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	<title>भारतपीडिया - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
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		<title>राममनोहर लोहिया</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;2409:4063:4D91:8E02:0:0:848A:FE13: /* स्मारक */आम के स्थान पे नाम किया है sir.. जो कि ग़लती से लिख गया होगा..&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{Infobox person&lt;br /&gt;
| name               = राममनोहर लोहिया&lt;br /&gt;
| image              = Ram Manohar Lohia 1977 stamp of India.jpg&lt;br /&gt;
| image_size         = &lt;br /&gt;
| alt                = &lt;br /&gt;
| caption            = १९७७ के एक डाकटिकट पर लोहिया&lt;br /&gt;
| birth_date         = {{birth date|df=yes|1910|03|23}}&lt;br /&gt;
| birth_place        = [[अकबरपुर, अंबेडकर नगर|अकबरपुर]], [[उत्तर प्रदेश]]&lt;br /&gt;
| death_date         = {{death date and age|df=yes|1967|10|12|1910|03|23}}&lt;br /&gt;
| death_place        = [[नयी दिल्ली]]&lt;br /&gt;
| death_cause        = &lt;br /&gt;
| resting_place      = &lt;br /&gt;
| resting_place_coordinates = &lt;br /&gt;
| nationality        = Indian&lt;br /&gt;
| other_names        = &lt;br /&gt;
| movement           = [[भारत छोड़ो आन्दोलन]]&amp;lt;br&amp;gt;[[भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन]]&lt;br /&gt;
| education          = &lt;br /&gt;
| alma_mater         = [[कोलकाता विश्वविद्यालय]] (बीए)&amp;lt;br&amp;gt;[[हम्बोल्ट विश्वविद्यालय]], [[बर्लिन]] ([[पीएच डी]])&lt;br /&gt;
| party              = [[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस]]&amp;lt;br&amp;gt;[[प्रजा समाजवादी पार्टी]]&amp;lt;br&amp;gt;[[संयुक्त समाजवादी दल]]&lt;br /&gt;
| religion           = &lt;br /&gt;
| spouse             = &lt;br /&gt;
| children           = &lt;br /&gt;
| parents            = &lt;br /&gt;
| awards             = &lt;br /&gt;
| signature          = &lt;br /&gt;
| footnotes          = &lt;br /&gt;
| website            = {{URL|www.lohiatoday.com}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;डॉ॰ राममनोहर लोहिया&#039;&#039;&#039; (जन्म - [[२३ मार्च]], [[१९१०]] - मृत्यु - [[१२ अक्तूबर|१२ अक्टूबर]], [[१९६७|१९६७]]) भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के सेनानी, प्रखर चिन्तक तथा [[समाजवाद|समाजवादी]] राजनेता थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== जीवनवृत्त ==&lt;br /&gt;
=== आरम्भिक जीवन एवं शिक्षा ===&lt;br /&gt;
डॉ॰ राममनोहर लोहिया का जन्म 23 मार्च 1910 को [[उत्तर प्रदेश]] के [[अयोध्या जिला|अयोध्या]] जनपद में (वर्तमान-अम्बेडकर नगर जनपद) &#039;&#039;&#039;अकबरपुर&#039;&#039;&#039; नामक स्थान में हुआ था। उनके पिताजी श्री हीरालाल पेशे से अध्यापक व हृदय से सच्चे राष्ट्रभक्त थे। ढाई वर्ष की आयु में ही उनकी माताजी (चन्दा देवी) का देहान्त हो गया।। उन्हें दादी के अलावा सरयूदेई, (परिवार की नाईन) ने पाला। टंडन पाठशाला में चौथी तक पढ़ाई करने के बाद विश्वेश्वरनाथ हाईस्कूल में दाखिल हुए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनके पिताजी [[महात्मा गांधी|गाँधीजी]] के अनुयायी थे। जब वे गांधीजी से मिलने जाते तो राम मनोहर को भी अपने साथ ले जाया करते थे। इसके कारण गांधीजी के विराट व्यक्तित्व का उन पर गहरा असर हुआ। पिताजी के साथ 1918 में [[अहमदाबाद]] कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार शामिल हुए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[बंबई]] के मारवाड़ी स्कूल में पढ़ाई की। [[बाल गंगाधर तिलक|लोकमान्य गंगाधर तिलक]] की मृत्यु के दिन विद्यालय के लड़कों के साथ 1920 में पहली अगस्त को हड़ताल की। गांधी जी की पुकार पर 10 वर्ष की आयु में स्कूल त्याग दिया। पिताजी को विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के आंदोलन के चलते सजा हुई। 1921 में फैजाबाद किसान आंदोलन के दौरान [[जवाहरलाल नेहरू]] से मुलाकात हुई। 1924 में प्रतिनिधि के रूप में कांग्रेस के [[गया]] अधिवेशन में शामिल हुए। 1925 में मैट्रिक की परीक्षा दी। कक्षा में 61 प्रतिशत नंबर लाकर प्रथम आए। इंटर की दो वर्ष की पढ़ाई [[वाराणसी|बनारस]] के [[काशी हिन्दू विश्‍वविद्यालय|काशी विश्वविद्यालय]] में हुई। कॉलेज के दिनों से ही [[खादी|खद्दर्]] पहनना शुरू कर दिया। 1926 में पिताजी के साथ [[गुवाहाटी|गौहाटी]] कांग्रेस अधिवेशन में गए। 1927 में इंटर पास किया तथा आगे की पढ़ाई के लिए [[कोलकाता|कलकत्ता]] जाकर ताराचंद दत्त स्ट्रीट पर स्थित पोद्दार छात्र हॉस्टल में रहने लगे। विद्यासागर कॉलेज में दाखिला लिया। अखिल बंग विद्यार्थी परिषद के सम्मेलन में [[सुभाष चन्द्र बोस|सुभाषचंद्र बोस]] के न पहुंचने पर उन्होंने सम्मेलन की अध्यक्षता की। 1928 में कलकता में कांग्रेस अधिवेशन में शामिल हुए। 1928 से अखिल भारतीय विद्यार्थी संगठन में सक्रिय हुए। [[साइमन कमीशन|साइमन कमिशन]] के बहिष्कार के लिए छात्रों के साथ आंदोलन किया। कलकत्ता में युवकों के सम्मेलन में जवाहरलाल नेहरू अध्यक्ष तथा सुभाषचंद्र बोस और लोहिया विषय निर्वाचन समिति के सदस्य चुने गए। 1930 में द्वितीय श्रेणी में बीए की परीक्षा पास की।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== यूरोप प्रवास ===&lt;br /&gt;
