सामग्री पर जाएँ
मुख्य मेन्यू
मुख्य मेन्यू
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
मार्गदर्शन
मुखपृष्ठ
हाल में हुए बदलाव
बेतरतीब पृष्ठ
मीडियाविकि के बारे में सहायता
भारतपीडिया
खोजें
खोजें
दिखावट
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
व्यक्तिगत उपकरण
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
लॉग-आउट किए गए संपादकों के लिए पृष्ठ
अधिक जानें
योगदान
वार्ता
"
श्रीकृष्ण जुगनू
" सम्पादित करें
पृष्ठ
चर्चा
हिन्दी
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
उपकरण
उपकरण
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
क्रियाएँ
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
सामान्य
कड़ियाँ
पृष्ठ से जुड़े बदलाव
विशेष पृष्ठ
पृष्ठ की जानकारी
दिखावट
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
चेतावनी:
आपने लॉग-इन नहीं किया हुआ है। अगर आप सम्पादन करते हैं तो इस पृष्ठ के सम्पादन इतिहास में आपका IP पता दृश्य होगा। अगर आप
लॉग-इन
करते हैं या
खाता बनाते हैं
तो दूसरी सुविधाओं के साथ-साथ आपके सम्पादनों का श्रेय आपके सदस्यनाम पर दिया जाएगा।
ऐन्टी-स्पैम जाँच। इसे
नहीं
भरें!
'''''श्रीकृष्ण ‘जुगनू’''''' राजस्थान के युवा और जाने माने भारतविद पुराविशेषज्ञ हैं। इतिहास-पुरातत्त्व, शिल्प, कला, स्थापत्य, शिक्षा, धर्म, ज्योतिष, वास्तुशास्त्र व संस्कृति जैसे विषयों के अनुवाद, अध्ययन-अध्यापन, अनुसंधान और लेखन में गहरी रुचि तथा एतद्विषयक स्थलों के टोही-भ्रमण में भी गहन दिलचस्पी लेने वाले डॉ॰ श्रीकृष्ण 'जुगनू' प्राचीन ग्रंथों के संपादन और उन्हें प्रकाशित करने के संबंध में उपयोगी कार्य कर रहे हैं। [[File:श्रीकृष्ण 'जुगनू'.jpg|thumb|राजस्थान के युवा-भारतविद श्रीकृष्ण 'जुगनू']] === जन्म === इनका जन्म माता (स्व.) संतोष देवी[https://web.archive.org/web/20140811040144/http://justrajsamand.com/2013/06/21/%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%A1%E0%A5%89-%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3/][http://www.bhaskar.com/article/c-17-456345-NOR.html] और पिता (स्व.) संत मोहनलाल चौहान के यहाँ राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिलान्तर्गत ग्राम पोस्ट ''आकोला'' में 2 अक्टूबर 1964 ई. को हुआ। === शिक्षा=== शिक्षा : अधिस्नातक (प्राचीन भारतीय इतिहास, हिन्दी एवं अंग्रेजी-तीन भाषाओं में) पी.एच.डी. :- ‘मेवाड़ प्रदेश का हीड़-साहित्य’ (राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर) अन्य डिग्री:- पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा एवं शिक्षा-स्नातक, (सुखाड़िया विश्वविद्यालय उदयपुर) एवं श्रव्य-दृश्य मीडिया में दक्ष। === प्रकाशन === इतिहास-पुरातत्त्व, शिल्प, कला, स्थापत्य, शिक्षा, धर्म, ज्योतिष, वास्तु व संस्कृति आदि विषयों पर वर्ष 1978 से अद्यावधि अनेकानेक आलेखों का देश के प्रतिष्ठित पत्रों-पत्रिकाओं में सचित्र प्रकाशन। देशी-विदेशी हस्तशिल्पियों, कला प्रेमियों, राजनेताओं व समाज सुधारकों के भावात्मक साक्षात्कारों का संग्रह और प्रकाशन। दर्जनों शिलालेखों, सुरह लेखों, ताम्रपत्रों, पट्टों, पाण्डुलिपियों आदि का अध्ययन, मूलपाठों का प्रकाशन और अनुवाद। === सम्पादन === ‘राकेट’ (बाल मासिक) ‘रंगायन’ (लोक संस्कृति विषयक त्रैमासिक) सहित एक दर्जन स्मारिकाओं का सम्पादन। === पुस्तकें=== ‘राजस्थान का लोक पहनावा’ (मानव संसाधन विकास मंत्रालय के लिए शोध सर्वेक्षण), भलाभाई-बुराभाई (राजस्थानी लोककथाएँ), मेवाड़ के लोकनृत्य, विवाह बन्दनवाल (मेवाड़ के विवाह गीत), चितचोर चित्तौड़ ; दर्शनीय उदयपुर व मेवाड़ के मन्दिर, मन्दिर श्री अम्बामाताजी उदयपुर तथा लोकशक्तिपीठ आसावरामाता, मेवाड़ की जनजातीय व लोक संस्कृति, कला की कालकथा, वास्तु एवं शिलाचयन आदि कृतियाँ। === सम्मान === [[राजस्थान संस्कृत अकादमी]] [[जयपुर]] की ओर से 9 जुलाई 2013 को डॉ॰ श्रीकृष्ण जुगनू को [[जगन्नाथ सम्राट|पंडित जगन्नाथ सम्राट]] राज्य स्तरीय सम्मान दिया गया। संस्कृत में लिखित प्राचीन 'जयोतिष और वास्तु-विषयक ग्रंथों के संपादन और अनुवाद के लिए यह सम्मान उन्हें मिला।[https://web.archive.org/web/20140728012932/http://www.bhaskar.com/article/MAT-RAJ-OTH-c-17-460961-NOR.html][https://web.archive.org/web/20140808053347/http://madadgar.in/archives/21446] [[राष्ट्रीय शिक्षक सम्मान समारोह]] 2014 में इन्हें राष्ट्रपति सम्मान दिया गया। |[https://www.facebook.com/photo.php?fbid=666056500157781&set=a.122106194552817.23148.100002603115011&type=1] === प्राचीन साहित्य का सम्पादन === उन प्राचीन संस्कृत ग्रंथों की सूची, जिनका संपादन डॉ॰ श्रीकृष्ण जुगनू ने किया है, निम्नांकित हैं :- {{Div col|4}} * [[राज्याभिषेक पद्धति]] (चक्रपाणिमिश्र), * * [[मुहूर्तमाला]] (चक्रपाणिमिश्र), * * [[विश्ववल्लभ-वृक्षायुर्वेद]] (चक्रपाणिमिश्र), [https://www.facebook.com/photo.php?fbid=613036415459790&set=a.122106194552817.23148.100002603115011&type=1] * * [[ज्योतिषरत्नमाला]] (श्रीपतिभट्टाचार्य), * * [[वृक्षायुर्वेद]] (विद्यावर्रेण्यसुरपाल), * * [[मनुष्यालयचन्द्रिका]] (नीलकण्ठमूसत), * * [[वास्तुसारमण्डनम्]] (सूत्रधारमण्डन), * * [[आयतत्त्वम्]] (सूत्रधारमण्डनम्), * * [[चित्रलक्षणम्]] (नग्रजित्), * * [[राजावल्लभवास्तुशास्त्रम्]] (सूत्रधारमण्डन), * * [[देवतामूर्तिप्रकरणम्]]-[[रूपमण्डनम्]] (सूत्रधारमण्डन), * * [[वास्तुमण्डनम्]] (सूत्रधारमण्डन), * * [[कलानिधि]] (सूत्रधारगोविन्द), * * [[वास्तुमंजरी]] (सूत्रधारनाथ), * * [[प्रासादमण्डनम्]] (सूत्रधारमण्डन), * * [[मुहूर्तकल्पद्रुम]] (विट्ठुलदीक्षित), * * [[मुहूर्तदीपक]] (महादेव दैवज्ञ), * * [[शिल्पशास्त्रम्]] (बउरीमहाराणा), * * [[वास्तुविद्या]] (अज्ञातकर्तृत), * * [[योगगीता]] (मुनिब्रह्मानन्द), * * [[कलाविलास]], * * [[मानसार]], * * [[काश्यपशिल्पम्]], * * [[अपराजितापृच्छा]], * * [[वास्तुयुक्ति]], * * [[भोजवृत्ति|राजमार्तण्ड]], * * [[वत्थुसारपयरणम्]], * * [[समराङ्गणसूत्रधार|समरांगण सूत्रधार]], * * [[ज्ञानप्रकाशदीपार्णव]], * * [[मुहूर्त सर्वस्व]], * * [[ज्योतिषवृत्तशतम्]], * * [[पंचसिद्धांतिका|पंचसिद्धान्तिका]], * * [[प्रमाणमंजरी]], * * [[देवालयचन्द्रिका]] आदि। {{Div col end}} === कुछ अन्य किताबें=== [http://www.delhipubliclibrary.in/cgi-bin/koha/opac-search.pl?q=au:%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3%20%27%20%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%97%E0%A4%A8%E0%A5%82%27] ===='जुगनू' द्वारा