपुराण में भी मनसा का वर्णन है।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== ब्रह्मवैवर्त पुराण ===&lt;br /&gt;
[[ब्रह्मवैवर्त पुराण]] के अंतर्गत एक नागकन्या थी जो शिव तथा कृष्ण की भक्त थी। उसने कई युगों तक तप किया तथा शिव से [[वेद]] तथा कृष्ण मंत्र का ज्ञान प्राप्त किया जो मंत्र आगे जाकर कल्पतरु मंत्र के नाम से प्रचलित हुआ। उस कन्या ने पुष्कर में तप कर कृष्ण के दर्शन किए तथा उनसे सदैव पूजित होने का वरदान प्राप्त किया।&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite web |url=http://bhartiyelog.blogspot.in/2012/05/with-jaanu-vora-lalitha-nadaraja-ritesh.html |title=ब्रह्मवैवर्तपुराण का वृत्तांत |access-date=6 जून 2014 |archive-url=https://web.archive.org/web/20140606221947/http://bhartiyelog.blogspot.in/2012/05/with-jaanu-vora-lalitha-nadaraja-ritesh.html |archive-date=6 जून 2014 |url-status=dead }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== मंगलकाव्य ===&lt;br /&gt;
[[File:Göttin Manasa in Lehm.jpg|thumb|मनसा की प्रतिमा [[सुन्दरवन]]।]]&lt;br /&gt;
मंगलकाव्य बंगाल में 13वीं तथा 18वीं शताब्दी में लिखित काव्य है जो कई देवताओं के संदर्भ में लिखित हैं। विजयगुप्त का मनसा मंगल काव्य और विप्रदास पिल्ले का मनसाविजय (1495) मनसा के जन्म का वृत्तांत बताते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;मनसाविजय के अनुसार&#039;&#039;&#039; वासुकि नाग की माता नें एक कन्या की प्रतिमा का निर्माण किया जो शिव वीर्य से स्पर्श होते ही एक नागकन्या बन गई, जो मनसा कहलाई। जब शिव ने मनसा को देखा तो वे मोहित हो गए, तब मनसा ने बताया कि वह उनकी बेटी है, शिव मनसा को लेकर कैलाश गए। माता [[पार्वती]] नें जब मनसा को शिव के साथ देखा तब चण्डी रूप धारण कर मनसा के एक आँख को अपने दिव्य नेत्र तेज से जला दिया। मनसा ने ही शिव को हलाहल विष से मुक्त किया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माता पार्वती ने मनसा का विवाह भी खराब किया, मनसा को सर्पवस्त्र पहनने को कहकर कक्ष में एक मेंढक डाल दिया। जगत्कारु भाग गये थे, बाद में जगत्कारु तथा मनसा से आस्तिक का जन्म हुआ।&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite web |url=https://en.wikipedia.org/wiki/Manasa |title=Manasa से |access-date=6 जून 2014 |archive-url=https://web.archive.org/web/20140814022328/http://en.wikipedia.org/wiki/Manasa |archive-date=14 अगस्त 2014 |url-status=live }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== मंदिर ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== मनसा देवी मंदिर, हरिद्वार ===&lt;br /&gt;
[[चित्र:Mansa Devi Temple, Haridwar.JPG|thumb|300px|मनसा देवी मंदिर, हरिद्वार।]]&lt;br /&gt;
यह मंदिर अत्यंत ही प्रसिद्ध है तथा हरिद्वार से 3 किमी की दूरी पर स्थित है।&amp;lt;ref&amp;gt;[https://plus.google.com/app/basic/local/103680883109748834428/about?gl=in&amp;amp;hl=en मनसा देवी मंदिर हरिद्वार] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20140607091708/https://plus.google.com/app/basic/local/103680883109748834428/about?gl=in&amp;amp;hl=en |date=7 जून 2014 }} गूगल प्लस&amp;lt;/ref&amp;gt; यहाँ पर माता शक्तिपीठ पर स्थापित दुख दूर करतीं हैं। यहाँ 3 मंदिर हैं। यहाँ के एक वृक्ष पर सूत्र बाँधा जाता है परंतु मनसा पूर्ण होने के बाद सूत्र निकालना आवश्यक है।&amp;lt;ref&amp;gt;[http://hindi.nativeplanet.com/haridwar/attractions/mansa-devi-temple/ मनसा देवी मंदिर] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20140606233548/http://hindi.nativeplanet.com/haridwar/attractions/mansa-devi-temple/ |date=6 जून 2014 }} हरिद्वार उत्तरांचल&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[http://www.bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A4%B8%E0%A4%BE_%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A5%80_%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B0 मनसा देवी