1930 जुलाई को लोहिया अग्रवाल समाज के कोष से पढ़ाई के लिए [[इंग्लैण्ड|इंग्लैंड]] रवाना हुए। वहाँ से वे [[बर्लिन]] गए। विश्वविद्यालय के नियम के अनुसार उन्होंने प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो॰ बर्नर जेम्बार्ट को अपना प्राध्यापक चुना। 3 महीने में [[जर्मन भाषा]] सीखी। 12 मार्च 1930 को गांधी जी ने [[दांडी मार्च|दाण्डी यात्रा]] प्रारंभ की। जब नमक कानून तोड़ा गया तब पुलिस अत्याचार से पीड़ित होकर पिता हीरालाल जी ने लोहिया को विस्तृत पत्र लिखा। 23 मार्च को [[लाहौर]] में [[भगत सिंह]] को फांसी दिए जाने के विरोध में [[राष्ट्र संघ|लीग ऑफ नेशन्स]] की बैठक में बर्लिन में पहुंचकर सीटी बजाकर दर्शक दीर्घा से विरोध प्रकट किया। सभागृह से उन्हें निकाल दिया गया। भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे [[बीकानेर]] के महाराजा द्वारा प्रतिनिधित्व किए जाने पर लोहिया ने [[रोमानिया|रूमानिया]] की प्रतिनिधि को खुली चिट्ठी लिखकर उसे अखबारों में छपवाकर उसकी कॉपी बैठक में बंटवाई। [[गांधी-इरविन समझौता|गांधी इर्विन समझौते]] का लोहिया ने प्रवासी भारतीय विद्यार्थियों की संस्था &amp;quot;मध्य यूरोप हिन्दुस्तानी संघ&amp;quot; की बैठक में संस्था के मंत्री के तौर पर समर्थन किया। [[साम्यवाद|कम्युनिस्टों]] ने विरोध किया। बर्लिन के स्पोटर्स पैलेस में [[एडोल्फ़ हिटलर|हिटलर]] का भाषण सुना। 1932 में लोहिया ने [[दांडी मार्च|नमक सत्याग्रह]] विषय पर अपना [[शोध-प्रबन्ध|शोध प्रबंध]] पूरा कर [[हम्बोल्ट बर्लिन विश्वविद्यालय|बर्लिन विश्वविद्यालय]] से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== स्वदेश आगमन एवं स्वतंत्रता संग्राम ===&lt;br /&gt;
1933 में मद्रास पहुंचे। रास्ते में सामान जब्त कर लिया गया। तब समुद्री जहाज से उतरकर [[द हिन्दू|हिन्दु]] अखबार के दफ्तर पहुंचकर दो लेख लिखकर 25 रुपया प्राप्त कर कलकत्ता गए। कलकत्ता से बनारस जाकर [[मदनमोहन मालवीय|मालवीय जी]] से मुलाकात की। उन्होंने रामेश्वर दास बिड़ला से मुलाकात कराई जिन्होंने नौकरी का प्रस्ताव दिया, लेकिन दो हफ्ते साथ रहने के बाद लोहिया ने निजी सचिव बनने से इनकार कर दिया। तब पिता जी के मित्र सेठ [[जमनालाल बजाज|जमुनालाल बजाज]] लोहिया को गांधी जी के पास ले गए तथा उनसे कहा कि ये लड़का राजनीति करना चाहता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुछ दिन तक [[जमनालाल बजाज|जमुनालाल बजाज]] के साथ रहने के बाद शादी का प्रस्ताव मिलने पर शहर छोड़कर वापस कलकत्ता चले गए। विश्व राजनीति के आगामी 10 वर्ष विषय पर [[ढाका विश्वविद्यालय]] में व्याख्यान देकर कलकत्ता आने-जाने की राशि जुटाई। [[पटना]] में 17 मई 1934 को [[नरेन्द्र देव|आचार्य नरेन्द्र देव]] की अध्यक्षता में देश के समाजवादी अंजुमन-ए-इस्लामिया हॉल में इकट्ठे हुए, जहां [[समाजवादी पार्टी]] की स्थापना का निर्णय लिया गया। यहां लोहिया ने समाजवादी आंदोलन की रूपरेखा प्रस्तुत की। पार्टी के उद्देश्यों में लोहिया ने पूर्ण स्वराज्य का लक्ष्य जोड़ने का संशोधन पेश किया, जिसे अस्वीकार कर दिया गया। 21-22 अक्टूबर 1934 को बम्बई के बर्लि स्थित &#039;रेडिमनी टेरेस&#039; में 150 समाजवादियों ने इकट्ठा होकर [[कांग्रेस समाजवादी दल|कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी]] की स्थापना की। लोहिया राष्ट्रीय कार्यकारणी के सदस्य चुने गए। कांग्रेस सोशलिस्ट सप्ताहिक मुखपत्र के सम्पादक बनाए गए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गांधी जी के विरोध में जाकर उन्होंने कांउसिल प्रवेश का विरोध किया। गांधी जी ने लोहिया के लेख पर दो पत्र लिखे। 1936 के [[मेरठ]] अधिवेशन में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों के लिए पार्टी का दरवाजा खोल दिया। लोहिया बार-बार कम्युनिस्टों के प्रति सचेत रहने की चेतावनी [[जयप्रकाश नारायण]] जी एवं अन्य नेताओं को देते रहे। 1935 में जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में [[लखनऊ]] में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ जहां लोहिया को परराष्ट्र विभाग का मंत्री नियुक्त किया गया जिसके चलते उन्हें [[इलाहाबाद]] आना पड़ा। 1938 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी में लोहिया राष्ट्रीय कार्यकारणी के सदस्य चुने गए। उन्होंने कांग्रेस के परराष्ट्र विभाग के मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। 1940 में रामगढ़ कांग्रेस के कम्युनिस्टों को पार्टी से निकालने का निर्णय लिया गया। 1939 में त्रिपुरी कांग्रेस में [[सुभाष चन्द्र बोस|सुभाष चंद्र बोस]] को समाजवादियों ने समर्थन किया। डॉ॰ लोहिया तटस्थ बने रहे। लोहिया ने गांधी जी द्वारा यह कहे जाने पर की बोस का चुनाव मेरी शिकस्त है पर प्रस्ताव पेश करते हुए कहा कि यह प्रस्ताव गांधी जी से सम्मानपूर्वक आह्वान करता है कि उनकी शिकस्त नहीं हुई है। गांधी जी की इच्छानुसार सुभाषचंद्र बोस कार्यसमिति बनाने को तैयार नहीं हुए तथा नेहरू सहित अन्य कांग्रेस के नेताओं ने बोस के साथ कार्यसमिति में रहने से इंकार कर दिया तब बोस ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया तथा कांग्रेस से नाता तोड़ लिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लोहिया ने महायुद्ध के समय युद्धभर्ती का विरोध, देशी रियासतों में आंदोलन, ब्रिटिश माल जहाजों से माल उतारने व लादने वाले मजदूरों का संगठन तथा युद्धकर्ज को मंजूर तथा अदा न करने, जैसे चार सूत्रीय मुद्दों को लेकर युद्ध विरोधी प्रचार शुरू कर दिया। 