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	<title>भारतपीडिया - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
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		<title>मृच्छकटिकम्</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;2409:4063:4E95:71CE:0:0:99C8:5409: /* प्राचीनता */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{स्रोतहीन|date=अप्रैल 2019}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Raja Ravi Varma, Vasanthasena (Oleographic print).jpg|right|thumb|250px|[[राजा रवि वर्मा]] द्वारा चित्रित &#039;&#039;&#039;वसन्तसेना&#039;&#039;&#039;]]&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;मृच्छकटिकम्&#039;&#039;&#039; (अर्थात्, मिट्टी का खिलोना या मिट्टी की गाड़ी) [[संस्कृत]] [[नाटक|नाट्य साहित्य]] में सबसे अधिक लोकप्रिय [[रूपक]] है। इसमें 10 अंक है। इसके रचनाकार महाराज [[शूद्रक]] हैं। नाटक की पृष्टभूमि [[पाटलिपुत्र]] (आधुनिक [[पटना]]) है। [[भरत मुनि|भरत]] के अनुसार [[दशरूप|दस रूपों]] में से यह &#039;मिश्र प्रकरण&#039; का सर्वोत्तम निदर्शन है। &#039;मृच्छकटिकम्&#039; नाटक इसका प्रमाण है कि अंतिम आदमी को साहित्य में जगह देने की परम्परा [[भारत]] को विरासत में मिली है जहाँ चोर, गणिका, गरीब ब्राह्मण, दासी, नाई जैसे लोग दुष्ट राजा की सत्ता पलट कर गणराज्य स्थापित कर अंतिम आदमी से नायकत्व को प्राप्त होते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसकी कथावस्तु तत्कालीन समाज का पूर्ण रूप से प्रतिनिधित्त्व करती है। यह केवल व्यक्तिगत विषय पर ही नहीं,अपितु इस युग की शासन-व्यवस्था एवं राज्य-स्थिति पर भी प्रचुर प्रकाश डालता है। साथ- ही-साथ वह नागरिक-जीवन का भी यथावत् चित्र अंकित करता है। इसमें नगर की साज-सजावट, वेश्या (वारांगनाओं) का व्यवहार,दास प्रथा,जुआ (द्यूत-क्रीड़ा), &lt;br /&gt;
विट की धूर्तता,चोरी (चौरकर्म), न्यायालय में न्यायनिर्णय की व्यवस्था ,अवांछित राजा के प्रति प्रजा के द्रोह एवं जनमत के प्रभुत्त्व का सामाजिक स्वरूप भली-भाँति चित्रित किया गया है। साथ ही समाज में दरिद्रजन की स्थिति, गुणियों का सम्मान, सुख-दु:ख में समरूप मैत्री के बिदर्शन, उपकृत वर्ग की कृतज्ञता निरपराध के प्रति दंड पर क्षोभ ,राज वल्लभों के अत्याचार, वारनारी की समृद्धि एवं उदारता, प्रणय की वेदी पर बलिदान, कुलांगनाओं का आदर्श-चरित्र जैसे वैयक्तिक विषयों पर भी प्रकाश डाला गया है। इसी विशेषता के कारण यह यथार्थवादी रचना संस्कृत साहित्य में अनूठी है। इसी कारण यह पाश्चात्य सहृदयों को अत्यधिक प्रिय लगी। इसका अनुवाद विविध भाषाओं में हो चुका है और भारत तथा सुदूर [[अमेरिका]], [[रूस]], [[फ्रांस]], [[जर्मनी]],[[इटली]], [[इंग्लैण्ड]] के अनेक रंगमंचों पर इसका सफल अभिनय भी किया जा चुका है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== कथावस्तु ==&lt;br /&gt;
मृच्छकटिकम् की कथावस्तु कवि प्रतिभा से प्रसूत है। &#039;उज्जयिनी&#039;का निवासी सार्थवाह विप्रवर चारूदत्त इस प्रकरण का [[नायक]] है और दाखनिता के कुल में उत्पन्न वसंतसेना [[नायिका]] है। चारूदत्त की पत्नी &#039;धूता&#039; पूर्वपरिग्रह के अनुसार ज्येष्ठा है जिससे चारूदत्त को &#039;रोहितसेन&#039; नाम का एक पुत्र है। चारूदत्त किसी समय बहुत समृद्ध था परन्तु वह अपने दया-दाक्षिण्य के कारण निर्धन हो चला था, तथापि प्रामाणिकता, सौजन्य एवं औदार्य के नाते उसकी महती प्रतिष्ठा थी। वसंतसेना नगर की शोभा है- अत्यन्त उदार, मनस्विनी, व्यवहारकुशला, रूप&lt;br /&gt;
