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	<title>भारतपीडिया - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
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		<title>नाटक</title>
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		<updated>2021-08-13T06:37:40Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;2409:4043:2D8D:A213:0:0:6788:4A03: /* कथावस्तु */भरत के नाट्य शास्त्र के आधार पर कार्य की अवस्था के अंग बदले&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[File:Yakshagana bhima.JPG|thumb|300px|right|भारतीय नाटक का एक दृष्य]]&lt;br /&gt;
पारम्परिक सन्दर्भ में, &#039;&#039;&#039;नाटक&#039;&#039;&#039;, [[काव्य]] का एक रूप है (दृष्यकाव्य)। जो रचना श्रवण द्वारा ही नहीं अपितु दृष्टि द्वारा भी दर्शकों के हृदय में रसानुभूति कराती है उसे नाटक या दृश्य-काव्य कहते हैं। नाटक में श्रव्य काव्य से अधिक रमणीयता होती है। श्रव्य काव्य होने के कारण यह लोक चेतना से अपेक्षाकृत अधिक घनिष्ठ रूप से संबद्ध है। [[नाट्य शास्त्र|नाट्यशास्त्र]] में लोक चेतना को नाटक के लेखन और मंचन की मूल प्रेरणा माना गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== परिचय ==&lt;br /&gt;
नाटक की गिनती काव्यों में है। काव्य दो प्रकार के माने गये हैं— श्रव्य काव्य और दृश्य काव्य। इसी दृश्य काव्य का एक भेद नाटक माना गया है। परन्तु दृष्टि द्वारा मुख्य रूप से इसका ग्रहण होने के कारण सभी दृश्य काव्यों को ही &#039;नाटक&#039; कहने लगे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[भरत मुनि|भरतमुनि]] का [[नाट्य शास्त्र|नाट्यशास्त्र]] इस विषय का सबसे प्राचीन ग्रंथ मिलता है। [[अग्निपुराण]] में भी नाटक के लक्षण आदि का निरूपण है। उसमें एक प्रकार के काव्य का नाम प्रकीर्ण कहा गया है। इस प्रकीर्ण के दो भेद है— काव्य और अभिनेय। अग्निपुराण में दृश्य काव्य या [[रूपक]] के २७ भेद कहे गए हैं— &lt;br /&gt;
: &#039;&#039;नाटक, प्रकरण, डिम, ईहामृग, समवकार, प्रहसन, व्यायोग, [[भाण]], वीथी, अंक, त्रोटक, नाटिका, सट्टक, शिल्पक, विलासिका, &lt;br /&gt;
: &#039;&#039;दुर्मल्लिका, प्रस्थान, भाणिका, भाणी, गोष्ठी, हल्लीशक, काव्य, श्रीनिगदित, नाटयरासक, रासक, उल्लाप्यक और प्रेक्षण। &#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
[[साहित्य दर्पण|साहित्यदर्पण]] में नाटक के लक्षण, भेद आदि अधिक स्पष्ट रूप से दिए हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऊपर लिखा जा चुका है कि दृश्य काव्य के एक भेद का नाम नाटक है। दृश्य काव्य के मुख्य दो विभाग हैं— रूपक और उपरूपक। रूपक के दस भेद हैं— रूपक, नाटक, प्रकरण, भाण, व्यायोग, समवकार, ड़िम, ईहामृग, अंकवीथी और प्रहसन। &#039;उपरूपक&#039; के अठारह भेद हैं— नाटिका, त्रोटक, गोष्ठी, सट्टक, नाटयरासक, प्रस्थान, उल्लाप्य, काव्य, प्रेक्षणा, रासक, संलापक, श्रीगदित, शिंपक, विलासिका, दुर्मल्लिका, प्रकरणिका, हल्लीशा और भणिका।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपर्युक्त भेदों के अनुसार नाटक शब्द दृश्य काव्य मात्र के अर्थ में बोलते हैं। साहित्यदर्पण के अनुसार नाटक किसी ख्यात वृत्त (प्रसिद्ध आख्यान, कल्पित नहीं)&#039; की लेकर लिखाना चाहिए। वह बहुत प्रकार के विलास, सुख, दुःख, तथा अनेक रसों से युक्त होना चाहिए। उसमें पाँच से लेकर दस तक अंक होने चाहिए। नाटक का नायक धीरोदात्त तथा प्रख्यात वंश का कोई प्रतापी पुरुष या राजर्षि होना चाहिए। नाटक के प्रधान या अंगी रस शृंगार और वीर हैं। शेष रस गौण रूप से आते हैं। शांति, करुणा आदि जिस रुपक में में प्रथान हो वह नाटक नहीं कहला सकता। संधिस्थल में कोई विस्मयजनक व्यापार होना चाहिए। उपसंहार में मंगल ही दिखाया जाना चाहिए। वियोगांत नाटक संस्कृत [[काव्यशास्त्र|अलंकार शास्त्र]] के विरुद्ध है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== नाटक शब्दावली ==&lt;br /&gt;