1939 के मई महीने में दक्षिण कलकता की कांग्रेस कमेटी में युद्ध विरोधी भाषण करने पर उन्हें 24 मई को गिरफ्तार किया गया। कलकत्ता के चीफ प्रेसीडेन्सी मजिस्टे्रट के सामने लोहिया ने स्वयं अपने मुकदमे की पैरवी और बहस की। 14 अगस्त को उन्हें रिहा कर दिया गया। 9 अक्टूबर 1939 को कांग्रेस समिति के बैठक [[वर्धा]] में हुई जिसमें लोहिया ने समझौते का विरोध किया। उसी समय उन्होंने &#039;&#039;&#039;शस्त्रों का नाश हो&#039;&#039;&#039; नामक प्रसिद्ध लेख लिखा। 11 मई 1940 को [[सुल्तानपुर]] के जिला सम्मेलन में लोहिया ने कांग्रेस से &#039;सत्याग्रह अभी नहीं&#039; नामक लेख लिखा। गांधी जी ने मूल रूप में लोहिया द्वारा दिए गए चार सूत्रों को स्वीकार किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
7 जून 1940 को डॉ॰ लोहिया को 11 मई को दोस्तपुर ([[सुल्तानपुर]]) में दिए गए भाषण के कारण गिरफ्तार किया गया। उन्हें कोतवाली में सुल्तानपुर में [[इलाहाबाद]] के स्वराज भवन से ले जाकर हथकड़ी पहनाकर रखा गया। 1 जुलाई 1940 को भारत सुरक्षा कानून की धारा 38 के तहत दो साल की सख्त सजा हुई। सजा सुनाने के बाद उन्हें 12 अगस्त को [[बरेली]] जेल भेज दिया गया। 15 जून 1940 को गांधी जी ने &#039;[[हरिजन]]&#039; में लिखा, कि &#039;मैं युद्ध को गैर कानूनी मानता हूं किन्तु युद्ध के खिलाफ मेरे पास कोई योजना नहीं है इस वास्ते मैं युद्ध से सहमत हूं।&#039; 25 अगस्त को गांधी जी ने लिखा कि &#039;लोहिया और दूसरे कांग्रेस वालों की सजाएं हिन्दुस्तान को बांधने वाली जंजीर को कमजोर बनाने वाले हथौडे क़े प्रहार हैं। सरकार कांग्रेस को सिविल-नाफरमानी आरंभ करने और आखिरी प्रहार करने के लिए प्रेरित कर रही है। यद्यपि कांग्रेस उसे उस दिन तक के लिए स्थगित करना चाहती है जब तक इंग्लैंड मुसीबत में हो।&#039; गांधी जी ने बंबई में कहा, कि &#039;जब तक डॉ॰ राममनोहर लोहिया जेल में है तब तक मैं खामोश नहीं बैठ सकता, उनसे ज्यादा बहादुर और सरल आदमी मुझे मालूम नहीं। उन्होंने हिंसा का प्रचार नहीं किया जो कुछ किया है उनसे उनका सम्मान बढ़ता है।&#039; 4 दिसम्बर 1941 को अचानक लोहिया को रिहा कर दिया गया तथा देश के अन्य जेलों में बंद कांग्रेस के नेताओं को छोड़ दिया गया। 19 अप्रैल 1942 को हरिजन में लोहिया का लेख &#039;विश्वासघाती जापान या आत्मसंतुष्ट ब्रिटेन&#039; गांधी जी द्वारा प्रकाशित किया गया। गांधी जी ने टिप्पणी की कि मेरी उम्मीद है कि सभी संबंधित इसके प्रति ध्यान देंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन् 1942 में [[इलाहाबाद]] में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, जहां लोहिया ने खुलकर नेहरू का विरोध किया। इसके बाद [[अल्मोड़ा]] जिला सम्मेलन में लोहिया ने &#039;नेहरू को झट पलटने वाला नट&#039; कहा। गांधी जी के साथ एक सप्ताह रहकर लोहिया ने गांधी जी को वाइसराय के नाम पत्र लिखने के लिए प्रेरित किया। जिसमें गांधी जी ने लिखा कि अहिंसानिष्ट सोशलिस्ट डॉ॰ लोहिया ने भारतीय शहरों को बिना पुलिस व फौज के शहर घोषित करने की कल्पना निकाली है। लोहिया जी के द्वारा दुनिया की सभी सरकारों को नई दुनिया की बुनियाद बनाने की योजना की कल्पना गांधी जी के सामने रखी गई, जिसमें एक देश की दूसरे देश में जो पूंजी लगी है उसे जब्त करना, सभी लोगों को संसार में कहीं भी आने-जाने व बसने का अधिकार देना, दुनिया के सभी राष्ट्रों को राजनैतिक आजादी तथा विश्व नागरिकता की बात कही गई थी। गांधी जी ने इसे हरिजन में छापा और अपनी ओर से समर्थन भी किया तथा अंग्रेजों के खिलाफ जल्दी लड़ाई छेड़ने को लेकर गांधी जी ने दस दिन रूकने के लिए लोहिया को कहा। दस दिन बाद 7 अगस्त 1942 को गांधीजी ने तीन घंटे तक भाषण देकर कहा, कि &#039;हम अपनी आजादी लड़कर प्राप्त करेंगे।&#039; अगले दिन 8 अगस्त को &#039;भारत छोड़ो&#039; प्रस्ताव बंबई में बहुमत से स्वीकृत हुआ। गांधी जी ने &#039;&#039;&#039;करो या मरो&#039;&#039;&#039; का संदेश दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== भारत छोड़ो आन्दोलन ====&lt;br /&gt;
9 अगस्त १९४२ को जब गांधी जी व अन्य कांग्रेस के नेता गिरफ्तार कर लिए गए, तब लोहिया ने भूमिगत रहकर &#039;[[भारत छोड़ो आन्दोलन|भारत छोड़ो आंदोलन]]&#039; को पूरे देश में फैलाया। लोहिया, [[अच्युत पटवर्धन]], सादिक अली, पुरूषोत्तम टिकरम दास, मोहनलाल सक्सेना, रामनन्दन मिश्रा, सदाशिव महादेव जोशी, साने गुरूजी, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, अरूणा आसिफअली, [[सुचेता कृपलानी]] और पूर्णिमा बनर्जी आदि नेताओं का केन्द्रीय संचालन मंडल बनाया गया। लोहिया पर नीति निर्धारण कर विचार देने का कार्यभार सौंपा गया। भूमिगत रहते हुए &#039;जंग जू आगे बढ़ो, क्रांति की तैयारी करो, आजाद राज्य कैसे बने&#039; जैसी पुस्तिकाएं लिखीं। 