-गुणसंपन्ना एवं साधारण नवयौवना नायिका उत्तम प्रकृति की है और वह आसाधारण गुणों से मुग्ध हो उस पर निर्व्याज प्रेम करती है। नायक की एक साधारण और स्वीया नायिका होने के कारण यह संकीर्ण प्रकरण माना जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;मृच्छकटिकम्’ की कथा का केन्द्र है-&#039;उज्जयिनी&#039;। वह इतना बड़ा नगर है कि &#039;पाटलिपुत्र&#039; का संवाहक उसकी प्रसिद्धि सुनकर बसने को,धन्धा प्राप्त करने को आता है। हमें इसमें चातुर्वर्ण्य का समाज मिलता है– &#039;[[ब्राह्मण]]&#039;, &#039;[[क्षत्रिय]]&#039;, &#039;[[वैश्य]]&#039; और &#039;[[शूद्र]]&#039;। ब्राह्मणों का मुख्य काम पुरोहिताई था, पर वे राज-काज में भी दिलचस्पी लेते थे। इस कथा में एक बड़ी गम्भीर बात यह है कि यहाँ ब्राह्मण, व्यापारी और निम्नवर्ण मिलकर मदान्ध क्षत्रिय राज्य को उखाड़ फेंकते हैं। यह ध्यान देने योग्य बात है और फिर सोचने की बात यह है कि इस कथा का लेखक राजा शूद्रक माना जाता है जो क्षत्रियों में श्रेष्ठ कहा गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== दस अंकों का परिचय ==&lt;br /&gt;
मृच्छकटिकम् में दस अंक हैं, प्रत्येक अंक में कई दृष्य हैं। इस नाटक में एक सच्चरित्र किन्तु गरीब ब्राह्मण चारुदत्त की कहानी है जिसे सौंदर्यमयी गणिका वसन्तसेना प्रेम करती है। इसी के साथ आर्यक की राज्यप्राप्ति की राजनीतिक कथा भी गुँथी हुई है। कृतिकार ने दोनों कथाओं को कुशलता से जोड़ा है। यह नाटक मोटे तौर पर दो हिस्सों में हैं- पहला, वसन्तसेना और चारुदत्त का प्रेम-प्रसंग तथा दूसरा, राज्य विद्रोह के साथ आर्यक को राजपद की प्राप्ति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;पहला अंक (अलंकारन्यास)&#039;&#039;&#039; : इस अंक में यह कथा है कि राजा का साला शाकार उज्जयिनी की प्रसिद्ध गणिका वसन्तसेना को पाना चाहता है। अपने दो साथियों के साथ एक अँधेरी रात में वह वसन्तसेना का पीछा करता है। भयभीत वसन्तसेना चारुदत्त के घर में शारण लेती है। चोरों से बचने की बात कहकर वह अपने सारे स्वर्ण-आभूषाण चारुदत्त के घर में धरोहर के रूप में छोड़ देती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;दूसरा अंक (द्यूतकार-संवाहक)&#039;&#039;&#039; : संवाहक, जो पहले चारुदत्त की सेवा में था, जुए की लत लगने पर बहुत सा धन हार जाता है। बचाव के लिए वह वसन्तसेना के घर शारण लेता है, जो अपना कंगन देकर उसे ऋणमुक्त करती है। वह बौद्ध-भिक्षु बन जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;तीसरा अंक (संधिच्छेद)&#039;&#039;&#039; : शार्विलक नाम का ब्राह्मण वसन्तसेना की दासी मदनिका से प्रेम करता है। उसे दासत्व से छुड़ाने के लिए वह एक रात चारुदत्त के घर में [[सेंध]] लगाकर वसन्तसेना द्वारा धरोहर रखे गए सोने के सारे आभूषण चुरा लेता है। उधर चारुदत्त की पतिव्रता पत्नी धूता अपने पति को लोकनिन्दा से बचाने के लिए, चुराए गए आभूषाणों के बदले में अपनी कीमती रत्नावली देती है, चारुदत्त वह रत्नावली देकर [[विदूषक]] मैत्रेय को वसन्तसेना के घर भेजता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;चौथा अंक (मदनिका-शर्विलक)&#039;&#039;&#039; : शार्विलक