अभिनय आरंभ होने के पहले जो क्रिया (मंगलाचरण नांदी) होती है, उसे पूर्वरंग कहते हैं। पूर्वरंग, के उपरांत प्रधान नट या सूत्रधार, जिसे स्थापक भी कहते हैं, आकर सभा की प्रशंसा करता है फिर नट, नटी सूत्रधार इत्यादि परस्पर वार्तालाप करते हैं जिसमें खेले जानेवाले नाटक का प्रस्ताव, कवि-वंश-वर्णन आदि विषय आ जाते हैं। नाटक के इस अंश को प्रस्तावना कहते हैं। जिस इतिवृत्त को लेकर नाटक रचा जाता है उसे &#039;वस्तु&#039; कहते हैं। &#039;वस्तु&#039; दो प्रकार की होती है—आधिकारिक वस्तु और प्रासंगिक वस्तु। जो समस्त इतिवृत्त का प्रधान नायक होता है उसे &#039;अधिकारी&#039; कहते हैं। इस अधिकारी के संबंध में जो कुछ वर्णन किया जाता है उसे &#039;आधिकारिक वस्तु कहते हैं; जैसे, रामलीला में [[राम]] का चरित्र। इस अधिकारी के उपकार के लिये या रसपुष्टि के लिये प्रसंगवश जिसका वर्णन आ जाता है उसे प्रासंगिक वस्तु कहते हैं; जैसे [[सुग्रीव]], आदि का चरित्र। &#039;सामने लाने&#039; अर्थात् दृश्य संमुख उपस्थित करने को अभिनय कहते हैं। अतः अवस्थानुरुप अनुकरण या स्वाँग का नाम ही अभिनय है। अभिनय चार प्रकार का होता है— आंगिक, वाचिक, आहार्य और सात्विक। अंगों की चेष्टा से जो अभिनय किया जाता है उसे आंगिक, वचनों से जो किया जाता है उसे वाचिक, भेस बनाकर जो किया जाता हैं उसे आहार्य तथा भावों के उद्रेक से कंप, स्वेद आदि द्वारा जो होता है उसे सात्विक कहते हैं। नाटक में बीज, बिंदु, पताका, प्रकरी और कार्य इन पाँचों के द्वारा प्रयोजन सिद्धि होती है। जो बात मुँह से कहते ही चारों ओर फैल जाय और फलसिद्धि का प्रथम कारण हो उसे बीज कहते हैं, जैसे [[वेणीसंहार]] नाटक में भीम के क्रोध पर युधिष्ठिर का उत्साहवाक्य द्रौपदी के केशमोजन का कारण होने के कारण बीज है। कोई एक बात पूरी होने पर दूसरे वाक्य से उसका संबंध न रहने पर भी उसमें ऐसे वाक्य लाना जिनकी दूसरे वाक्य के साथ असंगति न हो &#039;बिंदु&#039; है। बीच में किसी व्यापक प्रसंग के वर्णन को पताका कहते हैं— जैसे उत्तरचरित में सुग्रीव का और अभिज्ञान- शांकुतल में विदूषक का चरित्रवर्णन। एक देश व्यापी चरित्रवर्णन को प्रकरी कहते हैं। आरंभ की हुई क्रिया की फलसिद्धि के लिये जो कुछ किया जाय उसे कार्य कहते हैं; जैसे, रामलीला में रावण वध। किसी एक विषय की चर्चा हो रही हो, इसी बीच में कोई दूसरा विषय उपस्थित होकर पहले विषय से मेल में मालूम हो वहाँ पताका स्थान होता है, जैसे, रामचरित् में राम सीता से कह रहे हैं—&#039;हे प्रिये ! तुम्हारी कोई बात मुझे असह्य नहीं, यदि असह्य है तो केवल तुम्हारा विरह, इसी बीच में प्रतिहारी आकर कहता है : देव ! दुर्मुख उपस्थित। यहाँ &#039; उपस्थित&#039; शब्द से &#039;विरह उपस्थित&#039; ऐसी प्रतीत होता है और एक प्रकार का चमत्कार मालूम होता है। संस्कृत साहित्य में नाटक संबंधी ऐसे ही अनेक कौशलों की उद्भावना की गई है और अनेक प्रकार के विभेद दिखाए गए हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आजकल देशभाषाओं में जो नए नाटक लिखे जाते हैं उनमें संस्कृत नाटकों के सब नियमों का पालन या विषयों का समावेश अनावश्यक समझा जाता है। [[भारतेन्दु हरिश्चंद्र|भारतेंदु हरिश्चंद्र]] लिखते हैं—&#039;संस्कृत नाटक की भाँति हिंदी नाटक में उनका अनुसंधान करना या किसी नाटकांग में इनको यत्नपूर्वक रखकर नाटक लिखना व्यर्थ है; क्योंकि प्राचीन लक्षण रखकर आधुनिक नाटकादि की शोभा संपादन करने से उल्टा फल होता है और यत्न व्यर्थ हो जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== नाटक के प्रमुख तत्त्व ==&lt;br /&gt;