20 मई 1944 को लोहिया जी को [[बंबई]] में गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के बाद [[लाहौर किला|लाहौर किले]] की एक अंधेरी कोठरी में रखा गया जहां 14 वर्ष पहले [[भगत सिंह]] को [[फांसी]] दी गई थी। पुलिस द्वारा लगातार उन्हें यातनाएँ दी गई, 15-15 दिन तक उन्हें सोने नहीं दिया जाता था। किसी से मिलने नहीं दिया गया 4 महीने तक ब्रुश या पेस्ट तक भी नहीं दिया गया। हर समय हथकड़ी बांधे रखी जाती थी। लाहौर के प्रसिद्ध वकील [[जीवनलाल कपूर]] द्वारा हैबियस कारपस की दरखास्त लगाने पर उन्हें तथा [[जयप्रकाश नारायण]] को स्टेट प्रिजनर घोषित कर दिया गया। मुकदमे के चलते सरकार को लोहिया को पढ़ने-लिखने की सुविधा देनी पड़ी। पहला पत्र लोहिया ने [[ब्रिटिश लेबर पार्टी]] के अध्यक्ष प्रो॰ हेराल्ड जे. लास्की को लिखा जिसमें उन्होंने पूरी स्थिति का विस्तृत ब्यौरा दिया। 1945 में लोहिया को [[लाहौर]] से [[आगरा]] जेल भेज दिया गया। [[द्वितीय विश्वयुद्ध]] समाप्त होने पर गांधी जी तथा कांग्रेस के नेताओं को छोड़ दिया गया। केवल लोहिया व जयप्रकाश ही जेल में थे। इसी बीच अंग्रेजों की सरकार और कांग्रेस की बीच समझौते की बातचीत शुरू हो गई। [[इंग्लैंड]] में [[लेबर पार्टी]] की सरकार बन गई सरकार का प्रतिनिधि मंडल डॉ॰ लोहिया से आगरा जेल में मिलने आया। इस बीच लोहिया के पिता हीरालाल जी की मृत्यु हो गई। किन्तु लोहिया जी ने सरकार की कृपा पर पेरोल पर छूटने से इंकार कर दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====गोवा मुक्ति आन्दोलन====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Lohia Maidan.jpg|right|thumb|300px|गोवा में राममनोहर लोहिया की प्रतिमा]]&lt;br /&gt;
11 अप्रैल 1946 को लोहिया को आगरा जेल से रिहा कर दिया गया। 15 जून को लोहिया ने [[गोवा]] के [[पणजी|पंजिम]] में &#039;[[भारतीय वायुसेना|गोवा मुक्ति आंदोलन]]&#039; की पहली सभा ली। लोहिया को 18 जून को गोवा मुक्ति आंदोलन के शुरूआत के दिन ही गिरफ्तार कर लिया गया। 14 अगस्त 1946 को &#039;हरिजन&#039; में गांधी जी ने लिखा कि, लोहिया को बधाई दी जानी चाहिए। 30 दिसम्बर 1946 को [[नोवाखाली|नवाखली]] में हिन्दु और मुसलमान के बीच के अविश्वास को दूर करने में गांधी जी के साथ विस्तृत कार्यक्रम तैयार किया। पूरे साल नवाखली, कलकत्ता, बिहार, दिल्ली सभी जगह लोहिया गांधी जी के साथ मिलकर साम्प्रदायिकता की आग को बुझाने की कोशिश करते रहे। 9 अगस्त 1947 से लगातार हिंसा रोकने का प्रयास चलता रहा। 14 अगस्त की रात को हिन्दु-मुस्लिम भाई-भाई के नारों के साथ लोहिया ने सभा की। 31 अगस्त को वातावरण फिर बिगड़ गया, गांधी जी अनशन पर बैठ गए तब लोहिया ने दंगाईयों के हथियार इकट्ठे कराए। लोहिया के प्रयास से शांति समिति की स्थापना हुई तथा 4 सितम्बर को गांधी जी ने अनशन तोड़ा। 29 सितम्बर को बेलगांव में लोहिया को फिर गिरफ्तार कर लिया गया। 26, 27, 28 फ़रवरी 1947 को सोशलिस्ट पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक में तटस्थ रहने का निर्णय लिया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ===&lt;br /&gt;
जनवरी 1947 में लोहिया ने [[नेपाली राष्ट्रीय कांग्रेस]] को स्थापित करने तथा राणाशाही के विरुद्ध सत्याग्रह प्रारंभ करने की पहल की। 25 जनवरी 1948 को बंबई हड़ताल को लेकर लोहिया जी ने गांधी जी से हड़ताल का समर्थन मांगा। 28 जनवरी को गांधी जी ने कहा कि कल आना कल पेट भर की बात होगी। 30 जनवरी को लोहिया जब बिड़ला भवन के लिए निकले तब उन्हें गांधी जी की हत्या की खबर सुनने को मिली।&lt;br /&gt;
मार्च 1948 में नासिक सम्मेलन में सोशलिस्ट दल ने कांग्रेस से अलग होने का निश्चय किया। लोहिया की प्रेरणा से रियासतों की समाप्ति का आंदोलन 650 रिसासतों में समाजवादी चला रहे थे। 2 जनवरी 1948 को रीवा में &#039;हमें चुनाव चाहिए विभाजन रद्द करो&#039; के नारे के साथ आंदोलन किया गया जिसमें पुलिस ने गोली चलाई 4 आंदोलनकारी शहीद हुए। 1949 को सोशलिस्ट पार्टी द्वारा लोहिया के नेतृत्व में नेपाली कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष विश्वेश्वर प्रसाद कोइराला के आमरण अनशन तथा नेपाल में राणाशाही के अत्याचार के खिलाफ सभा की गई। नेपाली दूतावास की ओर जब जुलूस बढ़ा तब लाठी चार्ज किया गया लोहिया को गिरफ्तार किया गया। 20 जून को देश भर में लोहिया दिवस मनाया गया। मुकदमे में दो महीने की कैद हुई। 3 जुलाई को उन्हें रिहा कर दिया गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन् 1949 में पटना में सोशलिस्ट पार्टी का दूसरा राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ। इसी सम्मेलन में लोहिया ने &#039;चौखंभा राज्य&#039; की कल्पना प्रस्तुत की। पटना में &#039;हिन्द किसान पंचायत&#039; की स्थापना भी हुई जिसका अध्यक्ष लोहिया को चुना गया। 25 नवम्बर 1949 को लखनऊ में एक लाख किसानों ने विशाल प्रदर्शन किया। 26 फ़रवरी 1950 को [[रीवा]] में &#039;हिन्द किसान पंचायत&#039; का पहला राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ। दिल्ली में 3 जून 1951 को जनवाणी दिवस पर प्रदर्शन किया गया। &#039;रोजी-रोटी कपड़ा दो नहीं तो गद्दी छोड़ दो&#039;, प्रदर्शनकारियों का मुख्य नारा था। 14 जून 1951 को सागर स्टेशन में लोहिया को गिरफ्तार कर बेंगलूर के हवालात में बंद कर दिया गया। 3 जुलाई को लोहिया छूटे। 