सम्पादित जिनदत्तसूरि विरचित् ‘विवेकविलास’ ग्रन्थ की 'भूमिका' का उदाहरण ==== "''श्रीमद् जिनदत्तसूरि विरचित् ‘विवेकविलास’ में सर्वोपयोगी, सार्वभौम सिद्धान्तों को महत्त्व दिया है। विवेकविलास बहुपयोगी ग्रन्थ है। इसमें 12 उल्लासों में कुल 1327 श्लोक हैं। अनुष्टुप श्लोकों के अतिरिक्त उपसंहार के रूप में उपजाति व अन्य छन्दों का प्रयोग हुआ है। इसमें दिवस के विविध प्रहरों में करने योग्य श्रावकाचार का वर्णन हैं किन्तु स्वप्रविचार, शुद्धि-शौचाचार, प्रश्न व स्वर-नाड़ी विचार, ज्योतिष, सामुद्रिक, देवमन्दिर निर्माण, प्रतिमा लक्षण, जीर्णोद्धार, वास्तु कार्य के लिए भूमि परीक्षा, स्वामी-सेवक लक्षण, उद्यम प्रशंसा, भोजन विधि, सन्ध्याकाल विचार, शयन विधि, घटीयन्त्र, विष परीक्षा, विवाहावसर पर वर-वधू लक्षण, ग्रीष्मादि षड् ऋतु वर्णन, वर्षचर्या, श्राद्ध, वास्तु और शुद्ध गृहक्रम, गृहार्थ योग्यायोग्य वृक्ष व उनके फल, शिष्यावबोध व कलाचार्य व्यवहार, सर्पदंश के सम्बन्ध में विष के परिणाम पर वार, नक्षत्र, राशि, दिशा, दूतानुसार विचार, रत्न, षड्दर्शन परिचय, देखने के योग्यायोग्य वस्तुएँ, परदेश गमन के नियम, मन्त्रणा विचार, जाति क्लेश व उसके परिणाम तथा एकात्म रहने के फल, संक्षेप में धर्मोपदेश, ध्यान-समाधि, ब्रह्मचर्य, आत्मा-जीव, तत्त्व, चार्वाकों के मतों की खण्डना, अन्तकाल में देह त्याग, समाधिमरण आदि का प्रभूत वर्णन हुआ है। प्रशस्ति में वायडगच्छ एवं समकालीन नेरशादि, उपदेशश्रवणकर्ता का नामोल्लेख किया गया है। प्रत्येक उल्लास के अन्त में उपसंहार और उल्लास के विषयों की जीवन में उपयोगिता, अनुकरणीय निर्देश इस ग्रन्थ की अन्यान्य विशेषता है।'' ''इस लक्षण-ज्ञानात्मक ग्रन्थ के श्लोकों की प्रामाणिकता का ही यह परिणाम है कि इसके श्लोक सायण [[मध्वाचार्य|माधवाचार्यकृत]] सर्वदर्शनसंग्रह (13-14वीं सदी), सूत्रधारमण्डन कृत वास्तुमण्डन (15वीं सदी), वर्धमानसूरी कृत आचारदिनकर (15वीं सदी), वासुदेवदैवज्ञ कृत वास्तुप्रदीप (16वीं सदी), सूत्रधार गोविन्दकृत उद्धारधोरणी (16वीं सदी), टोडरमल्ल के निर्देश पर नीलकण्ठ द्वारा लिखित टोडरानन्द (16वीं सदी), मित्र मिश्र कृत वीर मित्रोदय के लक्षणप्रकाश (17वीं सदी) आदि में उद्धृत किए गए हैं। इसी प्रकार वास्तु, प्रतिमा सम्बन्धी कई मत चन्द्रांगज ठक्कर फेरु (14वीं सदी) के लिए निर्देशक बने हैं।'' ''इस ग्रन्थ में तत्कालीन जीवन व संस्कृति अच्छी झलक है। इसके सारे ही विषय रचनाकाल में तो उपयोगी थे ही आज भी इनका उपयोग किसी भी दृष्टि से कम नहीं है। प्रसंगत: सभी विषय जीवनोपयोगी है और सभी के लिए बहुत महत्त्व के हैं। ग्रन्थकार का यह मत वर्तमान में धार्मिक-साम्प्रदायिक एकता का महत्त्व प्रतिपादित करता है-ऐसा कौन व्यक्ति है जो कि ‘मेरा धर्म श्रेष्ठ है’ ऐसा नहीं कहता? किन्तु जिस प्रकार दूर खड़े मनुष्य से आम अथवा नीम का भेद नहीं जा सकता, वैसे ही धर्म का भेद उस मनुष्य से नहीं जाना सकता-श्रेष्ठो में धर्म इत्युच्चैर्बूते क: कोऽत्र नोद्धत:। भेदो न ज्ञायते तस्य दूरस्थैराम्रनिम्बवत्।।"'' ISBN 8190348388 ISBN 9788190348386 === महाराणा प्रताप - जयंती के बहाने स्मरण === * '''महाराणा प्रताप का युग - डाॅ. श्रीकृष्ण 'जुगनू', आर्यावर्त