===कथावस्तु ===&lt;br /&gt;
[[अंग्रेजी]] में इसे ‘प्लॉट’ की संज्ञा दी जाती है, जिसका अर्थ &#039;आधार&#039; या &#039;भूमि&#039; है। नाटक की कथावस्तु पौराणिक, ऐतिहासिक, काल्पनिक या सामाजिक हो सकती है। कथा तो सभी प्रबंधात्मक रचनाओं की रीढ़ होती है (नाटक भी क्योंकि प्रबंधात्मक रचना है।)। भारतीय आचार्यों ने नाटक में तीन प्रकार की कथाओं का निर्धारण किया है –&lt;br /&gt;
:(१) प्रख्यात&lt;br /&gt;
:(२) उत्पाद्य&lt;br /&gt;
:(३) मिश्र प्रख्यात कथा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
;प्रख्यात कथा –&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रख्यात कथा इतिहास , पुराण से प्राप्त होती है। जब उत्पाद्य कथा कल्पना पराश्रित होती है , मिश्र कथा कहलाती है। इतिहास और कथा दोनों का योग रहता है। इन कथा आधारों के बाद नाटक कथा को मुख्य तथा गौण अथवा प्रासंगिक भेदों में बांटा जाता है , इनमें से प्रासंगिक के भी आगे पताका और प्रकरी है । पताका प्रासंगिक कथावस्तु मुख्य कथा के साथ अंत तक चलती है जब प्रकरी बीच में ही समाप्त हो जाती है। इसके अतिरिक्त नाटक की कथा के विकास हेतु कार्य व्यापार की पांच अवस्थाएं प्रारंभ प्रयत्न , प्राप्तयासा, नियताप्ति और फलागम होती है। इसके अतिरिक्त नाटक में पांच संधियों का प्रयोग भी किया जाता है। वास्तव में नाटक को अपनी कथावस्तु की योजना में पात्रों और घटनाओं में इस रुप में संगति बैठानी होती है कि पात्र कार्य व्यापार को अच्छे ढंग से अभिव्यक्त कर सके। नाटककार को ऐसे प्रसंग कथा में नहीं रखनी चाहिए जो मंच के संयोग ना हो यदि कुछ प्रसंग बहुत आवश्यक है तो नाटककार को उसकी सूचना कथा में दे देनी चाहिए।:नाटक की कथावस्तु पौराणिक, ऐतिहासिक, काल्पनिक या सामाजिक हो सकती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===पात्र===&lt;br /&gt;
नाटक में नाटक का अपने विचारों , भावों आदि का प्रतिपादन पात्रों के माध्यम से ही करना होता है। अतः नाटक में पात्रों का विशेष स्थान होता है। प्रमुख पात्र अथवा नायक कला का अधिकारी होता है तथा समाज को उचित दशा तक ले जाने वाला होता है। भारतीय परंपरा के अनुसार वह विनयी , सुंदर , शालीनवान , त्यागी , उच्च कुलीन होना चाहिए। किंतु आज नाटकों में किसान , मजदूर आदि कोई भी पात्र हो सकता है। पात्रों के संदर्भ में नाटककार को केवल उन्हीं पात्रों की सृष्टि करनी चाहिए जो घटनाओं को गतिशील बनाने में तथा नाटक के चरित्र पर प्रकाश डालने में सहायक होते हैं।&lt;br /&gt;
:पात्रों का सजीव और प्रभावशाली चरित्र ही नाटक की जान होता है। कथावस्तु के अनुरूप नायक धीरोदात्त, धीर ललित, धीर शांत या धीरोद्धत हो सकता है।&lt;br /&gt;
===उद्देश्य===&lt;br /&gt;
सामाज के हृदय में रक्त का संचार करना ही नाटक का उद्देश्य होता है। नाटक के अन्य तत्त्व इस उद्देश्य के साधन मात्र होते हैं। भारतीय दृष्टिकोण सदा आशावादी रहा है इसलिए संस्कृत के प्रायः सभी नाटक सुखांत रहे हैं। पश्चिम नाटककारों ने या साहित्यकारों ने साहित्य को जीवन की व्याख्या मानते हुए उसके प्रति यथार्थ दृष्टिकोण अपनाया है उसके प्रभाव से हमारे यहां भी कई नाटक दुखांत में लिखे गए हैं , किंतु सत्य है कि उदास पात्रों के दुखांत अंत से मन खिन्न हो जाता है। अतः दुखांत नाटको का प्रचार कम होना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===भाषा शैली===&lt;br /&gt;
