सामग्री पर जाएँ
मुख्य मेन्यू
मुख्य मेन्यू
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
मार्गदर्शन
मुखपृष्ठ
हाल में हुए बदलाव
बेतरतीब पृष्ठ
मीडियाविकि के बारे में सहायता
भारतपीडिया
खोजें
खोजें
दिखावट
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
व्यक्तिगत उपकरण
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
लॉग-आउट किए गए संपादकों के लिए पृष्ठ
अधिक जानें
योगदान
वार्ता
"
श्रीभट्ट
" सम्पादित करें
पृष्ठ
चर्चा
हिन्दी
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
उपकरण
उपकरण
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
क्रियाएँ
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
सामान्य
कड़ियाँ
पृष्ठ से जुड़े बदलाव
विशेष पृष्ठ
पृष्ठ की जानकारी
दिखावट
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
चेतावनी:
आपने लॉग-इन नहीं किया हुआ है। अगर आप सम्पादन करते हैं तो इस पृष्ठ के सम्पादन इतिहास में आपका IP पता दृश्य होगा। अगर आप
लॉग-इन
करते हैं या
खाता बनाते हैं
तो दूसरी सुविधाओं के साथ-साथ आपके सम्पादनों का श्रेय आपके सदस्यनाम पर दिया जाएगा।
ऐन्टी-स्पैम जाँच। इसे
नहीं
भरें!
'''श्रीभट्ट ''' की [[निम्बार्क सम्प्रदाय]] के प्रमुख कवियों में गणना की जाती है।<ref name="hindisahityainfo.blogspot.in">http://hindisahityainfo.blogspot.in/2017/05/blog-post.html?spref=gp{{Dead link|date=जून 2020 |bot=InternetArchiveBot }}</ref> ==जीवन परिचय== माधुर्य के सच्चे उपासक श्रीभट्ट केशव कश्मीरी के शिष्य थे। ग्रन्थ "युगल शतक " का रचना काल निम्न दोहे में दिया है ; ;नयन वान पुनि राम शशि गनो अंक गति वाम। ;प्रगट भयो युगल शतक यह संवत अभिराम। नैन 2 वान 5 राम 3 शशि 1 उलटा करने पर 1352 तेरह सौ वावन होता है। यह श्रीयुगल शतक का रचना काल है ।<ref name="hindisahityainfo.blogspot.in"/> ==साहित्य सृजन == निम्बार्क सम्प्रदाय के विद्वानों के अनुसार श्री भट्ट जी ने बहुत दोहे लिखे थे,जिनमें से कुछ ही युगल शतक के रूप में अवशिष्ट रह गये हैं।<ref name="hindisahityainfo.blogspot.in"/><ref>{{Cite web |url=http://hi.krishnakosh.org/%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3/%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AD%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%9F |title=संग्रहीत प्रति |access-date=15 जून 2020 |archive-url=https://web.archive.org/web/20190209020814/http://hi.krishnakosh.org/%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3/%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AD%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%9F |archive-date=9 फ़रवरी 2019 |url-status=dead }}</ref> ==माधुर्य भक्ति का वर्णन== श्रीभट्ट जी के उपास्य वृन्दाविपिन विलासी [[राधा]] और [[कृष्ण]] हैं। ये सदा प्रेम में मत्त हो विविध कुंजों में अपनी लीलाओं का प्रसार करते हैं। भट्ट जी की यह जोड़ी सनातन ,एकरस -विहरण -परायण ,अविचल ,नित्य -किशोर-वयस और सुषमा का आगार है। प्रस्तुत उदाहरण में : ;राधा माधव अद्भुत जोरी। ;सदा सनातन इक