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	<title>भारतपीडिया - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
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		<title>पार्श्वनाथ</title>
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		<updated>2021-08-15T06:43:54Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;2401:4900:53F6:9D8F:2ABF:3F44:12A5:C6A3: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;नोट:- [[दो जैन तीर्थंकरों ऋषभदेव एवं अरिष्टनेमि या नेमिनाथ के नामों का उल्लेख &#039;ऋग्वेद&#039; में मिलता है। अरिष्टनेमि को भगवान श्रीकृष्ण का निकट संबंधी माना जाता है।]]&lt;br /&gt;
{{जैन तीर्थंकर&lt;br /&gt;
| subheader = तेइसवें जैन [[तीर्थंकर]]&lt;br /&gt;
| image = [[File:Parshwanath.jpg|200px|]]&lt;br /&gt;
| alt = &lt;br /&gt;
| caption = भगवान पार्श्वनाथ की प्राचीन प्रतिमा, कर्नाटक&lt;br /&gt;
| अन्य नाम = पारसनाथ जिन&lt;br /&gt;
| पूर्व_तीर्थंकर = [[नेमिनाथ]]&lt;br /&gt;
| अगले_तीर्थंकर = [[महावीर]]&lt;br /&gt;
| शिक्षाएं = अहिंसा&lt;br /&gt;
| वंश = इक्ष्वाकु&lt;br /&gt;
| पिता = राजा अश्वसेन&lt;br /&gt;
| माता = रानी वामादेवी&lt;br /&gt;
| एतिहासिक_काल = ८७२-७७२ ई.पू.&lt;br /&gt;
| च्यवन =&lt;br /&gt;
| च्यवन_स्थान =&lt;br /&gt;
| जन्म = पूर्व पौष कृष्‍ण एकादशी&lt;br /&gt;
| जन्म_स्थान = [[वाराणसी]]&lt;br /&gt;
| दीक्षा = &lt;br /&gt;
| दीक्षा_स्थान = बनारस&lt;br /&gt;
| केवल_ज्ञान = &lt;br /&gt;
| केवलज्ञान_स्थान =&lt;br /&gt;
| मोक्ष = श्रावण शुक्ला सप्तमी &lt;br /&gt;
| मोक्ष_स्थान = [[शिखरजी|सम्मेद शिखर]]&lt;br /&gt;
| रंग = [[हरा]]&lt;br /&gt;
| चिन्ह = [[साँप|सर्प]]&lt;br /&gt;
| ऊंचाई = ९ हाथ&lt;br /&gt;
| आयु = १०० वर्ष&lt;br /&gt;
| वृक्ष = अशोक&lt;br /&gt;
| प्रथम_गणधर = श्री शुभदत्त&lt;br /&gt;
| गणधरों_की_संख्य = श्वेतांबर परंपरा– ८,&amp;lt;/br&amp;gt; दिगंबर परंपरा– १०&lt;br /&gt;
| यक्ष = धरणेन्द्र&lt;br /&gt;
| यक्षिणी = पद्मावती&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;भगवान पार्श्वनाथ&#039;&#039;&#039; [[जैन धर्म]] के तेइसवें (23वें) [[तीर्थंकर]] हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web|url=https://www.hindustantimes.com/brunch/rude-travel-down-the-sages/story-SYVGGDouZrOTgJogiul6IN.html|title=Rude Travel: Down The Sages vir sanghavi|access-date=15 मई 2019|archive-url=https://web.archive.org/web/20190324162028/https://www.hindustantimes.com/brunch/rude-travel-down-the-sages/story-SYVGGDouZrOTgJogiul6IN.html|archive-date=24 मार्च 2019|url-status=live}}&amp;lt;/ref&amp;gt; [[जैन ग्रंथ]]ों के अनुसार वर्तमान में काल चक्र का अवरोही भाग, [[अवसर्पिणी]]  गतिशील है और इसके चौथे युग में २४ तीर्थंकरों का जन्म हुआ था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जन्म और प्रारंभिक जीवन==&lt;br /&gt;
[[तीर्थंकर]] पार्श्वनाथ का जन्म आज से लगभग 2 हजार 9 सौ वर्ष पूर्व वाराणसी में हुआ था। [[वाराणसी|वाराणासी]] में अश्वसेन नाम के इक्ष्वाकुवंशीय राजा थे। उनकी रानी वामा ने पौष कृष्‍ण एकादशी के दिन महातेजस्वी पुत्र को जन्म दिया, जिसके शरीर पर सर्पचिह्म था। वामा देवी ने गर्भकाल में एक बार स्वप्न में एक सर्प देखा था, इसलिए पुत्र का नाम &#039;पार्श्व&#039; रखा गया। उनका प्रारंभिक जीवन राजकुमार के रूप में व्यतीत हुआ। एक दिन पार्श्व ने अपने महल से देखा कि पुरवासी पूजा की सामग्री लिये एक ओर जा रहे हैं। वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि एक तपस्वी जहाँ पंचाग्नि जला रहा है, और अग्नि में एक सर्प का जोड़ा मर रहा है, तब पार्श्व ने कहा— &#039;दयाहीन&#039; धर्म किसी काम का नहीं&#039;।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===वैराग्य और दीक्षा===&lt;br /&gt;
तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने तीस वर्ष की आयु में घर त्याग दिया था और जैनेश्वरी दीक्षा ली थी और ब्रह्मचारी अविवाहित थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==केवल ज्ञान==&lt;br /&gt;
काशी में 83 दिन की कठोर तपस्या करने के बाद 84वें दिन उन्हें [[केवल ज्ञान]] प्राप्त हुआ था। पुंड़्र, ताम्रलिप्त आदि अनेक देशों में उन्होंने भ्रमण किया। [[ताम्रलिप्त]] में उनके शिष्य हुए। पार्श्वनाथ ने चतुर्विध संघ की स्थापना की, जिसमे मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका होते है और आज भी जैन समाज इसी स्वरुप में है। प्रत्येक गण एक [[गणधर]] के अन्तर्गत कार्य करता था। सभी अनुयायियों, स्त्री हो या पुरुष सभी को समान माना जाता था। सारनाथ जैन-आगम ग्रंथों में सिंहपुर के नाम से प्रसिद्ध है। यहीं पर जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर [[श्रेयांसनाथ|श्रेयांसनाथ जी]] ने जन्म लिया था और अपने अहिंसा धर्म का प्रचार-प्रसार किया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केवल ज्ञान के पश्चात तीर्थंकर पार्शवनाथ ने जैन धर्म के चार मुख्य व्रत – सत्य, अहिंसा, अस्तेय और अपरिग्रह की शिक्षा दी थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निर्वाण==&lt;br /&gt;
अंत में अपना निर्वाणकाल समीप जानकर [[शिखरजी|श्री सम्मेद शिखरजी]] (पारसनाथ की पहाड़ी जो [[झारखण्ड|झारखंड]] में है) पर चले गए जहाँ श्रावण शुक्ला सप्तमी को उन्हे [[मोक्ष (जैन धर्म)|मोक्ष]] की प्राप्ती हुई। &lt;br /&gt;
भगवान पार्श्वनाथ की लोकव्यापकता का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि आज भी सभी तीर्थंकरों की मूर्तियों और चिह्नों में पार्श्वनाथ का चिह्न सबसे ज्यादा है। आज भी पार्श्वनाथ की कई चमत्कारिक मूर्तियाँ देश भर में विराजित है। जिनकी गाथा आज भी पुराने लोग सुनाते हैं। ऐसा माना जाता है कि महात्मा बुद्ध के अधिकांश पूर्वज भी पार्श्वनाथ धर्म के अनुयायी थे।.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पूर्वजन्म==&lt;br /&gt;
जैन ग्रंथों में तीर्थंकर पार्श्‍वनाथ को नौ पूर्व जन्मों का वर्णन हैं। पहले जन्म में ब्राह्मण, दूसरे में हाथी, तीसरे में स्वर्ग के देवता, चौथे में राजा, पाँचवें में देव, छठवें जन्म में चक्रवर्ती सम्राट और सातवें जन्म में देवता, आठ में राजा और नौवें जन्म में राजा इंद्र (स्वर्ग) तत्पश्चात दसवें जन्म में उन्हें तीर्थंकर बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पूर्व जन्मों के संचित पुण्यों और दसवें जन्म के तप के फलत: वे तीर्थंकर बनें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सन्दर्भ==&lt;br /&gt;
{{टिप्पणीसूची}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इन्हें भी देखें==&lt;br /&gt;
* [[पार्श्वनाथ मन्दिर, खजुराहो]]&lt;br /&gt;
* [[पार्श्वनाथ मंदिर, जैसलमेर]]&lt;br /&gt;
* [[जैन मूर्तियाँ]]&lt;br /&gt;
* [[आगम (जैन)]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{तीर्थंकर}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:जैन धर्म]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:तीर्थंकर]]&lt;/div&gt;</summary>
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