नाटक सर्वसाधारण की वस्तु है अतः उसकी भाषा शैली सरल , स्पष्ट और सुबोध होनी चाहिए , जिससे नाटक में प्रभाविकता का समावेश हो सके तथा दर्शक को क्लिष्ट भाषा के कारण बौद्धिक श्रम ना करना पड़े अन्यथा रस की अनुभूति में बाधा पहुंचेगी। अतः नाटक की भाषा सरल व स्पष्ट रूप में प्रवाहित होनी चाहिए।&lt;br /&gt;
===देशकाल वातावरण===&lt;br /&gt;
देशकाल वातावरण के चित्रण में नाटककार को युग अनुरूप के प्रति विशेष सतर्क रहना आवश्यक होता है। पश्चिमी नाटक में देशकाल के अंतर्गत संकलनअत्र समय स्थान और कार्य की कुशलता का वर्णन किया जाता है। वस्तुतः यह तीनों तत्त्व ‘ यूनानी रंगमंच ‘ के अनुकूल थे। जहां रात भर चलने वाले लंबे नाटक होते थे और दृश्य परिवर्तन की योजना नहीं होती थी। परंतु आज रंगमंच के विकास के कारण संकलन का महत्त्व समाप्त हो गया है। भारतीय नाट्यशास्त्र में इसका उल्लेख ना होते हुए भी नाटक में स्वाभाविकता , औचित्य तथा सजीवता की प्रतिष्ठा के लिए देशकाल वातावरण का उचित ध्यान रखा जाता है। इसके अंतर्गत पात्रों की वेशभूषा तत्कालिक धार्मिक , राजनीतिक , सामाजिक परिस्थितियों में युग का विशेष स्थान है। अतः नाटक के तत्वों में देशकाल वातावरण का अपना महत्त्व है।&lt;br /&gt;
===संवाद===&lt;br /&gt;
नाटक में नाटकार के पास अपनी और से कहने का अवकाश नहीं रहता। वह संवादों द्वारा ही वस्तु का उद्घाटन तथा पात्रों के चरित्र का विकास करता है। अतः इसके संवाद सरल , सुबोध , स्वभाविक तथा पात्रअनुकूल होने चाहिए। गंभीर दार्शनिक विषयों से इसकी अनुभूति में बाधा होती है। इसलिए इनका प्रयोग नहीं करना चाहिए। नीर सत्ता के निरावरण तथा पात्रों की मनोभावों की मनोकामना के लिए कभी-कभी स्वागत कथन तथा गीतों की योजना भी आवश्यक समझी गई है।&lt;br /&gt;
===रस ===&lt;br /&gt;
:नाटक में नवरसों में से आठ का ही परिपाक होता है। शांत रस नाटक के लिए निषिद्ध माना गया है। वीर या शृंगार में से कोई एक नाटक का प्रधान रस होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===अभिनय===&lt;br /&gt;
[[Image:കൂടിയാട്ടത്തിലെസുഗ്രീവൻ.jpg|right|thumb|300px|एक भारतीय नाटक में [[सुग्रीव]] का पात्र]]&lt;br /&gt;
यह नाटक की प्रमुख विशेषता है। नाटक को नाटक के तत्त्व प्रदान करने का श्रेय इसी को है। यही नाट्यतत्व का वह गुण है जो दर्शक को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। इस संबंध में नाटककार को नाटकों के रूप , आकार , दृश्यों की सजावट और उसके उचित संतुलन , परिधान , व्यवस्था , प्रकाश व्यवस्था आदि का पूरा ध्यान रखना चाहिए। दूसरे शब्दों में लेखक की दृष्टि रंगशाला के विधि – विधानों की ओर विशेष रुप से होनी चाहिए इसी में नाटक की सफलता निहित है।&lt;br /&gt;
:अभिनय भी नाटक का प्रमुख तत्त्व है। इसकी श्रेष्ठता पात्रों के वाक्चातुर्य और अभिनय कला पर निर्भर है। मुख्य प्रकार से अभिनय ४ प्रकार का होता हॅ।&lt;br /&gt;
:* १ - आंगिक अभिनय (शरीर से किया जाने वाला अभिनय),&lt;br /&gt;
:* २ - वाचिक अभिनय (संवाद का अभिनय [रेडियो नाटक ],&lt;br /&gt;
:* ३ - आहार्य अभिनय (वेशभूषा, मेकअप, स्टेज विन्यास्, प्रकाश व्यवस्था आदि),&lt;br /&gt;
:* ४ - सात्विक अभिनय (अंतरात्मा से किया गया अभिनय [ रस आदि ]।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== नाटक का इतिहास ==&lt;br /&gt;
{{main|संस्कृत नाटकों का उद्भव एवं विकास}}&lt;br /&gt;