मंदिर] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20140606234612/http://www.bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A4%B8%E0%A4%BE_%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A5%80_%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B0 |date=6 जून 2014 }} भारत डिक्शनरी&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह मंदिर सुबह ८ बजे से शाम ५ बजे तक खुला रहता है। दोपहर में 2 घंटे के लिए १२ से २ तक मंदिर के पट बंद कर दिए जाते है जिसमे माँ मनसा का श्रृंगार और भोग लगता है। मंदिर परिसर में एक पेड़ है जिसपे भक्त मनोकामना पूर्ति के लिए एक पवित्र धागा बांधते है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== मनसा देवी मंदिर, पंचकूला ===&lt;br /&gt;
[[File:A temple in Mansa Devi temple complex, Panchkula near Chandigarh.jpg|right|250px|thumb|300px|मनसा देवी मंदिर के पास पटियाला मंदिर।]]&lt;br /&gt;
माता मनसा [[चण्डीगढ़|चंडीगढ़]] के समीप [[पंचकुला|पंचकूला]] में विराजमान होकर दुख दूर करतीं हैं। यहाँ नवरात्रि में भव्य मेले का आयोजन प्रतिवर्ष होता है, यह 100 एकड़ में फैला विशाल मंदिर है। यह मंदिर सन् 1811-1815 के मध्य राजा गोलासिह द्वारा बनवाया गया था।&amp;lt;ref&amp;gt;[http://hindi.nativeplanet.com/panchkula/attractions/mansa-devi-temple/ पंचकुला, चंडीगढ़] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20140606235719/http://hindi.nativeplanet.com/panchkula/attractions/mansa-devi-temple/ |date=6 जून 2014 }} मनसा मंदिर&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== यातायात सुविधा ===&lt;br /&gt;
चंडीगढ़ बस स्टैंड से लगभग 10 किमी तथा पचकुला बस स्टैंड से 4 किमी की दुरी पर स्तिथ , मनसा देवी मंदिर में बसों या ऑटो रिक्शा से पहुंचा जा सकता है ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नवरात्री के दिनों में यह  यात्रियों के आने जाने का विशेष प्रबंध चंडीगढ़ परिवहन द्वारा किया जाता है यदि आप लोग रेल से यात्रा के बारे में सोच रहे है तो यह उसका भी उचित व्यवस्था है । चंडीगढ़ -कालका रेल लाइन यह आपको हमेशा ही उपलब्ध मिलेगी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== इन्हें भी देखें ==&lt;br /&gt;
* [[शिव]]&lt;br /&gt;
* [[पार्वती]]&lt;br /&gt;
* [[कश्यप]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== सन्दर्भ ==&lt;br /&gt;
{{reflist|30em}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बाहरी कड़ियाँ ==&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20140527093129/http://www.mansadevi.nic.in/ मनसादेवी डॉट एनआइसी डॉट इन]&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20140606215606/http://rajkamal.jagranjunction.com/2011/04/11/%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A5%80-%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A4%B8%E0%A4%BE-%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5/ यात्रा माता श्री मनसा देवी जी की।] &lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20140606215837/http://girirajbaba.com/hplaceinfo.aspx?ID=Gy9kTd80D98lld मुकुट मुखारविंद।]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{शैव धर्म}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू देवियाँ]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू धर्म]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>103.206.51.168</name></author>
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		<title>शुक्राचार्य</title>
