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	<title>भारतपीडिया - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
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		<title>बहादुर शाह ज़फ़र</title>
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		<updated>2021-03-22T07:10:50Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;2409:4053:2D83:1F98:9E54:EFB:BC36:3529: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Bahadur Shah II - aka Zafar - Project Gutenberg eText 17711.jpg|thumb|250px|बहादुर शाह ज़फ़र]]&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;बहादुर शाह ज़फर&#039;&#039;&#039; (1775-1862) [[भारत]] में [[मुग़ल साम्राज्य]] के आखिरी शहंशाह, और [[उर्दू]] के जानेे-माने शायर थे। क्रांति के महानायक मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर ने [[१८५७ का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम]] में भारतीय सिपाहियों का नेतृत्व किया। युद्ध में हार के बाद अंग्रेजों ने उन्हें बर्मा (अब [[म्यांमार]]) भेज दिया जहाँ उनकी मृत्यु हुई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब मेजर हडसन मुगल सम्राट को गिरफ्तार करने के लिए हुमायूं के मकबरे में पहुंचा, जहां पर बहादुर शाह ज़फर अपने दो बेटों के साथ छुपे हुए थे, तो उसने (मेजर हडसन) की स्वयं उर्दू का थोड़ा ज्ञान रखता था ,कहा -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;दमदमे में दम नहीं है ख़ैर मांगो जान की..&lt;br /&gt;
ऐ ज़फर ठंडी हुई अब तेग हिंदुस्तान की..&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस पर ज़फ़र ने उत्तर दिया-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;ग़ज़ियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की..&lt;br /&gt;
तख़्त ऐ लंदन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की.&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
जफर का जन्म 24 अक्तूबर, 1775 में हुआ था। उनके पिता अकबर शाह द्वितीय और मां लालबाई थीं। अपने पिता की मृत्यु के बाद जफर को 28 सितंबर, 1837 में मुगल बादशाह बनाया गया। यह दीगर बात थी कि उस समय तक दिल्ली की सल्तनत बेहद कमजोर हो गई थी और मुगल बादशाह नाममात्र का सम्राट रह गया था।&lt;br /&gt;
  &lt;br /&gt;
भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की जफर को भारी कीमत भी चुकानी पड़ी थी। उनके पुत्रों और प्रपौत्रों को ब्रिटिश अधिकारियों ने सरेआम गोलियों से भून डाला। यही नहीं, उन्हें बंदी बनाकर [[रंगून]] ले जाया गया, जहां उन्होंने सात नवंबर, 1862 में एक बंदी के रूप में दम तोड़ा। उन्हें रंगून में श्वेडागोन पैगोडा के नजदीक दफनाया गया। उनके दफन स्थल को अब बहादुर शाह जफर दरगाह के नाम से जाना जाता है। आज भी कोई देशप्रेमी व्यक्ति जब तत्कालीन बर्मा (म्यंमार) की यात्रा करता है तो वह जफर की मजार पर जाकर उन्हें श्रद्धांजलि देना नहीं भूलता। लोगों के दिल में उनके लिए कितना सम्मान था उसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हिंदुस्तान में जहां कई जगह सड़कों का नाम उनके नाम पर रखा गया है, वहीं पाकिस्तान के लाहौर शहर में भी उनके नाम पर एक सड़क का नाम रखा गया है। बांग्लादेश के ओल्ड ढाका शहर स्थित विक्टोरिया पार्क का नाम बदलकर बहादुर शाह जफर पार्क कर दिया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1857 में जब हिंदुस्तान की आजादी की चिंगारी भड़की तो सभी विद्रोही सैनिकों और राजा-महाराजाओं ने उन्हें हिंदुस्तान का सम्राट माना और उनके नेतृत्व में अंग्रेजों की ईंट से ईंट बजा दी। अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय सैनिकों की बगावत को देख बहादुर शाह जफर का भी गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने अंग्रेजों को हिंदुस्तान से खदेड़ने का आह्वान कर डाला। भारतीयों ने [[दिल्ली]] और देश के अन्य हिस्सों में अंग्रेजों को कड़ी शिकस्त दी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शुरुआती परिणाम हिंदुस्तानी योद्धाओं के पक्ष में रहे, लेकिन बाद में अंग्रेजों के छल-कपट के चलते प्रथम स्वाधीनता संग्राम का रुख बदल गया और अंग्रेज बगावत को दबाने में कामयाब हो गए। बहादुर शाह जफर ने [[हुमायूँ का मकबरा|हुमायूं के मकबरे]] में शरण ली, लेकिन मेजर हडस ने उन्हें उनके बेटे मिर्जा मुगल और खिजर सुल्तान व पोते अबू बकर के साथ पकड़ लिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अंग्रेजों ने जुल्म की सभी हदें पार कर दीं। जब बहादुर शाह जफर को भूख लगी तो अंग्रेज उनके सामने थाली में परोसकर उनके बेटों के सिर ले आए। उन्होंने अंग्रेजों को जवाब दिया कि हिंदुस्तान के बेटे देश के लिए सिर कुर्बान कर अपने बाप के पास इसी अंदाज में आया करते हैं। आजादी के लिए हुई बगावत को पूरी तरह खत्म करने के मकसद से अंग्रेजों ने अंतिम मुगल बादशाह को देश से निर्वासित कर [[रंगून]] भेज दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== उर्दू के कवि ==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Autograph of His Majesty Bahadur Shah of Delhi 29th April 1844 right side.png|thumb|फारसी में कविता, जो बहादुरशाह ने लिखा।.]]&lt;br /&gt;
बहादुर शाह जफर सिर्फ एक देशभक्त मुगल बादशाह ही नहीं बल्कि उर्दू के मशहूर कवि भी थे। उन्होंने बहुत सी मशहूर उर्दू कविताएं लिखीं, जिनमें से काफी अंग्रेजों के खिलाफ बगावत के समय मची उथल-पुथल के दौरान खो गई या नष्ट हो गई। उनके द्वारा उर्दू में लिखी गई पंक्तियां भी काफी मशहूर हैं-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देश से बाहर [[यांगून|रंगून]] में भी उनकी उर्दू कविताओं का जलवा जारी रहा। वहां उन्हें हर वक्त हिंदुस्तान की फिक्र रही। उनकी अंतिम इच्छा थी कि वह अपने जीवन की अंतिम सांस हिंदुस्तान में ही लें और वहीं उन्हें दफनाया जाए लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में,&lt;br /&gt;
किस की बनी है आलम-ए-नापायदार में।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बुलबुल को बागबां से न सैयाद से गिला,&lt;br /&gt;
किस्मत में कैद लिखी थी फसल-ए-बहार में।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें,&lt;br /&gt;
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़दार में।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक शाख गुल पे बैठ के बुलबुल है शादमान,&lt;br /&gt;
कांटे बिछा दिए हैं दिल-ए-लाल-ए-ज़ार में।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उम्र-ए-दराज़ माँग के लाये थे चार दिन,&lt;br /&gt;
दो आरज़ू में कट गये, दो इन्तेज़ार में।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिन ज़िन्दगी खत्म हुए शाम हो गई,&lt;br /&gt;
फैला के पांव सोएंगे कुंज-ए-मज़ार में।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कितना है बदनसीब &#039;ज़फर&#039; दफ्न के लिए,&lt;br /&gt;
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बहादुर शाह जफर जैसे कम ही शासक होते हैं जो अपने देश को महबूबा की तरह मोहब्बत करते हैं और कू-ए-यार (प्यार की गली) में जगह न मिल पाने की कसक के साथ परदेस में दम तोड़ देते हैं। यही बुनियादी फ़र्क़ था मूलभूत हिंदुस्तानी विचारधारा के साथ जो अपने देश को अपनी माँ मानते है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बादशाह जफर ने जब रंगून में कारावास के दौरान अपनी आखिरी सांस ली तो शायद उनके लबों पर अपनी ही मशहूर गजल का यह शेर जरूर रहा होगा- &amp;quot;कितना है बदनसीब जफर दफ्न के लिए, दो गज जमीन भी न मिली कू-ए-यार में।&amp;quot;&lt;br /&gt;
  &lt;br /&gt;
भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर उर्दू के एक बड़े शायर के रूप में भी विख्यात हैं। उनकी शायरी भावुक कवि की बजाय देशभक्ति के जोश से भरी रहती थी और यही कारण था कि उन्होंने अंग्रेज शासकों को तख्ते-लंदन तक हिन्दुस्तान की शमशीर (तलवार) चलने की चेतावनी दी थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जनश्रुतियों के अनुसार प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद जब बादशाह जफर को गिरफ्तार किया गया तो उर्दू जानने वाले एक अंग्रेज सैन्य अधिकारी ने उन पर कटाक्ष करते हुए यह शेर कहा- &#039;&#039;&#039;&amp;quot;दम में दम नहीं, अब खैर मांगो जान की ए जफर अब म्यान हो चुकी है, शमशीर (तलवार) हिन्दुस्तान की..&#039;&#039;&#039;!!&amp;quot; इस पर जफर ने करारा जवाब देते हुए &#039;&#039;&#039;कहा था-&amp;quot;ग़ज़ियों में बू रहेगी जब तलक इमान की, तख्ते लंदन तक चलेगी तेग (तलवार) हिन्दुस्तान की.&#039;&#039;&#039;.!!&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत में मुगलकाल के अंतिम बादशाह कहे जाने वाले जफर को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान दिल्ली का बादशाह बनाया गया था। बादशाह बनते ही उन्होंने जो चंद आदेश दिए, उनमें से एक था [[गोहत्या]] पर रोक लगाना। इस आदेश से पता चलता है कि वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के कितने बड़े पक्षधर थे।&lt;br /&gt;
  &lt;br /&gt;
[[गोरखपुर विश्वविद्यालय]] में इतिहास के पूर्व प्राध्यापक डॉ॰ शैलनाथ चतुर्वेदी के अनुसार 1857 के समय बहादुर शाह जफर एक ऐसी बड़ी हस्ती थे, जिनका बादशाह के तौर पर ही नहीं एक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति के रूप में भी सभी सम्मान करते थे। इसीलिए बेहद स्वाभाविक था कि मेरठ से विद्रोह कर जो सैनिक दिल्ली पहुंचे उन्होंने सबसे पहले बहादुर शाह जफर को अपना बादशाह बनाया।&lt;br /&gt;
  &lt;br /&gt;
चतुर्वेदी ने बातचीत में कहा कि जफर को बादशाह बनाना सांकेतिक रूप से ब्रिटिश शासकों को एक संदेश था। इसके तहत भारतीय सैनिक यह संदेश देना चाहते थे कि भारत के केन्द्र दिल्ली में विदेशी नहीं बल्कि भारतीय शासक की सत्ता चलेगी। बादशाह बनने के बाद बहादुर शाह जफर ने गोहत्या पर पाबंदी का जो आदेश दिया था वह कोई नया आदेश नहीं था। बल्कि अकबर ने अपने शासनकाल में इसी तरह का आदेश दे रखा था। जफर ने महज इस आदेश का पालन फिर से करवाना शुरू कर दिया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देशप्रेम के साथ-साथ जफर के व्यक्तित्व का एक अन्य पहलू शायरी थी। उन्होंने न केवल गालिब, दाग, मोमिन और जौक जैसे उर्दू के बड़े शायरों को तमाम तरह से प्रोत्साहन दिया, बल्कि वह स्वयं एक अच्छे शायर थे। साहित्यिक समीक्षकों के अनुसार जफर के समय में जहां मुगलकालीन सत्ता चरमरा रही थी वहीं उर्दू साहित्य खासकर उर्दू शायरी अपनी बुलंदियों पर थी। जफर की मौत के बाद उनकी शायरी &amp;quot;कुल्लियात ए जफर&amp;quot; के नाम से संकलित की गयी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== मुग़ल सम्राटों का कालक्रम ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;center&amp;gt;&amp;lt;timeline&amp;gt;&lt;br /&gt;
ImageSize = width:1000 height:160&lt;br /&gt;
PlotArea  = left:20 right:50 bottom:50 top:10&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
Colors =&lt;br /&gt;
 id:canvas   value:white&lt;br /&gt;
 id:MUG value:orange legend: मुग़ल_साम्राज्य&lt;br /&gt;
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DateFormat = yyyy&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
 from:1526 till:1530 shift:(-5,35) color:MUG text:&amp;quot;[[बाबर]] 1526–1530&amp;quot;&lt;br /&gt;
 from:1530 till:1540 shift:(-10,-40) color:MUG text:&amp;quot;[[हुमायूँ]] 1530–1540&amp;quot;&lt;br /&gt;
 from:1540 till:1545 shift:(-5,50) color:SUR text:&amp;quot;[[शेर शाह सूरी]] 1540–1545&amp;quot;&lt;br /&gt;