चुराए हुए आभूषाण लेकर मदनिका को दासत्व से मुक्त कराने के लिए वसन्तसेना के घर पहुँचता है। चोरी की बात सुनकर मदनिका बहुत दुखी होती है। इस गलती को सुधारने की भावना से वह शार्विलक को यह समझाती है कि चोरी के आभूषाण वसन्तसेना को सौंप देने से न वह चोर रहेगा, न चारुदत्त के सिर पर ऋण रहेगा और वसन्तसेना के आभूषण उसे वापस मिल जाएँगे, शार्विलक ऐसा ही करता है। वह वसन्तसेना से कहता है कि चारुदत्त ने यह संदेश भेजा है कि घर जर्जर होने से हम स्वर्णपात्र को सुरक्षित नहीं रख सकते, अतः आप इसे अपने पास रखें। वसन्तसेना संदेश के बदले में कुछ ले जाने की बात कहकर मदनिका को शार्विलक को सौंप देती है। इसी अंक में विदूषक वसन्तसेना से मिलकर कहता है कि स्वर्णपात्र [[जुआ|जुए]] में हार गए हैं इसलिए यह रत्नावली स्वीकार करें। वसन्तसेना वास्तविकता जानती है, पर कुछ नहीं करती। वह शाम को चारुदत्त के घर आने का निश्चय करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;पाँचवाँ अंक (दुर्दिन)&#039;&#039;&#039; : इस अंक में वर्षा-ऋतु वर्णन हुआ है। वसन्तसेना चारुदत्त से मिलती है और वर्षा की झड़ी के कारण रात उसी के घर रुक जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;छठा अंक (प्रवहणविपर्यय)&#039;&#039;&#039; : सुबह चारुदत्त पुष्पकरण्डक उद्यान में घूमने जाता है, वसन्तसेना के लिए गाड़ी तैयार रखने का आदेष देकर ताकि वह उसमें उद्यान तक यात्रा कर सके। यहीं वसन्तसेना चारुदत्त के पुत्र रोहसेन को यह जिद करते देखती है कि वह मिट्टी की गाड़ी से नहीं स्वर्ण-शकटिका (सोने की गाड़ी) से खेलना चाहता है। वसन्तसेना सारे आभूषाण मिट्टी की गाड़ी में रखकर कहती है कि इससे सोने की गाड़ी बना लेना। वसन्तसेना चारुदत्त से उद्यान में भेंट करने निकलती है, पर भूल से उसी स्थान पर खड़ी शाकार की गाड़ी में बैठ जाती है। उधर कारागार तोड़कर, रक्षक को मारकर निकल भागा ग्वाले का बेटा आर्यक, बचाव के लिए चारुदत्त के वाहन में चढ़ जाता है। रास्ते में दो पुलिस के सिपाही- वीरक और चन्दनक वाहन देखते भी हैं, पर उनमें से एक आर्यक को रक्षा करने का वचन देकर जाने देता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;सातवाँ अंक (आर्यकापहरण)&#039;&#039;&#039; : राजा पालक ने सिद्धों की भविषयवाणी पर विश्वास करके जिस आर्यक नामक व्यक्ति को बन्दी बना लिया था, जब वह बंधन तोड़कर बचता हुआ चारुदत्त की गाड़ी में चढ़कर उद्यान में चारुदत्त के समक्ष आता है और उनसे शारण माँगता है। चारुदत्त उसे सुरक्षित अपनी गाड़ी में बाहर निकलवा देता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;आठवाँ अंक (वसन्तसेना-मोटन)&#039;&#039;&#039; : भूल से शाकार की गाड़ी में बैठी वसन्तसेना जब उद्यान में पहुँचती है तो चारुदत्त के स्थान पर दुष्ट शाकार से उसका सामना होता है। वसन्तसेना एक बार फिर शाकार के चंगुल में फँस जाती है, शाकार का आग्रह न मानने पर वह वसन्तसेना का गला घोंट देता है और उसे मरा जानकर पत्तों से ढक कर चला जाता है। तभी जुआरी से बौद्ध-भिक्षु बन चुका संवाहक मृतप्राय वसन्तसेना को विहार में लाकर पुनर्जीवन देता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;नवाँ अंक (व्यवहार)&#039;&#039;&#039; : शाकार चारुदत्त को वसन्तसेना की हत्या का आरोपी बनाता है। न्यायालय में विवाद चलता है, चारुदत्त स्वयं को निर्दोष साबित नहीं