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		<updated>2021-08-17T11:54:18Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;103.206.51.168: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Shukra cropped.jpg|right|thumb|250px|शुक्र ग्रह के रूप में शुक्राचार्य की मूर्ति]]&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;असुराचार्य&#039;&#039;&#039;, [[भृगु|भृगु ऋषि]] तथा [[दिव्या]] के पुत्र जो &#039;&#039;&#039;शुक्राचार्य&#039;&#039;&#039; के नाम से अधिक विख्यात हैं। इनका जन्म का नाम &#039;शुक्र उशनस&#039; है। [[पुराण|पुराणों]] के अनुसार यह [[असुर|असुरों]] ( [[दैत्य]] , [[दानव]] और [[राक्षस]] )  के [[गुरु]] तथा [[पुरोहित]] थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कहते हैं, भगवान के [[वामनावतार]] में तीन पग भूमि प्राप्त करने के समय, यह [[राजा बलि]] की झारी (सुराही) के मुख में जाकर बैठ गए थे और वामनावतार द्वारा दर्भाग्र (कुशा) से सुराही को साफ करने की क्रिया में इनकी एक आँख फूट गई थी। इसीलिए यह &amp;quot;एकाक्ष&amp;quot; भी कहे जाते थे। आरंभ में इन्होंने [[अंगिरा|अंगिरस]] ऋषि का शिष्यत्व ग्रहण किया किंतु जब वह अपने पुत्र के प्रति पक्षपात दिखाने लगे तब इन्होंने [[शिव|शंकर]] की आराधना कर भगवान शंकर से मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त की जिसके प्रयोग से उन्हें युद्ध में मृत्यु होने पर मृत योद्धा को पुनः जीवित करने की शक्ति प्राप्त थी। इसी कारण [[देवासुर संग्राम]] में असुर अनेक बार जीते। इन्होंने एक हजार अध्यायों वाले &amp;quot;बार्हस्पत्य शास्त्र&amp;quot; की रचना की। &#039;गो&#039; और &#039;जयन्ती&#039; नाम की इनकी दो पत्नियाँ थीं। असुरों के आचार्य होने के कारण ही इन्हें &#039;असुराचार्य&#039; या शुक्राचार्य कहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक पौराणिक कथा के अनुसार महर्षि शुक्राचार्य ने भगवान शिव की घोर तपस्या की थी और उनसे मृतसंजीवनी मंत्र प्राप्त किया था, जिस मंत्र का प्रयोग उन्होंने देवासुर संग्राम में देवताओं के विरुद्ध किया था जब असुर देवताओं द्वारा मारे जाते थे, तब शुक्राचार्य उन्हें मृतसंजीवनी विद्या का प्रयोग करके जीवित कर देते थे। यह विद्या अति गोपनीय ओर कष्टप्रद साधनाओं से सिद्ध होती है।उनकी असली समाधी बेट  कोपरगाव में है। और उसे देखने के लिये लोग आते है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मृतसंजीवनी विद्या (परिचय व शोध):- by: Dr.R.B.Dhawan (Shukracharya)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विनियोग - अस्य श्रीमृत्संजीवनी मंत्रस्य शुक्र ऋषि:, गायत्री छ्न्द:, मृतसंजीवनी देवता, ह्रीं बीजं, स्वाहा शक्ति:, हंस: कीलकं मृतस्य संजीवनार्थे विनियोग:।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मृतसंजीवनी महामंत्र :- ॐ ह्री हंस: संजीवनी जूं हंस: कुरू कुरू कुरू सौ: सौ: हसौ: सहौ: सोsहं हंस: स्वाहा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== इन्हें भी देखें==&lt;br /&gt;
*[[शुक्रनीति]]&lt;br /&gt;
*[[देवगुरु बृहस्पति|बृहस्पति]] - देवताओं के गुरु&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{ऋषि}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू धर्म]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>103.206.51.168</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A4%BF&amp;diff=4721</id>
		<title>दक्ष प्रजापति</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://hi.bharatpedia.org/w/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A4%BF&amp;diff=4721"/>
		<updated>2021-08-10T12:55:39Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;103.206.51.168: /* सन्तान तथा उनके विवाह */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{हिन्दू देवी देवता ज्ञानसन्दूक &lt;br /&gt;
|  image          = Virabhadra Daksha.jpg&lt;br /&gt;
| caption         = शिवांश भगवान [[वीरभद्र]] और [[बकरा|बकरे]] के सिर के साथ दक्ष&lt;br /&gt;
| name           = प्रजापति दक्ष&lt;br /&gt;
| devanagari        = {{lang|sa|दक्ष}}&lt;br /&gt;
| sanskrit_transliteration = दक्ष&lt;br /&gt;
| affiliation       = [[ब्रह्मा|प्रजापति]]&lt;br /&gt;
| god_of          = राजाओं के देवता&lt;br /&gt;
| abode          = [[ब्रह्मलोक]]&lt;br /&gt;
| mantra          =&lt;br /&gt;
| weapon          = [[तलवार]]&lt;br /&gt;
| father         = [[ब्रह्मा]]&lt;br /&gt;
| mother          = [[सरस्वती]]&lt;br /&gt;
| siblings       = [[सनकादि ऋषि]] तथा [[नारद मुनि]]&lt;br /&gt;
