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== आख्यान, आख्यायिका एवं कथा == "आख्यान" और [[संस्कृत]] "आख्यायिका" दोनों के वर्णविन्यासों में सादृश्य होने के कारण ही संभवत: [[हिंदी]] के कुछ विद्वान् "आख्यायिका" के शास्त्रीय लक्षणों को "आख्यान" के ऊपर लागू करके उसके स्वरूपसंपादन का प्रयास करते रहे हैं। किंतु संस्कृत के लक्षणशास्त्रों में परस्पर कुछ ऐसे मौलिक विरोध वर्तमान हैं कि उन्हें एक दूसरे का समानार्थक नहीं माना जा सकता। संस्कृत में आख्यायिका की श्रेणी की एक गद्यबद्ध रचना और भी होती थी, जिसे ''''कथा'''' कहते थे। [[भामह]] ने [[काव्यालंकार]] (1.25, 28) में सुंदर गद्य में रचित सरस कहानी को "आख्यायिका" कहा है। यह उच्छ्वासों में बँटी होती थी ओर इसमें नायक अपने वृत्त तथा चेष्टा का वर्णन स्वयं करता था। बीच-बीच में वक्त्र और अपवक्त्र छंद आ जाते थे, जबकि कथा में वक्त्र और अपवक्त्र छंद नहीं होते थे, न ही इसका विभाजन उच्छ्वासों में होता था। श्री परशुराम चतुर्वेदी ने लिखा है कि "आख्यायिका" की विशेषता इस बात में पाई जाती है कि वह स्वयं किसी अपने पात्र द्वारा ही कही गई होती है जिस कारण उसकी बहुत सी बातें आत्मोद्गारपरक बन जाती हैं। प्रेमाख्यानवाले "आख्यान" शब्द का मूल अर्थ भी किसी ऐसी विशेषता की ही ओर संकेत करता जाना पड़ता है। "[[महाभारत]]" एवं "[[रामायण]]" के "आख्यान" कहे जाने की सार्थकता भी कदाचित् इसी बात में निहित होगी कि उनके रचयिता क्रमश: [[वेदव्यास|व्यास]] एवं [[वाल्मीकि]] ने अपनी देखी सुनी बातें हीं लिखी थीं, उनमें कल्पना का वैसा अंश नहीं रहता, जो कथा के संबंध में प्राय: आवश्यक माना जाएा करता है। आख्यान शब्द को इसी कारण अपेक्षाकृत अधिक "वृत्तांतपरक" और तदनुसार विशुद्ध भी कह सकते हैं। अतएव प्रेमकहानी के भी मूल रूप में वस्तुत: "आपबीती" जैसी ही होने से "प्रेम" शब्द के साथ किए गए इसके प्रयोग को सर्वथा उपयुक्त समझना चाहिए (भारतीय प्रेमाख्यान की परंपरा, तृतीय अनुच्छेद)। उपर्युक्त पंक्तियों में चतुर्वेदी जी ने सीधे न कहकर कथनलाघव के माध्यम से आख्यान को आख्यायिका का सदृशार्थक सिद्ध करने का प्रयत्न किया है। एक अन्य स्थल (हिंदी साहित्य, द्वितीय खंड, सं. [[धीरेंद्र वर्मा]] तथा ब्रजेश्वर वर्मा, पृ. 245) पर भी, किंतु जरा अधिक स्पष्ट ढंग से, वह यही बात दुहराते हैं, ""प्रेमाख्यान" का "आख्यान" शब्द मूलत: आख्यायिका का ही एक रूपांतर सा प्रतीत होता है।"" किसी कथाकृति को आख्यान संज्ञा देने के लिए यदि यह नितांत आवश्यक हो कि उसके रचयिता ने कथा को स्वयं "देखा सुना" हो तो [[रामायण]] एवं [[महाभारत]] के संदर्भ में अभी तक ऐसे प्रमाण अथवा साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं कि उनके आधार पर निश्चिंत होकर यह कह दिया जए कि उनके रचयिताओं ने वही सब कुछ लिखा जो स्वयं उन्होंने "देखा सुना" था। साथ ही "देखा सुना" पद क्या अपने में अस्पष्ट एवं अनिश्चित अर्थ का द्योतक नहीं है? अस्तु, रामायण एवं महाभारत को "आख्यान" नाम देने का अवश्य ही कोई दूसरा कारण रहा होगा। [[वैदिक साहित्य]] से लेकर [[हिंदी साहित्य]] तक जितने भी आख्यान ग्रंथ मिलते हैं या जिन्हें आख्यानक ग्रंथ माना जाता है, उनमें से कोई एकाध "अपेक्षाकृत अधिक वृत्तांतपरक और तदनुसार विशुद्ध" हो तो हो, शेष कल्पनाप्रधान ही है। कथा और आख्यानक ग्रंथों की तो बात ही क्या, चरितग्रंथों और चरितकाव्यों तक में कल्पना ने इतिहास को बुरी तरह आक्रांत कर रखा है। डॉ॰ शंभुनाथ सिंह (हिंदी महाकाव्य का स्वरूपविकास, पृ. 