24 जुलाई को वे विश्व सरकार के समर्थकों के सम्मेलन में [[स्वीडन]] की राजधानी स्टॉकहोम गए 17 साल बाद वे पुन: बर्लिन पहुंचे। लोहिया इंग्लैंड, पश्चिम अफ्रीका, दक्षिण पश्चिम एशिया के कई देशों में गए; [[इज़राइल|इस्रायल]] से होकर 15 नवम्बर को स्वेदश लौटे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1951 में लोहिया को 3 जुलाई को समाजवादियों के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में बुलाया गया। सम्मेलन में जर्मनी, युगोस्लाविया, अमेरिका, हवाई, जापान, हांगकांग, थाईदेश, सिंगापुर मलाया, इंडोनेशिया तथा लंका भी गए। लोहिया विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइंस्टन से प्रिंसटन में मिले। [[अल्बर्ट आइंस्टीन|आइंस्टीन]] ने कहा, कि &#039;किसी मनुष्य से मिलना कितना अच्छा होता है आदमी कितना अकेला पड़ जाता है।&#039; लोहिया ने अमरीका में सैकड़ों स्थानों पर भाषण किए। उस समय उन्होंने एशिया की समस्त सोशलिस्ट पार्टियों का संगठन निर्मित करने का विचार बनाया। 25 मार्च से 29 मार्च 1952 में एशियाई सोशलिस्ट कान्फ्रेंस हुई, लेकिन इसमें लोहिया शामिल नहीं हो सके। जयप्रकाश नरायण भारतीय प्रतिनिधिमंडल के नेता बन कर [[यांगून|रंगून]] गए। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Mani Ram Bagri1.jpg|अंगूठाकार|डॉ राममनोहर लोहिया, मणि राम बागरी, मधु लिमये, एस एम जोशी]]&lt;br /&gt;
मई 1952 में [[पचमढ़ी|पंचमढ़ी]] में सोशलिस्ट पार्टी का सम्मेलन हुआ। आम चुनाव में हार के बाद लोहिया ने चुनावों की पराजय की शव परीक्षा के बदले ठोस विचारों की ओर पार्टी को ले जाने का विचार दिया। गुजरात पार्टी सम्मेलन में इतिहास चक्र की नई व्याख्या लोहिया द्वारा प्रस्तुत की गई। 24-25 सितम्बर 1952 में सोशलिस्ट पार्टी की जनरल कौंसिल बैठक में किसान-मजदूर प्रजा पार्टी और सोशिलिस्ट पार्टी के विलय का निर्णय लिया गया। इस तरह [[प्रजा सोसलिस्ट पार्टी|प्रजा सोशलिस्ट पार्टी]] का जन्म हुआ। 29 से 31 दिसम्बर 1953 को प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का पहला सम्मेलन इलाहाबाद में हुआ। वहां लोहिया ने इलाहाबाद थीसिस प्रस्तुत की। लोहिया को उनके मना करने के बावजूद पार्टी का राष्ट्रीय महामंत्री चुना गया। 13-14 मई 1954 को उत्तर प्रदेश प्रजा सोशलिस्ट पार्टी द्वारा नहर रेट की बढ़ोतरी के खिलाफ आंदोलन शुरू किया गया। 4 जुलाई 1954 को फारूखाबाद में वाणी स्वतंत्रता के संघर्ष को लेकर भाषण दिए जाने के कारण गिरफ्तार किया गया। नागपुर में 26-28 नवम्बर 1954 के बीच केरल गोली कांड पर विचार करने के लिए सम्मेलन हुआ। लोहिया केरल मंत्रीमंडल से इस्तीफा मांग चुके थे। 31 दिसम्बर 1955 तथा 1 जनवरी 1956 को सोशलिस्ट पार्टी का स्थापना हुई। लखनऊ में लोहिया के नेतृत्व में एक लाख किसानों का प्रदर्शन हुआ। 1956 में लोहिया ने &amp;quot;मैनकाइंड&amp;quot; नामक पत्रिका शुरू की। सोशिलिस्ट पार्टी का प्रथम वार्षिक अधिवेशन भारत के मध्य बिंदु मध्यप्रदेश के ग्राम सिहोरा में 28, 29, 30 दिसम्बर 1956 को हुआ। 2 नवम्बर 1957 को लोहिया क्रिमनल लॉ एमेंडमेंड एक्ट की धारा 7 की तहत डाकिए से कुछ कहने पर अकारण गिरफ्तार कर लिया गया। 12 नवम्बर 1958 को लोहिया पूर्वोतर के दौरे पर निकले, जहां उन्हें दौरा करने से रोक दिया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक साल बाद फिर उसी स्थान उर्वसियम ([[नेफ़ा|नेफा]]) से लोहिया ने पूर्वोत्तर में प्रवेश किया, जहां उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 17 अप्रैल 1960 को कानुपर के सर्किट हाउस में अनाधिकृत प्रवेश करने के कारण अपराध बताकर उन्हें पुन: गिरफ्तार किया गया। 1961 में &#039;&#039;&#039;[[अंग्रेजी हटाओ आंदोलन]]&#039;&#039;&#039; के दौरान लोहिया की सभा पर मद्रास में पत्थर बरसाये गए। 1961 में लोहिया एथेंस, रोम और काहिरा गए। 1962 में चुनाव हुआ लोहिया नेहरू के विरुद्ध [[फूलपुर]] में चुनाव मैदान में उतरे। 11 नवम्बर 1962 को कलकत्ता में सभा कर लोहिया ने [[तिब्बत]] के सवाल को उठाया। 1963 के फारूखाबाद के लोकसभा उपचुनाव में लोहिया 58 हजार मतों से चुनाव जीते। लोकसभा में लोहिया की तीन आना बनाम पन्द्रह आना की बहस अत्यंत चर्चित रही, जिसमें उन्होंने 18 करोड़ आबादी के चार आने पर जिंदगी काटने तथा प्रधानमंत्री पर 25 हजार रुपए प्रतिदिन खर्च करने का आरोप लगाया। 9 अगस्त 1965 को लोहिया को भारत सुरक्षा कानून के अन्तर्गत गिरफ्तार किया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
; अंग्रेजी हटाओ आन्दोलन&lt;br /&gt;
लोहिया जानते थे कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में अंग्रेजी का प्रयोग आम जनता की प्रजातंत्र में शत प्रतिशत भागीदारी के रास्ते का रोड़ा है। उन्होंने इसे सामंती भाषा बताते हुए इसके प्रयोग के खतरों से बारंबार आगाह किया और बताया कि यह मजदूरों, किसानों और शारीरिक श्रम से जुड़े आम लोगों की भाषा नहीं है। उन्होंने लिखा:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