=== प्राचीन काल ===&lt;br /&gt;
भारत में अभिनय-कला और रंगमंच का वैदिक काल में ही निर्माण हो चुका था। तत्पश्चात् संस्कृत रंगमंच तो अपनी उन्नति की पराकाष्ठा पर पहुँच गया था-[[भरत मुनि]] का [[नाट्य शास्त्र|नाट्यशास्त्र]] इसका प्रमाण है। बहुत प्राचीन समय में भारत में संस्कृत नाटक धार्मिक अवसरों, सांस्कृतिक पर्वों, सामाजिक समारोहों एवं राजकीय बोलचाल की भाषा नहीं रही तो संस्कृत नाटकों की मंचीकरण समाप्त-सा हो गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतवर्ष में नाटकों का प्रचार बहुत प्राचीन काल से हैं। भरत मुनि का नाटयशास्त्र बहुत पुराना है। रामायण, महाभारत, हरिवंश इत्यादि में नट और नाटक का उल्लेख है। पाणिनि ने &#039;शिलाली&#039; और &#039;कृशाश्व&#039; नामक दो नटसूत्रकारों के नाम लिए हैं। शिलाली का नाम शुक्ल यजुर्वेदीय शतपथ ब्राह्मण और सामवेदीय अनुपद सूत्र में मिलता हैं। विद्वानों ने ज्योतिष की गणना के अनुसार [[शतपथ ब्राह्मण]] को ४००० वर्ष से ऊपर का बतलाया है। अतः कुछ पाश्चात्य विद्वानों की यह राय हक ग्रीस या यूनान में ही सबसे पहले नाटक का प्रादुर्भाव हुआ, ठीक नहीं है। हरिवंश में लिखा है कि जब प्रद्युम्न, सांब आदि यादव राजकुमार वज्रनाभ के पुर में गए थे तब वहाँ उन्होंने रामजन्म और रंभाभिसार नाटक खेले थे। पहले उन्होंने नेपथ्य बाँधा था जिसके भीतर से स्त्रियों ने मधुर स्वर से गान किया था। शूर नामक यादव रावण बना था, मनोवती नाम की स्त्री रंभा बनी थी, प्रद्युम्न नलकूबर और सांब विदूषक बने थे। विल्सन आदि पाश्चात्य विद्वानों ने स्पष्ट स्वीकार किया हैं कि हिंदुओं ने अपने यहाँ नाटक का प्रादुर्भाव अपने आप किया था। प्राचीन हिंदू राजा बडी बडी रंगशालाएँ बनवाते थे। मध्यप्रदेश में सरगुजा एक पहाड़ी स्थान है, वहाँ एक गुफा के भीतर इस प्रकार की एक रंगशाला के चिह्न पाए गए हैं। यह ठीक है कि यूनानियों के आने के पूर्व के संस्कृत नाटक आजकल नहीं मिलते हैं, पर इस बात से इनका अभाव, इतने प्रमाणों के रहते, नहीं माना जा सकता। संभव है, कलासंपन्न युनानी जाति से जब हिंदू जाति का मिलन हुआ हो तब जिस प्रकार कुछ और और बातें एक ने दूसरे की ग्रहण की। इसी प्रकार नाटक के संबंध में कुछ बातें हिंदुओं ने भी अपने यहाँ ली हों। बाह्यपटी का &#039;जवनिका&#039; (कभी कभी &#039;यवनिका&#039;) नाम देख कुछ लोग यवन संसर्ग सूचित करते हैं। अंकों में जो &#039;दृश्य&#039; संस्कृत नाटकों में आए हैं उनसे अनुमान होता है कि इन पटों पर चित्र बने रहते थे। अस्तु अधिक से अधिक इस विषय में यही कहा जा सकता है कि अत्यंत प्राचीन काल में जो अभिनय हुआ करते थे। उनमें चित्रपट काम में नहीं लाए जाते थे। सिकंदर के आने के पीछे उनका प्रचार हुआ। अब भी रामलीला, रासलीला बिना परदों के होती ही हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== मध्यकाल ===&lt;br /&gt;
मध्यकाल में प्रादेशिक भाषाओं में लोकतंत्र का उदय हुआ। यह विचित्र संयोग है कि मुस्लिमकाल में जहाँ शासकों की धर्मकट्टरता ने भारत की साहित्यिक रंग-परम्परा को तोड़ डाला वहाँ लोकभाषाओं में लोकमंच का अच्छा प्रसार हुआ। [[रासलीला]], [[राम लीला|रामलीला]] तथा [[नौटंकी]] आदि के रूप में लोकधर्मी नाट्यमंच बना रहा। भक्तिकाल में एक ओर तो ब्रज प्रदेश में कृष्ण की रासलीलाओं का ब्रजभाषा में अत्यधिक प्रचलन हुआ और दूसरी और विजयदशमी के अवसर पर समूचे भारत के छोटे-बड़े नगरों में रामलीला बड़ी धूमधाम से मनाई जाने लगी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साहित्यिक दृष्टि से इस मध्यकाल में कुछ संस्कृत नाटकों के पद्यबद्ध हिन्दी