| consort         = [[प्रसूति]]&lt;br /&gt;
| mount          = [[बाज़|बाज]]&lt;br /&gt;
| planet          = &lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दक्ष प्रजापति को अन्य प्रजापतियों के समान ब्रह्माजी ने अपने मानस पुत्र के रूप में उत्पन्न किया था। दक्ष प्रजापति का विवाह मनु स्वायम्भुव मनु की तृतीय कन्या प्रसूति के साथ हुआ था। दक्ष राजाओं के देवता थे।  शिव पुराण के अनुसार दक्ष को जब बकरे का सिर प्राप्त होता है तब बाद में वह अपनी पत्नी प्रसूति के साथ काशी में महामृत्युंजय का मंत्र जप ते हुए प्रायश्चित  करते है जब माता पार्वती का विवाह शिवजी से संपन्न होता है तब उनकी बारात कैलाश जाती है उस समय माता पार्वती भगवान शिव से आग्रह  करती है कि काशी चलिए फिर वह दोनों काशी  जाते हैं पार्वती वहां पर अपने पिछले जन्म के माता-पिता  दक्ष प्रजापति और प्रसूति को मिलती है और उनसे आशीर्वाद प्राप्त  करती है अपने पिछले जन्म के ऋण मुक्ति के लिए वह महादेव से प्रार्थना करती हैं कि मेरे माता-पिता को क्षमा कर दीजिए पार्वती की बात मानकर शिवजी प्रजापति दक्ष को उनका पूर्वमनुष्य मुख दे देते हैं फिर प्रस्तुति माता पार्वती को शिव समेत दारुकवान जाने का आग्रह करती हैं फिर शिव पार्वती  के साथ दारुकवन  जाते हैं फिर शिव  वहां के   साधुओं का घमंड तोड़ कर कैलाश  जाते हैं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== सन्तान तथा उनके विवाह ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[ब्रह्मा]]जी के पुत्र दक्ष प्रजापति का विवाह [[मनु|स्वायम्भुव मनु]] की पुत्री [[प्रसूति]] से हुआ था।&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीमद्भागवतमहापुराण (सटीक), गीताप्रेस गोरखपुर, 4-1-47.&amp;lt;/ref&amp;gt; प्रसूति ने सोलह कन्याओं को जन्म दिया जिनमें से &lt;br /&gt;
# स्वाहा नामक एक कन्या का [[अग्नि देव]] के साथ&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीमद्भागवतमहापुराण, पूर्ववत्-4-1-60.&amp;lt;/ref&amp;gt;,&lt;br /&gt;
# [[स्वधा]] नामक एक कन्या का पितृगण के साथ&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीमद्भागवतमहापुराण, पूर्ववत्-4-1-63.&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[सती]] नामक एक कन्या का भगवान [[शिव|शंकर]] के साथ&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीमद्भागवतमहापुराण, पूर्ववत्-4-1-65.&amp;lt;/ref&amp;gt; और शेष तेरह कन्याओं का [[धर्म]] के साथ विवाह हुआ। धर्म की पत्नियों के नाम थे- श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, ह्री और मूर्ति।&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीमद्भागवतमहापुराण, पूर्ववत्-4-1-49.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===कन्याएँ===&lt;br /&gt;
[[विष्णु पुराण|विष्णुपुराण]] और [[पद्म पुराण|पद्मपुराण]] के अनुसार दक्ष की कुल २४ कन्याएँ थीं, जिनके नाम निम्नलिखित हैं-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
# श्रद्धा&lt;br /&gt;
# भक्ति&lt;br /&gt;
# धृति&lt;br /&gt;
# तुष्टि&lt;br /&gt;
#पुष्टि&lt;br /&gt;
# मेधा&lt;br /&gt;
# क्रिया&lt;br /&gt;
# बुद्धिका&lt;br /&gt;
# लज्जा गौरी&lt;br /&gt;
# वपु&lt;br /&gt;
# शान्ति&lt;br /&gt;
# सिद्धिका&lt;br /&gt;
# कीर्ति&lt;br /&gt;
# ख्याति&lt;br /&gt;
# सती&lt;br /&gt;
# सम्भूति&lt;br /&gt;
# स्मृति&lt;br /&gt;
# प्रीति&lt;br /&gt;
# क्षमा&lt;br /&gt;
# सन्नति&lt;br /&gt;
# अनुसूया&lt;br /&gt;
# ऊर्जा&lt;br /&gt;
# स्वाहा&lt;br /&gt;
# स्वधा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== सती का जन्म, विवाह तथा दक्ष-शिव-वैमनस्य ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दक्ष के प्रजापति बनने के बाद ब्रह्मा ने उसे एक काम सौंपा जिसके अंतर्गत शिव और शक्ति का मिलाप करवाना था। उस समय शिव तथा शक्ति दोनों अलग थे। इसीलिये ब्रह्मा जी ने दक्ष से कहा कि वे तप करके शक्ति माता (परमा पूर्णा प्रकृति जगदम्बिका) को प्रसन्न करें तथा पुत्री रूप में प्राप्त करें।&amp;lt;ref&amp;gt;देवीपुराण [महाभागवत]-शक्तिपीठांक  (सटीक), गीताप्रेस गोरखपुर, 4-4से6.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
तपस्या के उपरांत माता शक्ति ने दक्ष से कहा,&amp;quot;मैं आपकी पुत्री के रूप में जन्म लेकर शम्भु की भार्या बनूँगी। जब आप की तपस्या का पुण्य क्षीण हो जाएगा और आपके द्वारा मेरा अनादर होगा तब मैं अपनी माया से जगत् को विमोहित करके अपने धाम चली जाऊँगी।&amp;lt;ref&amp;gt;देवीपुराण [महाभागवत]-शक्तिपीठांक  (सटीक), गीताप्रेस गोरखपुर, 4-16से20.&amp;lt;/ref&amp;gt; इस प्रकार&lt;br /&gt;