रस विहरत अविचल नवल किशोर किशोरी। ;नख सिख सब सुषमा रतनागर,भरत रसिक वर हृदय सरोरी। ;जै श्रीभट्ट कटक कर कुंडल गंडवलय मिली लसत किशोरी।। राधा और कृष्ण सदा विहार में लीन रहते हैं। किन्तु इनका यह नित्य विहार कन्दर्प की क्रीड़ा नहीं है। विहार में क्रीड़ा का मूल प्रेरक तत्त्व प्रेम है न कि काम। इसी कारण नित्य-विहार के ध्यान मात्र से भक्त को मधुर रस की अनुभूति हो जाती है। अतः भट्ट जी सदा राधा-कृष्ण के इस विहार के दर्शन करना चाहते हैं और यही उनकी उपासना है। वे कहते हैं : ;सेऊँ श्री वृन्दाविपिन विलास। ;जहाँ युगल मिलि मंगल मूरति करत निरन्तर वास।। ;प्रेम प्रवाह रसिक जन प्यारै कबहुँ न छाँड़त पास। ;खा कहौं भाग की श्री भट्ट राधा -कृष्ण रस-चास।।<ref name="hindisahityainfo.blogspot.in"/> युगल किशोर की वन-विहार ,जल-विहार ,भोजन,हिंडोला,मान,सुरत आदि सभी लीलाएं समान रूप से आनन्द मूलक हैं। अतः भट्ट जी ने सभी का सरस् ढंग से वर्णन किया है। यमुना किनारे हिंडोला झूलते हुए राधा-कृष्ण का यह वर्णन बहुत सुन्दर है। इसमें झूलन के साथ तदनुकूल प्रकृति का भी उद्दीपन के रूप में वर्णन किया गया है। : हिंडोरे झूलत पिय प्यारी। ;श्री रंगदेवी सुदेवी विशाखा झोटा डेट ललिता री।। ;श्री यमुना वंशीवट के तट सुभग भूमि हरियारी। ;तैसेइ दादुर मोर करत धुनि सुनी मन हरत महारी।। ;घन गर्जन दामिनी तें डरपि पिय हिय लपटि सुकुमारी। ;जै श्री भट्ट निरखि दंपती छवि डेट अपनपौ वारी।।(युगल शतक :पृष्ठ 40 ) इसी प्रकार वर्षा में भीगते हुए राधा-कृष्ण का यह वर्णन मनोहारी है। यहाँ भाव की सुन्दरता के अतिरिक्त भाषा की सरसता ,स्पष्टता और प्रांजलता भी दर्शनीय है ; भींजत कुंजन ते दोउ आवत। ;ज्यों ज्यों बूंद परत चुनरी पर त्यों त्यों हरि उर लावत।। ;अति गंभीर झीनें मेघन की द्रुम तर छीन बिरमावत। ;जै श्री भट्ट रसिक रस लंपट हिलि मिलि हिय सचुपावत।।(युगल शतक ) सिद्धांत की बात को सिद्ध करने के लिए एक पद। जुगल किशोर हमारे ठाकुर। सदा सर्वदा हम जिनके हैं,जनम जनम घर जाये चाकर। चूक परे परिहरही न कबहू सवही भांति दया के आकर । जै श्रीभट्ट प्रकट त्रिभुवन में प्रणतनि पोषण परम सुधाकर।। ==साभार स्रोत== *ब्रजभाषा के कृष्ण-काव्य में माधुर्य भक्ति :डॉ रूपनारायण :हिन्दी अनुसन्धान परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के निमित्त :नवयुग प्रकाशन दिल्ली -७ *युगल शतक ==सन्दर्भ== [[श्रेणी:कवि]] [[श्रेणी:महाकवि]] [[श्रेणी:भारत]] [[श्रेणी:हिन्दी]] [[श्रेणी:भक्त कवि]] [[श्रेणी:भाषा]] [[श्रेणी:हिन्दी साहित्य]]
सारांश:
भारतपीडिया पर किया कोई भी योगदान अन्य सदस्यों द्वारा बदला जा सकता है और हटाया भी जा सकता है। अगर आपको अपने लिखे हुए पाठ में संपादन होना नामंजूर है तो यहाँ पर न लिखें।
आप हमें यह भी वचन देतें हैं कि यह आपने स्वयं लिखा है अथवा सार्वजनिक क्षेत्र या किसी समान मुक्त स्रोत से प्रतिलिपित किया है (अधिक जानकारी के लिये
भारतपीडिया:कॉपीराइट
देखें)।
कॉपीराइट सुरक्षित कार्यों को बिना अनुमति के यहाँ न डालें!
रद्द करें
सम्पादन सहायता
(नए विंडो में खुलता है)
इस पृष्ठ पर प्रयुक्त साँचें:
साँचा:Cite web
(
सम्पादित करें
)
साँचा:Dead link
(
सम्पादित करें
)