: &#039;&#039; यदि सरकारी और सार्वजनिक काम ऐसी भाषा में चलाये जाएं, जिसे देश के करोड़ों आदमी न समझ सकें, तो यह केवल एक प्रकार का जादू-टोना होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुख की बात है कि लोहिया के अंग्रेजी हटाओ आंदोलन (1957) को हिंदी का वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश के तौर पर देखा गया, जबकि लोहिया ने बार-बार यह स्पष्ट किया कि अंग्रेजी हटाओ का अर्थ हिंदी लाओ कदापि नहीं है। उन्होंने क्षेत्रीय भाषाओं की उन्नति और उनके प्रयोग की खुल कर वकालत की। उनके अनुसार अंग्रेजी हटाओ का अर्थ &#039;मातृभाषा लाओ&#039; था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय राजनीति का बेबाक और बिंदास चेहरा रहे राममनोहर लोहिया ने ५० के दशक में ही भांप लिया था। उन्होंने लोकसभा में बल देकर अपनी बात रखते हुए कहा था:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
:&#039;&#039;    अंग्रेजी को खत्म कर दिया जाए। मैं चाहता हूं कि अंग्रेजी का सार्वजनिक प्रयोग बंद हो, लोकभाषा के बिना लोक राज्य असंभव है। कुछ भी हो अंग्रेजी हटनी ही चाहिये, उसकी जगह कौन सी भाषाएं आती हैं यह प्रश्न नहीं है। हिन्दी और किसी भाषा के साथ आपके मन में जो आए सो करें, लेकिन अंग्रेजी तो हटना ही चाहिये और वह भी जल्दी। अंग्रेज गये तो अंग्रेजी चली जानी चाहिये।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== देहावसान ===&lt;br /&gt;
30 सितम्बर 1967 को लोहिया को नई दिल्ली के विलिंग्डन अस्पताल अब जिसे लोहिया अस्पताल कहा जाता है को पौरूष ग्रंथि के आपरेशन के लिए भर्ती किया गया जहां 12 अक्टूबर 1967 को उनका देहांत 57 वर्ष की आयु में हो गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== गैर-कांग्रेसवाद के शिल्पी ==&lt;br /&gt;
देश में गैर-कांग्रेसवाद की अलख जगाने वाले महान स्वतंत्रता सेनानी और समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया चाहते थे कि दुनियाभर के सोशलिस्ट एकजुट होकर मजबूत मंच बनाए। लोहिया भारतीय राजनीति में गैर कांग्रेसवाद के शिल्पी थे और उनके अथक प्रयासों का फल था कि 1967 में कई राज्यों में कांग्रेस की पराजय हुई, हालांकि केंद्र में कांग्रेस जैसे-तैसे सत्ता पर काबिज हो पायी। हालांकि लोहिया 1967 में ही चल बसे लेकिन उन्होंने गैर कांग्रेसवाद की जो विचारधारा चलायी उसी की वजह से आगे चलकर 1977 में पहली बार केंद्र में गैर कांग्रेसी सरकारी बनी। लोहिया मानते थे कि अधिक समय तक सत्ता में रहकर कांग्रेस अधिनायकवादी हो गयी थी और वह उसके खिलाफ संघर्ष करते रहे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== जैसी कथनी वैसी करनी ==&lt;br /&gt;
लोहिया के समाजवादी आंदोलन की संकल्पना के मूल में अनिवार्यत: विचार और कर्म की उभय उपस्थिति थी- जिसके मूर्तिमंत स्वरूप स्वयं डॉ॰ लोहिया थे और आजन्म उन्होंने ‘कर्म और विचार’ की इस संयुक्ति को अपने आचरण से जीवन्त उदाहरण भी प्रस्तत किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अंग्रेजों के खिलाफ भारत के स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने वाले तमाम व्यक्तित्वों की भांति लोहिया प्रभावित भी थे। वे जेल भी गए और ऐसी यातनाएं भी सहीं। आजादी से पूर्व ही कांग्रेस के भीतर उनका सोशलिस्ट ग्रुप था, लेकिन पंद्रह अगस्त सैंतालिस को अंग्रेजों से मुक्ति पाने पर वे उल्लसित तो थे लेकिन विभाजन की कीमत पर पाई गई इस स्वतंत्रता के कारण नेहरू और नेहरू की कांग्रेस से उनका रास्ता हमेशा के लिए अलग हो गया। स्वतंत्रता के नाम पर सत्ता की लिप्सा का यह खुला खेल लोहिया ने अपनी नंगी आंखों से देखा था और इसीलिए स्वतंत्रता के बाद की कांग्रेस पार्टी और कांग्रेसियों के प्रति उनमें इतना रोष और क्षोभ था कि उन्हें धुर दक्षिणपंथी और वामपंथियों दोनों को साथ लेना भी उन्हें बेहतर विकल्प ही प्रतीत हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== मौलिक एवं ठेठ देसी चिन्तक ==&lt;br /&gt;
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के राजनेताओं में लोहिया मौलिक विचारक थे।&amp;lt;ref&amp;gt;{{Cite web |url=http://www.theshillongtimes.com/c-27-aprl.htm#top |title=संग्रहीत प्रति |access-date=23 मार्च 2009 |archive-date=14 नवंबर 2006 |archive-url=https://web.archive.org/web/20061114085226/http://www.theshillongtimes.com/c-27-aprl.htm#top |url-status=dead }}&amp;lt;/ref&amp;gt; लोहिया के मन में भारतीय गणतंत्र को लेकर ठेठ देसी सोच थी। अपने इतिहास, अपनी भाषा के सन्दर्भ में वे कतई पश्चिम से कोई सिद्धांत उधार लेकर व्याख्या करने को राजी नहीं थे। सन् 1932 में जर्मनी से पीएचडी की उपाधि प्राप्त करने वाले राममनोहर लोहिया ने साठ के दशक में देश से अंग्रेजी हटाने का जो आह्वान किया। &#039;&#039;&#039;[[अंग्रेजी हटाओ आंदोलन|अंग्रेजी हटाओ आन्दोलन]]&#039;&#039;&#039; की गणना अब तक के कुछ इने गिने आंदोलनों में की जा सकती है। उनके लिए स्वभाषा राजनीति का मुद्दा नहीं बल्कि अपने स्वाभिमान का प्रश्न और लाखों–करोडों को हीन ग्रंथि से उबरकर आत्मविश्वास से भर देने का स्वप्न था– ‘‘मैं चाहूंगा कि हिंदुस्तान के साधारण लोग अपने अंग्रेजी के अज्ञान पर लजाएं नहीं, बल्कि गर्व करें। इस सामंती भाषा को उन्हीं के लिए छोड़ दें जिनके मां बाप अगर शरीर से नहीं तो आत्मा से अंग्रेज रहे हैं।’’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हलांकि लोहिया भी [[जर्मनी]] यानी विदेश से पढा़ई कर के आए थे, लेकिन उन्हें उन प्रतीकों का अहसास था जिनसे इस देश की पहचान है। [[महाशिवरात्रि|शिवरात्रि]] पर चित्रकूट में &#039;&#039;&#039;[[रामायण मेला]]&#039;&#039;&#039; उन्हीं की संकल्पना थी, जो सौभाग्य से अभी तक अनवरत चला आ रहा है। आज भी जब चित्रकूट के उस मेले में हजारों भारतवासियों की भीड़ स्वयमेव जुटती है तो लगता है कि ये ही हैं जिनकी चिंता लोहिया को थी, लेकिन आज इनकी चिंता करने के लिए लोहिया के लोग कहां हैं?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== राजनीतिक शुचिता के पक्षधर ==&lt;br /&gt;