छायानुवाद भी हुए, जैसे नेवाज कृत ‘अभिज्ञान शाकुन्तल’, सोमनाथ कृत ‘मालती-माधव’, हृदयरामचरित ‘हनुमन्नाटक’ आदि; कुछ मौलिक पद्यबद्ध संवादात्मक रचनाएँ भी हुईं, जैसे लछिराम कृत ‘करुणाभरण’, रघुराम नागर कृत ‘सभासार’ (नाटक), गणेश कवि कृत ‘प्रद्युम्नविजय’ आदि; पर इनमें नाटकीय पद्धति का पूर्णतया निर्वाह नहीं हुआ। ये केवल संवादात्मक रचनाएँ ही कही जा सकती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार साहित्यिक दृष्टि तथा साहित्यिक रचनाओं के अभाव के कारण मध्यकाल में साहित्यिक रंगकर्म की ओर कोई प्रवृत्ति नहीं हुई। सच तो यह है कि आधुनिक काल में व्यावसायिक तथा साहित्यिक रंगमंच के उदय से पूर्व हमारे देश में रामलीला, नौटंकी आदि के लोकमंच ने ही चार-पाँच सौ वर्षों तक हिन्दी रंगमंच को जीवित रखा। यह लोकमंच-परम्परा आज तक विभिन्न रूपों में समूचे देश में वर्तमान है। उत्तर भारत में रामलीलाओं के अतिरिक्त महाभारत पर आधारित ‘वीर अभिमन्यु’, ‘सत्य हरिशचन्द्र’ आदि ड्रामे तथा ‘रूप-बसंत’, ‘हीर-राँझा’, ‘हकीकतराय’, ‘बिल्वामंगल’ आदि नौटंकियाँ आज तक प्रचलित हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== आधुनिक काल ===&lt;br /&gt;
आधुनिक काल में अंग्रेजी राज्य की स्थापना के साथ रंगमंच को प्रोत्साहन मिला। फलत: समूचे भारत में व्यावसायिक नाटक मंडलियाँ स्थापित हुईं। नाट्यारंगन की प्रवृत्ति सर्वप्रथम बँगला में दिखाई दी। सन् 1835 ई. के आसपास कलकत्ता में कई अव्यावसायिक रंगशालाओं का निर्माण हुआ। कलकत्ता के कुछ सम्भ्रान्त परिवारों और रईसों ने इनके निर्माण में योग दिया था और दूसरी ओर व्यावयायिक नाटक मंडलियों के असाहित्यिक प्रयास से अलग था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[बाङ्ला भाषा|बँगला]] के इस नाट्य-सृजन और नाट्यारंगन का अध्ययन इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि [[भारतेन्दु हरिश्चंद्र|भारतेन्दु हरिश्चन्द्र]] के रंगांदोलन को इसी से दशा, दिशा और प्रेरणा मिली थी। बँगला के इस आरम्भिक साहित्यिक प्रयास में जो नाटक रचे गए वे मूल संस्कृत या अंग्रेजी नाटकों के छायानुवाद या रूपान्तर थे। स्पष्ट है कि भारतेन्दु का आरम्भिक प्रयास भी संस्कृत नाटकों के छायानुवाद का ही था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिन्दी रंगमंचीय साहित्यिक नाटकों में सबसे पहला हिन्दी गीतिनाट्य अमानत कृत ‘[[इंदर सभा]]’ कहा जा सकता है जो सन् 1853 ई. में लखनऊ के नवाब वाजिद अलीशाह के दरबार में खेला गया था। इसमें उर्दू-शैली का वैसा ही प्रयोग था जैसा पारसी नाटक मंडलियों ने अपने नाटकों में अपनाया। सन् 1862 ई. में काशी में ‘जानकी मंगल’ नामक विशुद्ध हिन्दी नाटक खेला गया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपर्युक्त साहित्यिक रंगमंच के उपर्युक्त छुटपुट प्रयास से बहुत आगे बढ़कर पारसी मंडलियों-ओरिजिनल विक्टोरिया, एम्प्रेस विक्टोरिया, एल्फिंस्टन थियेट्रिकल कम्पनी, अल्फ्रेड थियेट्रिकल तथा न्यू अलफ्रेड कम्पनी आदि-ने व्यावसायिक रंगमंच बनाया। सर्वप्रथम बंबई और बाद में हैदराबाद, लखनऊ, बनारस, दिल्ली लाहौर आदि कई केन्द्रों और स्थानों से ये कम्पनियाँ देश-भर में घूम-घूमकर हिन्दी नाटकों का प्रदर्शन करने लगीं। इन पारसी नाटक मंडलियों के लिए पहले-पहल नसरबानी खान साहब, रौनक बनारसी, विनायक प्रसाद ‘तालिब’, ‘अहसन’ आदि लेखकों ने नाटक लिखे। जनता का सस्ता मनोरंजन और धनोपार्जन ही इन कम्पनियों का मुख्य उद्देश्य था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी से उच्चकोटि के साहित्यिक नाटकों से इनका विशेष प्रयोजन नहीं