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== अनुवाद युग == जब अरबों का साम पर अधिकार हो गया तब उन्हें उन यूनानी ग्रंथों के अध्ययन का अवकाश मिला जिनका सामियों द्वारा [[सामी]] अथवा [[अरबी भाषा]] में अनुवाद हो चुका था। प्रसिद्ध सामी टीकाकार निम्निलिखित हैं: '''(अ)''' प्रोबस (5वीं शताब्दी के आरंभ में) जिन्हें सबसे पहला टीकाकार माना गया है। इन्होंने [[अरस्तु]] के तार्किक ग्रंथों तथा पारफरे के 'इसागाग' की व्याख्या की। '''(आ)''' रैसेन के निवासी सर्गियस (मृत्यु 536) जिन्होंने धर्म, नीतिशास्त्र, स्थूल-पदार्थ-विज्ञान, चिकित्सा तथा दर्शन संबंधी यूनानी ग्रंथों का अनुवाद किया। '''(इ)''' एदीसा के निवासी याकोब (660-708), यह मुस्लिम शासन के पश्चात् भी यूनानी धार्मिक तथा दार्शनिक ग्रंथों का अनुवाद करने में व्यस्त रहे। विशेषत: मंसूर के शासन में मुसलमानों ने भी अरबी भाषा में उन यूनानीशास्त्रों का अनुवाद करना आरंभ किया जिनका मुख्यत: संबंध पदार्थविज्ञान तथा तर्क अथवा चिकित्साशास्त्र से था। 9वीं शताब्दी में अधिकतर चिकित्सा संबंधी ग्रंथों के अनुवाद हुए परंतु दार्शनिक ग्रंथों के अनुवाद भी होते रहे। याहिया इब्ने वितृया ने अफलातून की 'तीयास' तथा अरस्तू के 'प्राणिग्रंथ', 'मनोविज्ञान', 'संसार' का अरबी भाषा में अनुवाद किया। अब्दुल्ला नईमा अलहिमाा ने अरस्तू के 'आभासात्मक' का तथा 'फिज़िक्स' और 'थियालॉजी' पर जान फियोयोनस कृत व्याख्या का अनुवाद किया। कोस्ता इब्ने लूक़ा (835) ने अरस्तू की 'फिज़िक्स' पर सिकंदरिया के अफरोदियस तथा फ़िलोपोनस लिखित व्याख्या का अनुवाद किया। इस समय के सर्वोत्तम अनुवादक अबूज़ैद हुसेन इब्ने, उनके पुत्र इसहाक़ बिन हुसेन (910) और उनके भतीजे हुवैश इब्नुल हसन थे। ये सब लोग वैज्ञानिक तथा दार्शनिक ग्रंथों का अनुवाद करने में व्यस्त थे। 10वी शताब्दी में भी यूनानी ग्रंथों के अनुवाद का काम गतिशील रहा। इस समय के प्रसिद्ध अनुवादक अबू बिश्र मत्ता (970), अबू ज़करिया याहिया इब्ने अलगंतिक़ी (974), अबू अली ईसा इब्ने इसहाक इब्ने जूरा (1008), अबुलखैर अल हसन इब्नुल खंमार (जन्म 942) आदि हैं। संक्षेप में, मुसलमानों ने ग्रीक शास्त्रों का सामी अथवा अरबी भाषा में अध्ययन किया अथवा स्वयं इन ग्रंथों का अरबी में अनुवाद किया। यूनानी विचारधारा और दार्शनिक दृष्टि सामियों द्वारा सिकंदरिया तथा अंतिओक से पूरब की ओर एदीसा, निसिबिस, हर्रान तथा गांदेशपुर में विकासमान हुई थी और मुसलमान जब विजेताधिकार से वहाँ पहुँचे तब उन्होंने, जो कुछ यूनानी दर्शन तथा शास्त्रज्ञान उपलब्ध था, उसको ग्रहण किया और धीरे धीरे भिझ भिझ समस्याओं के प्रभाव से दार्शनिक चिंतन का आरंभ हुआ।
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