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राजा गिरधरदास खण्डेला
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'''गिरधरदास''' [[खण्डेला]] के राजा थे, इन्होने [[अकबर]] के दक्षिण भारतीय युद्ध अभियानों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा कई युद्ध इनकी वीरता से जीते गए। इनके वंशज ही आज गिरधरदासोत शेखावत ने उपनाम से जाने जाते है। ==जीवन== गिरधरदास खण्डेला के राजा रायसल दरबारी के कनिष्ठ पुत्र थे, लेकिन योग्यता व पिता के आज्ञाकारी होने के चलते उत्तराधिकारी के रूप में पिता के निधन के बाद वि.स.1678 में खण्डेला के राजा बने। उल्लेखनीय है कि राजा रायसल के निधन कब कहाँ हुआ, यह इतिहास में रहस्य बना हुआ है लेकिन [[जहाँगीर नामा|जहाँगीरनामा]] के उल्लेख, केसरी सिंह समर व कुछ ताम्रपत्रों के अध्ययन से विद्वान इतिहासकार राजा रायसल की मृत्यु वि.स.1678 में मानते है। राजा गिरधरदास के छः रानियाँ तथा छ: पुत्र व चार पुत्रियाँ थी। ==युद्ध अभियान== गिरधरदास अपने पिता के जीवनकाल में ही शाही सेना में प्रवेश पा गये थे। [[अकबरनामा]] के उल्लेखानुसार [[अकबर]] के 47 वें राज्य वर्ष यानी विक्रमी संवत 1659 (ई.सन 1602) में दक्षिण के युद्धाभियनों में भाग लेने हेतु [[मिर्जा अब्दुर्रहीम खानखाना]] के पुत्र [[मिर्जा ईरिज]] के साथ [[राजा रायसल]] के पुत्र गिरधरदास को भी भेजा गया था। उन सभी युद्धाभियनों में गिरधरदास रायसलोत ने मुग़ल सेना के हरावल में अग्रिम दस्ते में रहकर युद्ध लड़े थे। माना जाता है कि अनेक युद्धों में उनकी वीरता के कारण ही विजय हासिल हुई थी। [[जहाँगीर]] के शासनकाल (वि. सं.1672 ई.सन 1615) में दक्षिण के युद्धों में भाग लेने पर जिन उच्च पदस्थ हिन्दू राजा-उमरावों को भेजा गया उनमें गिरधरदास भी शामिल थे। उस वक्त वे 800 जात और 800 सवारों के मनसबदार थे। 1 राजा रायसल के निधन के बाद उनके रिक्त पद को भरने के लिए गिरधरदास को दक्षिण की बुरहानपुर छावनी भेजा गया और समय समय पर उनके मनसब में बढ़ोतरी कर 2000 जात और 1500 सवार का मनसब देकर उन्हें राजा की पदवी से अलंकृत कर दिया गया। शाहजादा खुर्रम ( [[शाह जहाँ|शाहजहाँ]] ) पिता से विद्रोह कर जब बिलोचपुर के निकट युद्धार्थ आ पहुंचा तब वहां मौजूद अब्दुर्रहीम खानखाना, दराबखान आदि अनेक मुग़ल सेनापति शाहजादे ख़ुर्रम के साथ हो गए किन्तु राजा गिरधरदास जहांगीर के पक्ष में बने रहे। ==निधन== राजा बनने के 9 महीनॉन बाद ही बुरहानपुर में सैय्यद कबीर के आकस्मिक आक्रमण का प्रतिरोध करते हुए अपने 26 साथी सैनिकों के साथ वीरगति को प्राप्त हुए। विक्रमी संवत 1680 की पौष बदी पंचमी के दिन दक्षिण के बक्शी अकीदत खां की अरजी से बादशाह जहाँगीर को गिरधरदास के मारे जाने की सूचना मिली। तब जहांगीर ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण गंभीरतम घटना मानते हुए अपनी दिनचर्या की पुस्तक "तुजुक" में उसका सविस्तार उल्लेख किया। राजा गिरधरदास के निधन के बाद उनके पुत्र द्वारकादास खण्डेला की गद्दी पर बैठे।2 ==सन्दर्भ== 1. जहाँगीरनामा भाग-2 पृष्ठ 349 2. जहाँगीरनामा भाग-2 पृष्ठ 534, 35 मुंशी देवीप्रसाद का हिंदी अनुवाद 3। खण्डेला का वृहद् इतिहास एवं शेखावतों की वंशावली {{खण्डेला}} [[श्रेणी:भारत का इतिहास]] [[श्रेणी:राजपूत साम्राज्य]] [[श्रेणी:व्यक्तिगत जीवन]] [[श्रेणी:राजस्थान का इतिहास]]
सारांश:
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