लोहिया ही थे जो राजनीति की गंदी गली में भी शुद्ध आचरण की बात करते थे। वे एकमात्र ऐसे राजनेता थे जिन्होंने अपनी पार्टी की सरकार से खुलेआम त्यागपत्र की मांग की, क्योंकि उस सरकार के शासन में आंदोलनकारियों पर गोली चलाई गई थी। ध्यान रहे स्वाधीन भारत में किसी भी राज्य में यह पहली गैर कांग्रेसी सरकार थी– ‘‘हिंदुस्तान की राजनीति में तब सफाई और भलाई आएगी जब किसी पार्टी के खराब काम की निंदा उसी पार्टी के लोग करें।....और मै यह याद दिला दूं कि मुझे यह कहने का हक है कि हम ही हिंदुस्तान में एक राजनीतिक पार्टी हैं जिन्होंने अपनी सरकार की भी निंदा की थी और सिर्फ निंदा ही नहीं की बल्कि एक मायने में उसको इतना तंग किया कि उसे हट जाना पडा़।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== कर्मवीर ==&lt;br /&gt;
लोहिया जी केवल चिन्तक ही नहीं, एक कर्मवीर भी थे। उन्होने अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक आन्दोलनों का नेतृत्व किया। सन १९४२ में [[भारत छोड़ो आन्दोलन]] के समय [[उषा मेहता]] के साथ मिलकर उन्होने गुप्त रेडियो स्टेशन चलाया। १८ जून १९४६ को [[गोवा|गोआ]] को पुर्तगालियों के आधिपत्य से मुक्ति दिलाने के लिये उन्होने आन्दोलन आरम्भ किया। अंग्रेजी को भारत से हटाने के लिये उन्होने [[अंग्रेजी हटाओ आंदोलन|अंग्रेजी हटाओ आन्दोलन]] चलाया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== सप्त क्रान्तियाँ ==&lt;br /&gt;
लोहिया अनेक सिद्धान्तों, कार्यक्रमों और क्रांतियों के जनक हैं। वे सभी अन्यायों के विरुद्ध एक साथ जेहाद बोलने के पक्षपाती थे। उन्होंने एक साथ &#039;&#039;&#039;सात क्रांतियों&#039;&#039;&#039; का आह्वान किया। वे सात क्रान्तियां थी ये थीं-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*(१) नर-नारी की समानता के लिए क्रान्ति,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*(२) चमड़ी के रंग पर रची राजकीय, आर्थिक और दिमागी असमानता के खिलाफ क्रान्ति,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*(३) संस्कारगत, जन्मजात जातिप्रथा के खिलाफ और पिछड़ों को विशेष अवसर के लिए क्रान्ति,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*(४) परदेसी गुलामी के खिलाफ और स्वतन्त्रता तथा विश्व लोक-राज के लिए क्रान्ति,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*(५) निजी पूँजी की विषमताओं के खिलाफ और आर्थिक समानता के लिए तथा योजना द्वारा पैदावार बढ़ाने के लिए क्रान्ति,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*(६) निजी जीवन में अन्यायी हस्तक्षेप के खिलाफ और लोकतंत्री पद्धति के लिए क्रान्ति,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*(७) अस्त्र-शस्त्र के खिलाफ और सत्याग्रह के लिये क्रान्ति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन सात क्रांतियों के सम्बन्ध में लोहिया ने कहा-&lt;br /&gt;
: &#039;&#039;मोटे तौर से ये हैं सात क्रांन्तियाँ। सातों क्रांतियां संसार में एक साथ चल रही हैं। अपने देश में भी उनको एक साथ चलाने की कोशिश करना चाहिए। जितने लोगों को भी क्रांति पकड़ में आयी हो उसके पीछे पड़ जाना चाहिए और बढ़ाना चाहिए। बढ़ाते-बढ़ाते शायद ऐसा संयोग हो जाये कि आज का इन्सान सब नाइन्साफियों के खिलाफ लड़ता-जूझता ऐसे समाज और ऐसी दुनिया को बना पाये कि जिसमें आन्तरिक शांति और बाहरी या भौतिक भरा-पूरा समाज बन पाये।&#039;&#039;&amp;lt;ref&amp;gt;[http://www.pustak.org/index.php/books/bookdetails/7008/Lohiya+Ke+Vichar लोहिया के विचार]&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;[https://www.wattpad.com/2897374-%E0%A4%B8%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A4%BF-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A4%BF-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0/page/134 डॉ लोहिया की सप्तक्रांति के उद्देश्य]&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== भारत-विभाजन पर लोहिया के विचार ==&lt;br /&gt;
उस समय की तमाम ऐसी घटनाओं और स्थितियों का जिनके प्रति एक आम भारतीय नागरिक के मन में बहुत स्पष्ट और तार्किक व्याख्या नहीं है, लोहिया ने अपनी पुस्तक ‘गिल्टी मैन एंड इंडियाज पार्टीशन’ (भारत विभाजन के गुनहगार) में परद दर परत रहस्यों को खोला है। लेकिन हमारा दुर्भाग्य है कि उस समय के पूरे आंखों देखे इतिहास को ही नहीं, बल्कि उसके एक सक्रिय, जीवंत पात्र रहे लोहिया की बातों को आजाद भारत में सत्तारूढ़ दल द्वारा एक विपक्षी नेता की ‘खीझ’ से ज्यादा नहीं समझने दिया गया, जबकि सच्चाई यह है कि सत्ता हस्तांतरण के खेल की असलियत संग्रहालयों में दफन दस्तावेजों से ज्यादा लोहिया जैसे नेताओं को भी मालूम थी जिसे होते हुए उन्होंने अपनी आंखों से देखा था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== लेखन ==&lt;br /&gt;
[[Image:Ram Manohar Lohia 1997 stamp of India.jpg|right|thumb|300px|१९९७ में भारत सरकार ने लोहिया की स्मृति में डाकटिकट निकाला]]&lt;br /&gt;