6) ने आदिकालीन आख्यानक नृत्यगीतों से नृत्य, संगीत और आख्यान तीनों का विकास माना है। आगे चलकर (पृ. 10) उन्होंने यह भी कहा है कि इन आख्यानों का वस्तुतत्व पौराणिक, निजंधरी, समसामयिक तथा कल्पित; इन चार प्रकार के पात्रों, घटनाओं और परिस्थितियों को लेकर गठित हुआ है। पं॰ [[हजारी प्रसाद द्विवेदी]] (हिंदी साहित्य की भूमिका, पृ. 48) ने भी आख्यान को आख्यायिका से पृथक् एक लोकविधा माना है, यथा ""परंतु जनसाधारण का एक और विभाग, जिसमें धर्म का स्थान नहीं था, जो अपभ्रंश साहित्य के पश्चिमी आकर से सीधे चला आ रहा था, जो गाँवों की बैठकों में कथानक रूप से और गान रूप से चल रहा था, उपेक्षित होने लगा था। इन सूफी साधकों ने पौराणिक आख्यानों के बदले हुए लोकप्रचलित कथानकों का आश्रय लेकर ही अपनी बात जनता तक पहुँचाई।"" वस्तुत: आख्यान को आख्यायिका सिद्ध करने के कारण ही चतुर्वेदी जी को उक्त सब कुछ कहना करना पड़ा। इतना ही नहीं, भामहकालीन "आख्यायिका" के इस लक्षण-उसमें नायक अपने वृत्त तथा चेष्टा का वर्णन स्वयं करता था-को आख्यान पर घटाने के लिए उन्हें "प्रेम कहानी के मूल रूप में आपबीती जैसी" भावना की क्लिष्ट कल्पना तक करनी पड़ी। साहित्य निरंतर गतिशील है। अत: वह युगानुरूप अपनी विधाओं में परिवर्तन, परिवर्धन, संशोधन तथा परिष्कार करता चलता है और लक्षण साहित्यिक विधाओं को लेकर ही निश्चित किए जाते हैं, उनपर जबरदस्ती घटाए नहीं जा सकते। इसीलिए [[भामह]] के बाद दंडी ने काव्यादर्श (1.23-28) में कथा और आख्यायिका को एक ही श्रेणी की रचनाएँ मानते हुए कहा है कि कहानी नायक कहे या कोई और कहे, अध्याय का विभाजन हो या न हो, अध्यायों का नाम उच्छ्वास रखा जाए या लंब, बीच में वक्त्र, अपवक्त्र छंद आएँ अथवा न आएँ, कहानी में कोई अंतर नहीं पड़ता। अत: इन ऊपरी भेदों के कारण "कथा" और "आख्यायिका" में अंतर करना चाहिए। नवीं शती (लगभग) में आचार्य [[रुद्रट]] ने तो तत्कालीन प्रचलित साहित्य के आधार पर यहाँ तक कह दिया था कि केवल संस्कृत में निबद्ध कथाओं के लिए गद्य में लिखने का बंधन है; परंतु अन्य भाषाओं में लिखी जानेवाली रचनाएँ पद्य में भी लिखी जा सकती हैं। यहाँ "अन्य भाषाओं" से प्राकृत और अपभ्रंश की ओर इशारा किया गया है। अत: सिद्ध है कि युगानुरूप साहित्यिक विधाओं के मानदंड बदलते रहते हैं। [[दंडी]] ने भी कथा और आख्यायिका के अंतर्गत समस्त आख्यान जाति (खंडकथा, परिकथा आदि) को अंतर्भुक्त माना है, यथा- : ''तत् कथाख्यायिकेत्येका जाति: संज्ञा द्वयांकिता।'' : ''अत्रैवांतर्भविश्यंति शेषाश्चाख्यान जातय:॥'' - [[काव्यादर्श]] (1.28) अत: स्पष्ट है कि [[दण्डी]] के समय में भी आख्यान जातिवाचक शब्द था। [[महाभारत]] में अनेक आख्यानों एवं उपाख्यानों का संकलन है, इसलिए इसे आख्यानकाव्य कहा गया होगा। [[रामायण]] को भी आख्यान संज्ञा देने का कारण संभवतः यही रहा होगा। हिंदी में "आख्यान" शब्द प्राय: साधारण कथा या वृत्तान्त के रूप में ही प्रयुक्त होता है। इसीलिए प्रेमाख्यानक काव्यों के अंतर्गत कथा (सत्यवती कथा), चरित (छिताई चरित), वार्ता (मधुमालती वार्ता), दूहा (ढोला मारूरा दूहा), चौपाई या चौपई (माधवानल कामकंदला चउपई), रास (बीसलदेव रास) आदि सभी काव्यविधाएँ प्राप्य हैं।
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