संस्कृति संस्थान, बी 216 चंदूनगर, करावल नगर रोड, दिल्ली, 2010 की भूमिका।''' ... रक्ततलाई जहां 1576 ई. के जून की 18वीं तारीख को अपने मुल्क की स्वाधीनता के लिए उन ताकतों और उनके चहेतों के दरम्यां रण रचा गया जिनमें से एक हिंदुस्तान को अपनी मुट्ठी में बांध लेने को आतुर थी और दूसरी ताकत उस हथेली की लकीरों को बदलने के लिए कफन बांधकर निकली थी। गजब के हौंसले और अजब सी दीवानगी थी। जिन पहाड़ों पर आज भी चढ़ पाना दुश्वार है और जिन घाटियों को देखकर होश फाख्ता हो जाते हैं, उनमें से योद्धाओं ने निकल-निकलकर नाग जैसा व्यूह रच दिया था। घमासान भटों और सुभटों के बीच ही नहीं था, हाथियों के बीच भी हुआ। घोड़ों ने हाथियों के सिर पर लोहे की नाल जड़े खुर चस्पा कर दिए थे।..। ... आखिर महाराणा प्रताप का युग कैसा था ? उस काल का समाज और संस्कृति कैसी थी ? बाबर के आक्रमण के दौरान देश की सबसे बड़ी ताकत मेवाड़ क्या हमेशा के लिए शांत हो गया ? शेरशाह के बाद, बाबर के पौत्र अकबर ने मेवाड़ के मान-मर्दन के लिए सारी मर्यादाएं लांघ दी मगर क्या वजह थी कि मेवाड़ के जख्मी हाथों में बलंदी के झंडे बने रहे। अकबर के कोई आधा दर्जन हमले और अभियान तथा युद्ध के बावजूद सारी मर्यादाएं महाराणा प्रताप के पस्त नहीं थे। अबुल फज़ल और फैजी जैसे कलमनिगार दिन-रात बादशाहत को जमीं पर रूहानी पेशवा साबित करने में अपना कर्तव्य समझ बैठे थे और बादशाहत के मायने बयां करने के लिए हर छोटी-छोटी बात तक लिखकर इनाम और तवज्जो अख्तियार कर रहे थे, अपना पानी बेच रहे थे, वहीं मेवाड़ अपना पानी बचाने के लिए तैयारी में लगा था। आत्म प्रशंसा में लिखने के नाम पर प्रताप ने अपने पास कुछ नहीं माना अन्यथा उसके दरबार में भी काेई अबुल फज़ल और फैजी होता। याद नहीं कि प्रताप ने अपनी प्रशंसा में काेई ग्रंथ लिखवाया हो। प्रताप के जीवनकाल में प्रशंसा की कोई पुष्पिका तक नहीं मिलती, हां चक्रपाणि मिश्र ने जरूर एकाध श्लोक प्रताप की प्रशंसा में लिखा। अधिकांश इतिहासकारों ने प्रताप को अखबर की मुखालफत करने वाले योद्धा के रूप में ही चित्रित किया है। मुगलों द्वारा देश को एकता के सूत्र में बांधने के इरादे की राह में रोड़ा बनने वाले व्यक्तित्व के रूप में वर्णित किया है। हद तो यह भी हुई कि यह काम ऐसे इतिहासकारों ने कुछ ज्यादा ही किया है, जिन्होंने मेवाड़ को देखा ही नहीं। क्षेत्रीय स्रोतों को महत्व ही नहीं दिया। फारसी स्रोतों के आधार पर उन्होंने प्रताप के व्यक्तित्व को आंकने से ही गुरेज किया। ... महाराणा प्रताप का युग कृति की रचना करते समय मैंने अपना कठोरपन बरकरार रखने का प्रयास किया है। कहीं-कहीं निष्ठुरता भी दिखाई दे सकती है, मैंने भावुकता या आतुरता से परहेज ही किया है।..। उनकी लिखवाई तीन कृतियां 1. विश्व वल्लभ, 2. राज्याभिषेक पद्धति और 3. महुर्तमाला का संपादन करके और चौथी कृति व्यवहारादर्श का संपादन करते हुए मैंने पाया कि प्रताप असामान्य व्यक्तित्व लिए थे। उनके बाद, मेवाड़ में जलाशयों की शृंखला खड़ी हुई, युद्ध पीडि़तों को पुनर्वास देकर मानवाधिकार की नींव डाली गई, उनके बाद कभी जौहर जैसी त्रासदी पेश नहं आई... कई योगदान है प्रताप के। आज के शासन संचालन के मूल में एक बड़ी रूपरेखा प्रताप के चिंतन की मानी जानी चाहिए। ---- === बाहरी कड़ियाँ=== ''श्रीकृष्ण जुगनू