डॉ राममनोहर लोहिया ने अनेकों विषयों पर अपने विचार लेख एवं पुस्तकों के रूप में प्रकाशित कीं। उनकी कुछ रचनाएँ हैं-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* अंग्रेजी हटाओ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* इतिहास चक्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* देश, विदेश नीति-कुछ पहलू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* धर्म पर एक दृष्टि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* भारतीय शिल्प&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* भारत विभाजन के गुनहगार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* मार्क्सवाद और समाजवाद&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* राग, जिम्मेदारी की भावना, अनुपात की समझ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* समलक्ष्य, समबोध&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* समदृष्टि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* सच, कर्म, प्रतिकार और चरित्र निर्माण आह्‌वान&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* समाजवादी चिंतन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* संसदीय आचरण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* संपूर्ण और संभव बराबरी और दूसरे भाषण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* हिंदू बनाम हिंदू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
; अंग्रेजी में&lt;br /&gt;
* &#039;&#039;The Caste System&#039;&#039;: Hyderabad, Navahind [1964] 147 p.&lt;br /&gt;
* &#039;&#039;Foreign Policy&#039;&#039;: Aligarh, P.C. Dwadash Shreni, [1963?] 381 p.&lt;br /&gt;
* &#039;&#039;Fragments of World Mind&#039;&#039;: Maitrayani Publishers &amp;amp; Booksellers ; Allahabad [1949] 262 p.&lt;br /&gt;
* &#039;&#039;Fundamentals of a World Mind&#039;&#039;: ed. by K.S. Karanth. Bombay, Sindhu Publications, [1987] 130 p.&lt;br /&gt;
* &#039;&#039;Guilty Men of India’s Partition&#039;&#039;: Lohia Samata Vidyalaya Nyas, Publication Dept.,[1970] 103 p.&lt;br /&gt;
* &#039;&#039;India, China, and Northern Frontiers&#039;&#039;: Hyderabad, Navahind [1963] 272 p.&lt;br /&gt;
* &#039;&#039;Interval During Politics&#039;&#039;: Hyderabad, Navahind [1965] 197 p.&lt;br /&gt;
* &#039;&#039;Marx, Gandhi and Socialism&#039;&#039;: Hyderabad, Navahind [1963] 550 p.&lt;br /&gt;
* &#039;&#039;Collected Works of Dr Lohia&#039;&#039;  समाजवादी लेखक डॉ मस्तराम कपूर द्वारा ९ भागों में सम्पादित।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==स्मारक==&lt;br /&gt;
* अवध विश्वविद्यालय का नाम बदलकर &amp;quot;[[डॉ राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय]]&amp;quot; रखा गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* उनके नाम पर भारत के एक प्रमुख विधि स्कूल का नाम [[डॉ राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय]], [[लखनऊ]] रखा गया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* [[पणजी]] के &#039;१८ जून रोड&#039; का नाम डॉ राममनोहर लोहिया के नाम पर रखा गया है। १८ जून १९४६ को इसी जगह से उन्होने पुर्तगाली शासन के विरुद्ध आन्दोलन आरम्भ किया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* सन १९७० में दिल्ली के &#039;विल्लिंगडन हॉस्पिटल&#039; का नाम बदलकर [[राम मनोहर लोहिया अस्पताल]] कर दिया गया। इसी अस्पताल में उन्होने अन्तिम सांस ली थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* [[लखनऊ]] में [[डॉ॰ राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान]] उनके नाम पर ही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* उनके गृहनगर अकबरपुर में उनके नाम पर एक सामुदायिक भवन बना है, जिसका नाम &amp;quot;डॉ राममनोहर लोहिया भवन&amp;quot; रखा गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* [[कर्नाटक]] के [[बल्लारी]] में उनके नाम से &amp;quot;लोहिया प्रकाशन&amp;quot; नामक एक प्रसिद्ध प्रकाशन संस्थान था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सन्दर्भ==&lt;br /&gt;
{{टिप्पणीसूची}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== इन्हे भी देखें ==&lt;br /&gt;
* [[जयप्रकाश नारायण]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* [[सप्तक्रांति]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* [[रामायण मेला]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बाहरी कड़ियाँ ==&lt;br /&gt;
{{wikiquote|राममनोहर लोहिया}}&lt;br /&gt;
* [http://www.socialistpartyindia.blogspot.com/2017/09/blog-post_10.html हिन्दी के सरलीकरण की नीति]  हिन्दी शब्द सृजन आदि से सम्बन्धित लोहिया के विचार)&lt;br /&gt;
* [http://www.lohiavani.com/Default.aspx लोहियावाणी] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20161019014248/http://www.lohiavani.com/Default.aspx |date=19 अक्तूबर 2016 }}&lt;br /&gt;
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