सती के रूप में शक्ति का जन्म हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रजापति दक्ष का भगवान् शिव से मनोमालिन्य होने के कारण रूप में तीन मत हैं। एक मत के अनुसार प्रारंभ में ब्रह्मा के पाँच सिर थे। ब्रह्मा अपने तीन सिरों से वेदपाठ करते तथा दो सिर से [[वेद]] को गालियाँ भी देते जिससे क्रोधित हो शिव ने उनका एक सिर काट दिया। ब्रह्मा दक्ष के पिता थे। अत: दक्ष क्रोधित हो गया और शिव से बदला लेने की बात करने लगा। लेकिन यह मत अन्य प्रामाणिक संदर्भों से खंडित हो जाता है। श्रीमद्भागवतमहापुराण में स्पष्ट वर्णित है कि जन्म के समय ही ब्रह्मा के चार ही सिर थे।&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीमद्भागवतमहापुराण (सटीक), गीताप्रेस गोरखपुर, 3-8-16.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरे मत के अनुसार शक्ति द्वारा स्वयं भविष्यवाणी रूप में दक्ष से स्वयं के भगवान शिव की पत्नी होने की बात कह दिये जाने के बावजूद दक्ष शिव को सती के अनुरूप नहीं मानते थे। इसलिए उन्होंने सती के विवाह-योग्य होने पर उनके लिए स्वयंवर का आयोजन किया तथा उसमें शिव को नहीं बुलाया। फिर भी सती ने &#039;शिवाय नमः&#039; कहकर वरमाला पृथ्वी पर डाल दी और वहाँ प्रकट होकर भगवान् शिव ने वरमाला ग्रहण करके सती को अपनी पत्नी बनाकर कैलाश चले गये। इस प्रकार अपनी इच्छा के विरुद्ध अपनी पुत्री सती द्वारा शिव को पति चुनने के कारण दक्ष शिव को पसंद नहीं करते थे।&amp;lt;ref&amp;gt;देवीपुराण [महाभागवत]-शक्तिपीठांक  (सटीक), गीताप्रेस गोरखपुर, 4-46से61.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीसरा मत सर्वाधिक प्रचलित है। इसके अनुसार प्रजापतियों के एक यज्ञ में दक्ष के पधारने पर सभी देवताओं ने उठकर उनका सम्मान किया, परंतु ब्रह्मा जी के साथ शिवजी भी बैठे ही रहे। शिव को अपना जामाता अर्थात् पुत्र समान होने के कारण उनके द्वारा खड़े होकर आदर नहीं दिये जाने से दक्ष ने अपना अपमान महसूस किया और उन्होंने शिव के प्रति कटूक्तियों का प्रयोग करते हुए अब से उन्हें यज्ञ में देवताओं के साथ भाग न मिलने का शाप दे दिया।&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीमद्भागवतमहापुराण (सटीक), गीताप्रेस गोरखपुर, 4-2-4से18.&amp;lt;/ref&amp;gt; इस प्रकार इन दोनों का मनोमालिन्य हो गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== सती का आत्मदाह ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उक्त घटना के बाद प्रजापति दक्ष ने अपनी राजधानी [[कनखल]] में एक विराट यज्ञ का आयोजन किया&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीलिंगमहापुराण (सटीक), गीताप्रेस गोरखपुर, संस्करण-2014, पूर्वभाग, 100-7; पृष्ठ-530.&amp;lt;/ref&amp;gt;, जिसमें उन्होंने अपने जामाता शिव और पुत्री सती को यज्ञ में आने हेतु निमंत्रित नहीं किया।&lt;br /&gt;
शंकर जी के समझाने के बाद भी सती अपने पिता के उस यज्ञ में बिना बुलाये ही चली गयी। यज्ञस्थल में दक्ष प्रजापति ने सती और शंकर जी का घोर निरादर किया। अपमान न सह पाने के कारण सती ने तत्काल यज्ञस्थल में ही योगाग्नि से स्वयं को भस्म कर दिया। सती की मृत्यु का समाचार पाकर भगवान् शंकर ने [[वीरभद्र]] को उत्पन्न कर उसके द्वारा उस यज्ञ का विध्वंस करा दिया। वीरभद्र ने पूर्व में भगवान् शिव का विरोध तथा उपहास करने वाले देवताओं तथा ऋषियों को यथायोग्य दण्ड देते हुए दक्ष प्रजापति का सिर भी काट डाला। बाद में ब्रह्मा जी के द्वारा प्रार्थना किये जाने पर भगवान् शंकर ने दक्ष प्रजापति को उसके सिर के बदले में बकरे का सिर प्रदान कर उसके यज्ञ को सम्पन्न करवाया।&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीमद्भागवतमहापुराण, पूर्ववत्-स्कन्ध-4, अध्याय-3से7.