की कुछ प्रकाशित कृतियों के लिए दृष्टव्य-'' *[https://web.archive.org/web/20150924084522/http://www.rajhga.com/bookQryIDPS.asp?Bcod=182] *[https://www.mlbd.com/AuthorDecription.aspx?id=738]{{Dead link|date=जून 2020 |bot=InternetArchiveBot }} *[https://web.archive.org/web/20140714223254/http://www.myvedicbooks.com/brands/Shrikrishna-Jugnu-(Ed.).html] *[https://web.archive.org/web/20140714201333/http://www.udaipurtimes.com/dr-bhanawat-and-dr-jugnu-honored-at-kolkata/] *[http://www.dkagencies.com/doc/from/1023/to/21330/Author/Jugnu,%20Shrikrishna,%20(ed.)/Books-By-Indian-Author.html] *[https://web.archive.org/web/20140626041210/http://www.vedicbooks.net/advanced_search_result.php?search_in_description=1&inc_subcat=1&keywords=Shrikrishna%20Jugnu] *[https://web.archive.org/web/20140626041210/http://www.vedicbooks.net/advanced_search_result.php?search_in_description=1&inc_subcat=1&keywords=Shrikrishna%20Jugnu] *[https://web.archive.org/web/20140714133148/http://www.flipkart.com/author/shrikrishna-jugnu] *[https://web.archive.org/web/20140714165634/http://www.parimalpublication.com/subCate.aspx?id=27] *[https://web.archive.org/web/20140715001419/http://www.amazon.com/Mandanam-Dr-Shri-Krishna-Jugnu/dp/B00JYF9PQ2] *[https://web.archive.org/web/20140714144005/http://www.asianbookmart.com/servlet/getbiblio?bno=159792] *[https://web.archive.org/web/20140714144005/http://www.asianbookmart.com/servlet/getbiblio?bno=159792] *[https://web.archive.org/web/20140715001241/http://www.easternbookcorporation.com/moreinfo.php?txt_searchstring=17964] *[https://web.archive.org/web/20140715001541/http://bookvistas.com/Shrikrishna_Jugnu.aspx] *[https://web.archive.org/web/20140714161859/http://www.biblio.com/9788171103577] *[https://web.archive.org/web/20140714181110/http://shop.saptarishisastrology.com/index.php?page=browse&action=list&orderby=DESCRIPTION&group=48&cat=59] ''सरल सीधी भाषा में परम्परा और संस्कृति के सन्दर्भ देखें-[https://web.archive.org/web/20140714114707/http://www.pressnote.in/litrature-news_213550.html]'' [[श्रेणी:राजस्थान के लोग]] [[श्रेणी:उदयपुर के लोग]] [[श्रेणी:राजस्थान]] [[श्रेणी:संस्कृत संपादक]] [[श्रेणी:संस्कृत साहित्य]] [[श्रेणी:व्यक्तिगत जीवन]] [[श्रेणी:इतिहासकार]]
सारांश:
भारतपीडिया पर किया कोई भी योगदान अन्य सदस्यों द्वारा बदला जा सकता है और हटाया भी जा सकता है। अगर आपको अपने लिखे हुए पाठ में संपादन होना नामंजूर है तो यहाँ पर न लिखें।
आप हमें यह भी वचन देतें हैं कि यह आपने स्वयं लिखा है अथवा सार्वजनिक क्षेत्र या किसी समान मुक्त स्रोत से प्रतिलिपित किया है (अधिक जानकारी के लिये
भारतपीडिया:कॉपीराइट
देखें)।
कॉपीराइट सुरक्षित कार्यों को बिना अनुमति के यहाँ न डालें!
रद्द करें
सम्पादन सहायता
(नए विंडो में खुलता है)
इस पृष्ठ पर प्रयुक्त साँचें:
साँचा:Dead link
(
सम्पादित करें
)
साँचा:Div col
(
सम्पादित करें
)
साँचा:Div col end
(
सम्पादित करें
)