कर पाता। दुखी चारुदत्त अपने मित्र मैत्रेय की प्रतीक्षा करता है, जो वसन्तसेना के पास उन आभूषणों को लौटाने गया था जो वसन्तसेना ने रोहसेन की मिट्टी की गाड़ी के स्थान पर सोने की गाड़ी बना लेने को दे दिए थे। इसी क्षण वही आभूषण लेकर मैत्रेय आ जाता है। किन्तु बातचीत करते हुए मैत्रेय से बगल में संभाले हुए वे आभूषाण सबके सामने गिर पड़ते हैं और यह मान लिया जाता है कि आभूषणों के लोभ में चारुदत्त ने ही वसन्तसेना की हत्या की है। उसे मृत्युदण्ड का आदेश देकर वधस्थल की ओर ले जाया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;दसवाँ अंक (संहार)&#039;&#039;&#039; : इस अंक में एक तो शाकार का सेवक स्थवरक चारुदत्त को निर्दोष बताता है, पर उसका कोई विश्वास नहीं करता। दूसरे ठीक इसी समय प्राण बचाने वाले बौद्ध-भिक्षु बने संवाहक के साथ आकर वसन्तसेना शाकार की दुष्टता व्यक्त कर देती है और चारुदत्त झूठे आरोप से मुक्त हो जाता है। इधर राज्य में नए राजा आर्यक का आगमन होता है, वह न केवल आरोप मुक्त चारुदत्त को राज्य देता है, बल्कि झूठा आरोप लगाने के कारण शाकार को मृत्यु-दण्ड भी देता है। किन्तु चारुदत्त के कहने पर शाकार को भी क्षमा कर दिया जाता है। पतिव्रता धूता चारुदत्त के लिए मृत्यु-दण्ड का समाचार सुनकर अग्नि-प्रवेष को तत्पर हो उठती है, चारुदत्त उपस्थित होकर इस दुखद घटना को रोकता है। राजा आर्यक प्रसन्न होकर वसन्तसेना को ‘वधू’ के पद से विभूषित करता है। भिक्षु संवाहक को सब विहारों का कुलपति बना दिया जाता है। दास स्थवरक को दासता से मुक्त किया जाता है, मृत्युदण्ड देने वाले&lt;br /&gt;
चाण्डालों को चाण्डालों का प्रमुख बना दिया जाता है, यहाँ तक कि शाकार को भी अभयदान दिया जाता है। इन सुखद घटनाओं के साथ नाटक समाप्त होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== साहित्यिक समीक्षा ==&lt;br /&gt;
मृच्छकटिक की न केवल कथावस्तु ही अत्यंत रोचक है, अपितु कवि की [[चरित्र चित्रण]] की चातुरी बहुत उच्च कोटि की है। यद्यपि इसमें प्रधान [[रस]] [[विप्रलंभ शृंगार]] है तथापि हास्य, करूणा, भयानक एवं वात्सल्य जैसे हृदयहारी विविध रसों का सहज सामंजस्य है। [[ग्रीक नाट्यकला]] की दृष्टि से भी परखे जाने पर इसका मूल्य पाश्चात्य मनीषियों द्वारा बहुत ऊँचा आँका गया है। इसकी भाषा [[प्रसाद गुण]] से संपन्न हो अत्यंत प्रांजल है। [[प्राकृत]] के विविध स्वरूपों का दर्शन इसमें होता है- [[प्राच्या]], [[मागधी]] और [[शौरसेनी]] के अतिरिक्त, सर्वोत्तम [[प्राकृत महाराष्ट्री]] और आवंती के भव्य निदर्शन यहाँ उपलब्ध होते हैं। [[ग्रियर्सन]] के अनुसार इस प्रकरण में शाकारी विभाषा में टक्की प्राकृत का भी प्रयोग पाया जाता है। शब्दचयन में माधुरी एवं अर्थव्यक्ति की ओर कवि ने सविशेष ध्यान दिया है, जिससे आवंती एवं वैदर्भी रीति का निर्वाह पूर्ण रूप से हुआ है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मृच्छकटिक में दो कथाएँ हैं। एक चारुदत्त की, दूसरी आर्यक की। [[गुणाढ्य]] की [[बृहत्कथा]] में गोपाल दारक आर्यक के विद्रोह की कथा है। बृहत्कथा अपने मूल रूप में [[पैशाची]] भाषा में ‘बड्डकहा’ के नाम से लिखी गई थी। इससे प्रकट होता है कि यह नाटक ईस्वी पहली शती या दूसरी शती का है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह नाटक संस्कृत साहित्य में अपना विशेष स्थान रखता