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== दक्ष-यज्ञ-विध्वंस : कथा-विकास के चरण ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दक्ष-यज्ञ-विध्वंस की कथा के विकास के स्पष्टतः तीन चरण हैं। इस कथा के प्रथम चरण का रूप महाभारत के शांतिपर्व में है।&amp;lt;ref&amp;gt;महाभारत (सटीक), गीताप्रेस गोरखपुर, खण्ड-5, शान्तिपर्व, अध्याय-284.&amp;lt;/ref&amp;gt; कथा के इस प्राथमिक रूप में भी दक्ष का यज्ञ कनखल में हुआ था इसका समर्थन हो जाता है। यहाँ कनखल में यज्ञ होने का स्पष्ट उल्लेख तो नहीं है, परंतु गंगाद्वार के देश में यज्ञ होना उल्लिखित है&amp;lt;ref&amp;gt;महाभारत (सटीक), गीताप्रेस गोरखपुर, खण्ड-5, शान्तिपर्व-284-3.&amp;lt;/ref&amp;gt; और कनखल गंगाद्वार (हरिद्वार) के अंतर्गत ही आता है। इस कथा में दक्ष के यज्ञ का विध्वंस तो होता है परंतु सती भस्म नहीं होती है। वस्तुतः सती कैलाश पर अपने पति भगवान शंकर के पास ही रहती है और अपने पिता दक्ष द्वारा उन्हें निमंत्रण तथा यज्ञ में भाग नहीं दिये जाने पर अत्यधिक व्याकुल रहती है। उनकी व्याकुलता के कारण शिवजी अपने मुख से&amp;lt;ref&amp;gt;महाभारत (सटीक), गीताप्रेस गोरखपुर, खण्ड-5, शान्तिपर्व-284-29.&amp;lt;/ref&amp;gt; वीरभद्र को उत्पन्न करते हैं और वह गणों के साथ जाकर यज्ञ का विध्वंस कर डालता है। परंतु, न तो वीरभद्र दक्ष का सिर काटता है और न ही उसे भस्म करता है। स्वाभाविक है कि बकरे का सिर जोड़ने का प्रश्न ही नहीं उठता है। वस्तुतः इस कथा में &#039;यज्ञ&#039; का सिर काटने अर्थात् पूरी तरह &#039;यज्ञ&#039; को नष्ट कर देने की बात कही गयी है&amp;lt;ref&amp;gt;महाभारत (सटीक), गीताप्रेस गोरखपुर, खण्ड-5, शान्तिपर्व-284-50.&amp;lt;/ref&amp;gt;, जिसे बाद की कथाओं में &#039;दक्ष&#039; का सिर काटने से जोड़ दिया गया। इस कथा में दक्ष 1008 नामों के द्वारा शिवजी की स्तुति करता है और भगवान् शिव प्रसन्न होकर उन्हें वरदान देते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस कथा के विकास के दूसरे चरण का रूप [[भागवत पुराण|श्रीमद्भागवत]] महापुराण&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीमद्भागवतमहापुराण, पूर्ववत, स्कन्ध-4,अध्याय-2 से 7.&amp;lt;/ref&amp;gt; से लेकर शिव पुराण&amp;lt;ref&amp;gt;शिवपुराण, रुद्रसंहिता, द्वितीय (सती) खण्ड।&amp;lt;/ref&amp;gt; तक में वर्णित है। इसमें सती हठपूर्वक यज्ञ में सम्मिलित होती है तथा कुपित होकर योगाग्नि से भस्म भी हो जाती है। स्वाभाविक है कि जब सती योगाग्नि में भस्म हो जाती है तो उनकी लाश कहां से बचेगी ! {{पुराणमित्येव न साधु सर्वं&lt;br /&gt;
न चाऽपि काव्यं नवमित्यवद्यम्।&lt;br /&gt;
सन्तः परीक्ष्यान्यतरत् भजन्ते&lt;br /&gt;
मूढ्ः परप्रत्ययनेयबुद्धिः ॥}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
-मालविकाग्निमित्रम् (महाकवि कालिदास)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{English Meaning of Sanskrit Phrase:&lt;br /&gt;
All poems are not good only because they are old. All poems are not bad because they are new. Good and wise people examine both and decide whether a poem is good or bad. Only a fool will be blindly led by what others say.}} &lt;br /&gt;
-Malavikaagnimitram (Great Poet Kaalidaas)इसलिए उनकी लाश लेकर शिवजी के भटकने आदि का प्रश्न ही नहीं उठता है। ऐसा कोई संकेत कथा के इस चरण में नहीं मिलता है। इस कथा में वीरभद्र शिवजी की जटा से उत्पन्न होता है&amp;lt;ref&amp;gt;श्रीमद्भागवतमहापुराण, पूर्ववत-4-5-2.&amp;lt;/ref&amp;gt; तथा दक्ष का सिर काट कर जला देता है। परिणामस्वरूप उसे बकरे का सिर जोड़ा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कथा के विकास के तीसरे चरण का रूप [[देवीभागवत पुराण|देवीपुराण]] (महाभागवत) जैसे उपपुराण में वर्णित हुआ है।&amp;lt;ref&amp;gt;देवीपुराण [महाभागवत]-शक्तिपीठांक (सटीक), गीताप्रेस गोरखपुर, अध्याय-9 से 11.&amp;lt;/ref&amp;gt; जिसमें सती जल जाती है और दक्ष के यज्ञ का वीरभद्र द्वारा विध्वंस भी होता है। यहाँ वीरभद्र शिवजी के तीसरे नेत्र से उत्पन्न होता है&amp;lt;ref&amp;gt;देवीपुराण [महाभागवत], पूर्ववत-10-10.