था। धार्मिक-पौराणिक तथा प्रेम-प्रधान नाटकों को ही ये अपने रंगमंच पर दिखाती थीं। सस्ते और अश्लील प्रदर्शन करने में इन्हें जरा भी संकोच नहीं था। इसी से जनता की रुचि भ्रष्ट करने का दोष इन पर लगाया जाता है। भ्रमण के कारण इन कम्पनियों का रंगमंच भी इनके साथ घूमता रहता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किसी स्थायी रंगमंच की स्थापना इनके द्वारा भी संभव नहीं थी। रंगमंच का ढाँचा बल्लियों द्वारा निर्मित किया जाता था और स्टेज पर चित्र-विचित्र पर्दे लटका दिए जाते थे। भड़कीली-चटकीली वेशभूषा, पर्दों की नई-नई चित्रकारी तथा चमत्कारपूर्ण दृश्य-विधान की ओर इनका अधिक ध्यान रहता था। पर्दों को दृश्यों के अनुसार उठाया-गिराया जाता था। संगीत-वाद्य का आयोजन स्टेज के अगले भाग में होता था। गंभीर दृश्यों के बीच-बीच में भी भद्दे हास्यपूर्ण दृश्य जानबूझकर रखे जाते थे। बीच-बीच में शायरी, गजलें और तुकबन्दी खूब चलती थी। भाषा उर्दू-हिन्दी का मिश्रित रूप थी। संवाद पद्य-रूप तथा तुकपूर्ण खूब होते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[राधेश्याम कथावाचक]], [[नारायणप्रसाद बेताब]], [[आगाहश्र कश्मीरी]], [[हरिकृष्ण जौहर]] आदि कुछ ऐसे नाटककार भी हुए हैं जिन्होंने [[पारसी रंगमंच]] को कुछ साहित्यिक पुट देकर सुधारने का प्रयत्न किया है और हिन्दी को इस व्यावसायिक रंगमंच पर लाने की चेष्टा की। पर व्यावसायिक वृत्ति के कारण संभवत: इस रंगमंच पर सुधार संभव नहीं था। इसी से इन नाटककारों को भी व्यावसायिक बन जाना पड़ा। इस प्रकार पारसी रंगमंच न विकसित हो सका, न स्थायी ही बन सका।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== हिन्दी नाटक ==&lt;br /&gt;
हिंदी{{मुख्य|हिन्दी नाटक}}&lt;br /&gt;
हिंदी में नाटकों का प्रारंभ [[भारतेन्दु हरिश्चंद्र]] से माना जाता है। उस काल के भारतेन्दु तथा उनके समकालीन नाटककारों ने लोक चेतना के विकास के लिए नाटकों की रचना की इसलिए उस समय की सामाजिक समस्याओं को नाटकों में अभिव्यक्त होने का अच्छा अवसर मिला।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जैसाकि कहा जा चुका है, हिन्दी में अव्यावसायिक साहित्यिक रंगमंच के निर्माण का श्रीगणेश आगाहसन ‘अमानत’ लखनवी के ‘[[इंदर सभा]]’ नामक गीति-रूपक से माना जा सकता है। पर सच तो यह है कि ‘इंदर सभा’ की वास्तव में रंगमंचीय कृति नहीं थी। इसमें शामियाने के नीचे खुला स्टेज रहता था। [[नौटंकी]] की तरह तीन ओर दर्शक बैठते थे, एक ओर तख्त पर राजा इंदर का आसन लगा दिया जाता था, साथ में परियों के लिए कुर्सियाँ रखी जाती थीं। साजिंदों के पीछे एक लाल रंग का पर्दा लटका दिया जाता था। इसी के पीछे से पात्रों का प्रवेश कराया जाता था। राजा इंदर, परियाँ आदि पात्र एक बार आकर वहीं उपस्थित रहते थे। वे अपने संवाद बोलकर वापस नहीं जाते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उस समय नाट्यारंगन इतना लोकप्रिय हुआ कि अमानत की ‘इंदर सभा’ के अनुकरण पर कई सभाएँ रची गई, जैसे ‘मदारीलाल की इंदर सभा’, ‘दर्याई इंदर सभा’, ‘हवाई इंदर सभा’ आदि। पारसी नाटक मंडलियों ने भी इन सभाओं और मजलिसेपरिस्तान को अपनाया। ये रचनाएँ नाटक नहीं थी और न ही इनसे हिन्दी का रंगमंच निर्मित हुआ। इसी से [[भारतेन्दु हरिश्चंद्र|भारतेन्दु हरिश्चन्द्र]] इनको &#039;नाटकाभास&#039; कहते थे। उन्होंने इनकी पैरोडी के रूप में ‘[[बंदर सभा]]’ लिखी थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== लोक नाटक ==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|लोकनाट्य}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[संस्कृत नाटक|संस्कृत नाटकों]] का युग ढलने लगा तब चौदहवीं शताब्दी से उन्नीसवी शताब्दी तक उनका स्थान विभिन्न भारतीय भाषाओं में &#039;&#039;&#039;लोक नाटकों&#039;&#039;&#039; (folk theatre) ने लिया। आज अलग-अलग प्रदेशों में लोक नाटक भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* &#039;&#039;&#039;[[राम लीला|रामलीला]]&#039;&#039;&#039; - उत्तरी भारत में&lt;br /&gt;