है। इसमें–&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;(१)&#039;&#039;&#039; गणिका का प्रेम है। विशुद्ध प्रेम, धन के लिए नहीं; क्योंकि वसंतसेना दरिद्र चारुदत्त से प्रेम करती है। गणिका कलाएँ जानने वाली ऊँचे दर्जे की वेश्याएँ होती थीं, जिनका समाज में आदर होता था। ग्रीक लोगों में ऐसी ही ‘हितायरा’ हुआ करती थीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;(२)&#039;&#039;&#039; गणिका गृहस्थी और प्रेम की अधिकारिणी बनती है, वधू बनती है और कवि उसे समाज के सम्मान्य पुरुष ब्राह्मण चारुदत्त से ब्याहता है। ब्याह कराता है, रखैल नहीं बनाता। स्त्री-विद्रोह के प्रति कवि की सहानुभूति है। पाँचवें अंक में ही चारुदत्त और वसंतसेना मिल जाते हैं, परन्तु लेखक का उद्देश्य वहीं पूरा नहीं होता। वह दसवें अंक तक कथा बढ़ाकर राजा की सम्मति दिलवाकर प्रेमपात्र नहीं, [[विवाह]] कराता है। वसंतसेना अन्तःपुर में पहुँचना चाहती है और पहुँच जाती है। लेखक ने इरादतन यह नतीजा अपने सामने रखा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;(३)&#039;&#039;&#039; इस नाटक में कचहरी में होने वाले पाप और राजकाज की पोल का बड़ा यथार्थवादी चित्रण है, जनता के विद्रोह की कथा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;(४)&#039;&#039;&#039; इस नाटक का नायक राजा नहीं है, व्यापारी है, जो व्यापारी-वर्ग के उत्थान का प्रतीक है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;(५)&#039;&#039;&#039; इसमें दो भाषाओं का प्रयोग है, जैसा कि प्रायः संस्कृत के और नाटकों में है। राजा, ब्राह्मण और पढ़े-लिखे लोग संस्कृत बोलते हैं और स्त्रियां और निचले तबके के लोग [[प्राकृत]]।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये इसकी विशेषताएँ हैं। इस नाटक की राजनीतिक विशेषता यह है कि इसमें क्षत्रिय राजा बुरा बताया गया है। गोप-पुत्र &#039;आर्यक&#039; एक ग्वाला है, जिसे कवि राजा बनाता है। यद्यपि कवि वर्णाश्रम को मानता है, पर वह गोप को ही राजा बनाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐसा लगता है कि यह मूलकथा पुरानी है और सम्भवतः यह घटना कोई वास्तविक घटना है जो किंवदन्ती में रह गई। दासप्रथा के लड़खड़ाते समाज का चित्रण बहुत सुन्दर हुआ है और यह हमें [[चाणक्य]] के समय में मिलता है, जब ‘आर्य’ शब्द ‘नागरिक’ ([[रोमन]] : &#039;Citizen&#039;) के रूप में प्रयुक्त मिलता है। हो सकता है, कोई पुरानी किंवदन्ती चाणक्य के बाद के समय में इस कथा में उतर आई हो। [[महात्मा बुद्ध|बुद्ध]] के समय में व्यापारियों का उत्कर्ष भी काफी हुआ था। तब उज्जयिनी का राज्य अलग था, कोसल का अलग। यहाँ भी उज्जयिनी का वर्णन है। एक जगह लगता है कि उस समय भी [[भारत]] की एकता का आभास था, जब कहा गया है कि &#039;सारी पृथ्वी आर्यक ने जीत ली&#039; – वह पृथ्वी जिसकी कैलाश पताका है। देखा जाए तो कवि यथार्थवादी था और निष्पक्ष था। उसने सबकी अच्छाइयाँ और बुराइयाँ दिखाई हैं और बड़ी गहराई से चित्रण किया है। यही उसकी सफलता का कारण है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== रचनाकार एवं रचनाकाल ==&lt;br /&gt;