&amp;lt;/ref&amp;gt; तथा दक्ष का सिर भी काटा जाता है। फिर स्तुति करने पर शिव जी प्रसन्न होते हैं और दक्ष जीवित भी होता है तथा वीरभद्र उसे बकरे का सिर जोड़ देता है। परंतु, यहाँ पुराणकार कथा को और आगे बढ़ाते हैं तथा बाद में भगवान शिव को पुनः सती की लाश सुरक्षित तथा देदीप्यमान रूप में यज्ञशाला में ही मिल जाती है।&amp;lt;ref&amp;gt;देवीपुराण [महाभागवत], पूर्ववत-11-46.&amp;lt;/ref&amp;gt; तब उस लाश को लेकर शिवजी विक्षिप्त की तरह भटकते हैं और भगवान् विष्णु क्रमशः खंड-खंड रूप में चक्र से लाश को काटते जाते हैं। इस प्रकार लाश के विभिन्न अंगों के विभिन्न स्थानों पर गिरने से 51 शक्ति पीठों का निर्माण होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;देवीपुराण [महाभागवत], पूर्ववत-12-29.&amp;lt;/ref&amp;gt; स्पष्ट है कि कथा के इस तीसरे रूप में आने तक में सदियों या सहस्राब्दियों का समय लगा होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== शक्तिपीठ ===&lt;br /&gt;
इस तरह सती के शरीर का जो हिस्सा और धारण किये आभूषण जहाँ-जहाँ गिरे वहाँ-वहाँ [[शक्ति पीठ]] अस्तित्व में आ गये। शक्तिपीठों की संख्या विभिन्न ग्रंथों में भिन्न-भिन्न बतायी गयी है। तंत्रचूड़ामणि में शक्तिपीठों की संख्या 52 बताई गयी है। देवीभागवत में 108 शक्तिपीठों का उल्लेख है, तो देवीगीता में 72 शक्तिपीठों का जिक्र मिलता है। देवीपुराण में 51 शक्तिपीठों की चर्चा की गयी है। परम्परागत रूप से भी देवीभक्तों और सुधीजनों में 51 शक्तिपीठों की विशेष मान्यता है।&amp;lt;ref&amp;gt;देवीपुराण [महाभागवत], पूर्ववत, पृ०-36.&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== इन्हें भी देखें ==&lt;br /&gt;
* [[सती]]&lt;br /&gt;
* [[शिव]]&lt;br /&gt;
* [[ब्रह्मा]]&lt;br /&gt;
* [[शक्ति पीठ|शक्तिपीठ]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== सन्दर्भ ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:धर्म]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू धर्म]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:धर्म ग्रंथ]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:पौराणिक कथाएँ]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>103.206.51.168</name></author>
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		<title>वीरभद्र</title>
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		<updated>2021-07-14T07:08:46Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;103.206.51.168: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[File:Veerabhadra.jpg|right|thumb|200px|वीरभद्र की एक मूर्ति]]&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;वीरभद्र&#039;&#039;&#039; हिंदू पौराणिक कथाओं के एक पात्र हैं और कथाओं के अनुसार यह शिव के एक बहादुर गण थे और प्रथम अवतार थे  जिन्होने [[शिव]] के आदेश पर [[दक्ष प्रजापति|दक्ष]] प्रजापति का सर धड़ से अलग कर दिया। [[देवसंहिता]] और [[स्कन्द पुराण|स्कंद पुराण]] के अनुसार शिव ने अपनी जटा से &#039;[[वीरभद्र]]&#039; नामक गण उत्पन्न किया। [[देवसंहिता]] गोरख सिन्हा द्वारा मद्य काल में लिखा हुआ संस्कृत श्लोकों का एक संग्रह है जिसमे [[जाट]] जाति का जन्म, कर्म एवं जाटों की उत्पति का उल्लेख [[शिव]] और [[पार्वती]] के संवाद के रूप में किया गया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[ठाकुर देशराज]]&amp;lt;ref&amp;gt;[[ठाकुर देशराज]]: जाट इतिहास, [[सूरज मल|महाराजा सूरजमल]] स्मारक शिक्षा संस्थान, [[दिल्ली]], 1934, पेज 87-88. &amp;lt;/ref&amp;gt;लिखते हैं कि जाटों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में एक मनोरंजक कथा कही जाती है। [[शिव|महादेवजी]] के श्वसुर राजा [[दक्ष प्रजापति|दक्ष]] ने यज्ञ रचा और अन्य प्रायः सभी देवताओं को तो यज्ञ में बुलाया पर न तो [[शिव|महादेवजी]] को ही बुलाया और न ही अपनी पुत्री [[सती]] को ही निमंत्रित किया। पिता का यज्ञ समझ कर [[सती]] बिना बुलाए ही पहुँच गयी, किंतु जब उसने वहां देखा कि न तो उनके पति का भाग ही निकाला गया है और न उसका ही सत्कार किया गया इसलिए उसने वहीं प्राणांत कर दिए। [[शिव|महादेवजी]] को जब यह समाचार मिला, तो उन्होंने दक्ष और उसके सलाहकारों को दंड देने के लिए अपनी जटा से &#039;[[वीरभद्र]]&#039; नामक गण उत्पन्न किया। [[वीरभद्र]] ने अपने अन्य साथी गणों के साथ आकर [[दक्ष प्रजापति|दक्ष]] का सर काट लिया और उसके साथियों को भी पूरा दंड दिया।&lt;br /&gt;