 from:1545 till:1554 shift:(-10,-55) color:SUR text:&amp;quot;[[इस्लाम शाह सूरी]] 1545–1554&amp;quot;&lt;br /&gt;
 from:1555 till:1556 shift:(0,35) color:MUG text:&amp;quot;[[हुमायूँ]] 1555–1556&amp;quot;&lt;br /&gt;
 from:1556 till:1605 shift:(-35,-40) color:MUG text:&amp;quot;[[अकबर]] 1556–1605&amp;quot;&lt;br /&gt;
 from:1605 till:1627 shift:(-30,35) color:MUG text:&amp;quot;[[जहांगीर]] 1605–1627&amp;quot;&lt;br /&gt;
 from:1627 till:1658 shift:(-45,-40) color:MUG text:&amp;quot;[[शाहजहाँ]] 1627–1658&amp;quot;&lt;br /&gt;
 from:1658 till:1707 shift:(-40,35) color:MUG text:&amp;quot;[[औरंगज़ेब]] 1658–1707&amp;quot;&lt;br /&gt;
 from:1707 till:1712 shift:(-5,-40) color:MUG text:&amp;quot;[[बहादुर शाह प्रथम]] 1707–1712&amp;quot; &lt;br /&gt;
 from:1712 till:1713 shift:(0,35) color:MUG text:&amp;quot;[[जहांदार शाह]] 1712–1713&amp;quot; &lt;br /&gt;
 from:1713 till:1719 shift:(-10,-55) color:MUG text:&amp;quot;[[फर्रुख्शियार]] 1713 –1719&amp;quot; &lt;br /&gt;
 from:1719 till:1719 shift:(0,50) color:MUG text:&amp;quot;[[रफी उल-दर्जत]] 1719&amp;quot; &lt;br /&gt;
 from:1719 till:1719 shift:(0,65) color:MUG text:&amp;quot;[[रफी उद-दौलत]] 1719&amp;quot; &lt;br /&gt;
 from:1719 till:1748 shift:(-40,-70) color:MUG text:&amp;quot;[[रोशन अख्तर बहादुर]] 1719–1748&amp;quot; &lt;br /&gt;
 from:1748 till:1754 shift:(-2,35) color:MUG text:&amp;quot;[[अहमद शाह बहादुर]] 1748–1754&amp;quot; &lt;br /&gt;
 from:1754 till:1759 shift:(-5,-40) color:MUG text:&amp;quot;[[अज़ीज़ुद्दीन]] 1754–1759&amp;quot; &lt;br /&gt;
 from:1759 till:1760 shift:(-5,50) color:MUG text:&amp;quot;[[मुही-उल-मिल्लत]] 1759–1760&amp;quot; &lt;br /&gt;
 from:1759 till:1806 shift:(-45,-55) color:MUG text:&amp;quot;[[अली गौहर]] 1759–1806&amp;quot; &lt;br /&gt;
 from:1806 till:1837 shift:(-45,35) color:MUG text:&amp;quot;[[अकबर शाह द्वितीय|अकबर शाह II]] 1806–1837&amp;quot; &lt;br /&gt;
 from:1837 till:1857 shift:(-30,-40) textcolor:ACTIVE color:MUG text:&amp;quot;बहादुर शाह II 1837–1857&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;lt;/timeline&amp;gt;&amp;lt;/center&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== गैलरी ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:The Emperor Bahadur Shah II Enthroned.jpg|बहादुर शाह द्वितीय का राज्यारोहण&lt;br /&gt;
चित्र:&amp;quot;Capture of the King of Delhi by Captain Hodson&amp;quot;.jpg|कैप्टन हॉड्सन द्वारा बन्दी बनाये गये बहादुर शाह द्वितीय&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[भारतीय स्वतन्त्रता का प्रथम संग्राम]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बाहरी कड़ियां ==&lt;br /&gt;
* [http://www.livehindustan.com/news/desh/national/39-39-77569.html जफर: देश को महबूबा मानने वाला अंतिम मुगल सम्राट]&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20090204050337/http://kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%AC%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%B0_%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B9_%E0%A4%9C%E0%A4%BC%E0%A4%AB%E0%A4%BC%E0%A4%B0 ज़फ़र की रचनाएँ, कविता कोश में]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:व्यक्तिगत जीवन]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:भारत का इतिहास]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:भारतीय स्वतंत्रता सेनानी]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>2409:4053:2D83:1F98:9E54:EFB:BC36:3529</name></author>
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