यह महाराज [[शूद्रक]] की कृति मानी जाती है जो [[भास]] और [[कालिदास]] की भांति राज कवि हुए हैं। मृच्छकटिक ईसवी प्रथम शती के लगभग की रचना कही जा सकती है। कहा जाता है, [[भास]]प्रणीत &#039;चारूदत्त&#039; नामक चतुरंगी रूपक की कथावस्तु को परिवर्धित कर किसी परवर्ती [[शूद्र]] कवि के द्वारा मृच्छकटिक की रचना हुई है। वस्तुत: इसकी कथावस्तु का आधार [[बृहत्कथा]] और [[कथासरित्सागर]] में वर्णित कथाओं में मिलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== प्राचीनता ===&lt;br /&gt;
मृच्छकटिक’ की कथा का केन्द्र है उज्जयिनी। वह इतना बड़ा नगर है कि [[पाटलिपुत्र]] का संवाहक उसकी प्रसिद्धि सुनकर बसने को, धन्धा प्राप्त करने को, आता है। उस समय वह पाटलिपुत्र को महानगर नहीं कहता। इसका आशय है कि उस समय पाटलिपुत्र से अधिक महत्त्व उज्जयिनी का था। स्पष्ट ही पाटलिपुत्र बुद्ध के समय में पाटलिपुत्र (ग्राम) था, जबकि उज्जयिनी में महासेन चण्ड प्रद्योत का समृद्ध राज्य था। दूसरी प्राचीनता है कि इसमें दास प्रथा बहुत है। दास-दासी धन देकर आज़ाद कर लिए जाते थे। उस समाज में [[गणिका]] भी वधू बन जाती थी। यह सब बातें ऐसे समाज की हैं, जहाँ ज़्यादा कड़ाई नहीं मिलती, जो बाद में चालू हुई थी। बल्कि कवि ने गणिका को वधू बनाकर समाज में एक नया आदर्श रखा है। उसमें विद्रोह की भावना है। अत्याचारी को वह पशु की तरह मरवाता है, स्त्री को ऊँचा उठाता तथा दास स्थावरक को आज़ाद करता है। यों कह सकते हैं कि यह नाटक जोकि शास्त्रीय शब्दों में प्रकरण है – बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। कौन जानता है, ऐसे न जाने कितने सामाजिक नाटक काल के गाल में खो गए। [[हूण|हूणों]] से लेकर तुर्कों तक के विध्वंसों ने न जाने कितने ग्रन्थ-रत्न जला डाले !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== अनुवाद एवं टीकाएँ ==&lt;br /&gt;
मृच्छकटिक पर अनेक टीकाएँ लिखी गई। इसके अनेक [[अनुवाद]] भी हुए हैं और अनेक संस्करण भी प्रकाशित हो चुके हैं। उनमें से सर्वप्राचीन टीका [[पृथ्वीधर]] की है। [[जीवानंद]] ने भी एक व्यापक टीका लिखी। हरिदास की व्याख्या अत्यंत मार्मिक है। आर्थर रायडर द्वारा इसका अंग्रेजी अनुवाद हार्वर्ड युनिवर्सिटी सीरीज़ में प्रकाशित हुआ है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== बाहरी कड़ियाँ ==&lt;br /&gt;
* [http://books.google.co.in/books?id=OYqI4-O_bQ4C&amp;amp;printsec=frontcover#v=onepage&amp;amp;q=&amp;amp;f=false मृच्छकटिकम्] (गूगल पुस्तक ; लेखक - रमाशंकर त्रिपाठी; संस्कृत पाठ, भाषा टीका एवं हिन्दी अनुवाद सहित)&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20090305073220/http://www.sacred-texts.com/hin/lcc/index.htm &#039;&#039;The Little Clay Cart&#039;&#039; by Shudraka, translated by Arthur William Ryder (1905).]&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20141015014034/http://elearning.sol.du.ac.in/mod/book/tool/print/index.php?id=1449&amp;amp;chapterid=2172 मृच्छकटिक] (मुक्त शिक्षा विद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय)&lt;br /&gt;
* [https://web.archive.org/web/20170102084919/http://dli.ernet.in/bitstream/handle/2015/463175/The-Mrichchhakatika.pdf?sequence=1&amp;amp;isAllowed=y The-Mrichchhakatika.pdf (41.20Mb)] (भारतीय अंकीय पुस्तकालय)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:संस्कृत]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[श्रेणी:संस्कृत नाटक]]&lt;/div&gt;</summary>
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