वीरभद्र के 6 पुत्र हुए &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1.पोनभद्र ; पूनिया&lt;br /&gt;
2.क्ल्हनभद्र ;कल्हण&lt;br /&gt;
3.अतिसुरभद्र ; आंजना&lt;br /&gt;
4.जखभद्र ; जाखड&lt;br /&gt;
5.ब्रह्मभद्र ; भीमरौलिया&lt;br /&gt;
6.दहीभद्र ; दहिया&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सन्दर्भ==&lt;br /&gt;
{{टिप्पणीसूची}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू धर्म]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:शिव]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>103.206.51.168</name></author>
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		<title>पाञ्चजन्य</title>
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		<updated>2021-06-28T14:01:55Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;103.206.51.168: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&#039;&#039;&#039;पाञ्चजन्य&#039;&#039;&#039; [[भगवान]] [[विष्णु]] का [[शंख]] है। विष्णु के बाइसवें  अवतार श्री[[कृष्ण]] पाञ्चजन्य नामक एक शंख रखते थे ऐसा वर्णन महाभारत में प्राप्त होता है। श्रीमद्भगवद्गीता जो कि महाभारत का अङ्ग है उस में वासुदेव द्वारा कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान इसका इस्तेमाल किया जाना बताया गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;https://sa.wikipedia.org/s/6dm&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भागवत पुराण के अनुसार [[सांदिपनी|सान्दीपनी]] ऋषि के आश्रम में कृष्ण की शिक्षा पूरी होने पर उन्हें गुरू दक्षिणा लेने का आग्रह किया। तब ऋषि ने कहा समुद्र में डूबे हुये मेरे पुत्र को ले आओ। श्री कृष्ण द्वारा समुद्र तट पर जाकर शंखासुर को मारने पर उसका खोल (शंख) शेष रह गया था। उसी से शंख की उत्पत्ति हुई। शायद उसी शंख का नाम पाञ्चजन्य था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;पाञ्चजन्य&#039;&#039;&#039; विभिन्न अर्थों में प्रयुक्त होता है। इसके कुछ अर्थ इस प्रकार हैं:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1. [[कृष्ण|श्रीकृष्ण]] के [[शंख]] का नाम&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2. [[राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ]] का राष्ट्रवादी साप्ताहिक [[हिन्दी]] पत्र : &#039;&#039;&#039;[[पाञ्चजन्य (पत्र)]]&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. पाँच सर्वाधिक प्राचीन [[क्षत्रिय]] जातियाँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बाहरी कड़ियाँ ==&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20190627113321/https://www.panchjanya.com/ साप्ताहिक हिन्दी &#039;&#039;&#039;पाञ्चजन्य&#039;&#039;&#039; का जालघर]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संघ परिवार}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:भारत में प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:हिन्दू धर्म]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ]]&lt;/div&gt;</summary>
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		<title>कतिला</title>
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		<updated>2021-06-24T12:49:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;103.206.51.168: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;कतिला [[यमराज]] व [[धुमोरना]] देवी के  पुत्र हैं । वह हत्या का देवता थे । कातिला के सौतेले भाई का नाम युधिष्ठिर था | &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:देवी-देवता]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>103.206.51.168</name></author>
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