* &#039;&#039;&#039;[[जात्रा]]&#039;&#039;&#039; - बंगाल, उडीसा, पूर्वी बिहार&lt;br /&gt;
* &#039;&#039;&#039;&#039;[[तमाशा]]&#039;&#039;&#039;&#039; - महाराष्ट्र&lt;br /&gt;
* &#039;&#039;&#039;[[नौटंकी]]&#039;&#039;&#039; - उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब&lt;br /&gt;
* &#039;&#039;&#039;[[भवई]]&#039;&#039;&#039; - गुजरात&lt;br /&gt;
* &#039;&#039;&#039;[[यक्षगान]]&#039;&#039;&#039; - कर्णाटक&lt;br /&gt;
* &#039;&#039;&#039;[[थेरुबुट्टू]]&#039;&#039;&#039; - तमिलनाडु&lt;br /&gt;
* &#039;&#039;&#039;[[नाचा]]&#039;&#039;&#039; - छत्तीसगढ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== इन्हें भी देखें ==&lt;br /&gt;
* [[संस्कृत नाटक]]&lt;br /&gt;
* [[हिन्दी नाटक]]&lt;br /&gt;
* [[काव्य नाटक]]&lt;br /&gt;
* [[नुक्कड़ नाटक|नुक्‍कड़ नाटक]]&lt;br /&gt;
* [[एकांकी]]&lt;br /&gt;
* [[लोकनाट्य]]&lt;br /&gt;
* [[राम लीला|रामलीला]]&lt;br /&gt;
* [[रासलीला]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बाहरी कड़ियाँ ==&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20110911205258/http://natyaprasang.blogspot.com/ संस्कृत नाटक : परम्परा तथा संभावनाएँ]&lt;br /&gt;
* [http://www.lakesparadise.com/madhumati/show_artical.php?id=1377 रंगमंच नाटक - परम्परा और प्रयोग]{{Dead link|date=जून 2020 |bot=InternetArchiveBot }} (मधुमती)&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20140328200716/http://books.google.co.in/books?id=-5PbuRFBc34C&amp;amp;printsec=frontcover#v=onepage&amp;amp;q&amp;amp;f=false आधुनिक भारतीय रंगलोक] (गूगल पुस्तक ; लेखक - जय देव तनेजा)&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20071011121504/http://asiarecipe.com/indfolk.html Folk Theatre of India]&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20071004153922/http://narasimhan.com/SK/Culture/Art/thtr_folk%20theatre.htm The emergence of folk theatre]&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20100823021006/http://abhinavrangmandal.com/aite.html अभिनव नाट्यकला शिक्षा संस्थान]&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20110911205258/http://natyaprasang.blogspot.com/ नाट्य प्रसंग] (भारतेन्दु मिश्र का हिन्दी चिट्ठा)&lt;br /&gt;
* [http://books.google.co.in/books?id=L1sNOnjqe2kC&amp;amp;printsec=frontcover#v=onepage&amp;amp;q&amp;amp;f=false रंग दस्तावेज़: सौ साल, 1850-1950] (गूगल पुस्तक ; लेखक - महेश आनन्द)&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20110929121828/http://www.hindilok.com/kathadesh-september-2011-hindi-rang-paridrishay-09201119.html हिन्दी रंगपरिदृश्य और नाट्यालेखन]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:नाट्यकला]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:संस्कृति]]&lt;/div&gt;</summary>
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