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==प्रतिस्पर्धा और सहयोग== [[File:Mutualism in hawk moth and flower.jpg|400px|thumb|right| हॉक मौथ एक फूल से पराग चूसते हुए]] डार्विन ने अपनी पुस्तक में सहोपकार के कई उदहारण देकर, जैसे कीट वर्ग और फूलों का आपसी सम्बन्ध, लिखा कि यह दो प्रजातियों में, अलग-अलग, आपसी संघर्ष का परिणाम है।<ref name="origin">{{पुस्तक सन्दर्भ|last1= Darwin |first1=C.|title= The origin of species. |date=1859/1958|publisher= Mentor |location= London }}</ref> उन्होंने ने अलंकारिक भाषा में कहा कि, आदमी कृत्रिम चयन से पालतू पशुओं में आपने फायदे के गुण चुनता है, किन्तु प्रकृति चयन द्वारा प्राणी में वह गुण चुनती है जो उस प्राणी के जीने में सहायक हों। यदि प्राणी के व्यवहार से दूसरे के जीने में मदद मिलती है, उसका चयन तभी होगा जब प्राणी के समूह को लाभ हो, जैसे सामाजिक कीट मधुमक्खी, दीमक, आदि। क्रोपोत्किन कहते हैं, डार्विन ने इन विचारों का विस्तार नहीं किया, और जीने के लिए परस्पर सहयोग के बजाए, प्रतिस्पर्धा को अपने सिद्धांत में मुख्य जगह दी। लगभग सौ साल बाद, वैज्ञानिक कह रहे हैं कि परस्पर सहायता या सहयोग जीवन का आधार है।<ref name="help"/><ref name="complexity">{{पुस्तक सन्दर्भ|last1= Goodwin |first1=B.|title= How leopard changed its spots. The evolution of complexity |date=1996a|publisher= A Touchstone Book |location= New York }}</ref> आपसी सहायता का सबसे अधिक विस्तार मनुष्य में हुआ है, और सहज व्यवहार के साथ-साथ इसमें सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक, आर्थिक, और अन्य पहलू भी जुड़ते गए। इस सन्दर्भ में भगवान दास ने [[संवेग]] पर अपनी पुस्तक में आपसी सहायता का विशेष उल्लेख किया।<ref name="emotions">{{पुस्तक सन्दर्भ|last1= Das |first1=B.|title= The science of emotions |url= https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.214617 |date=1996b|publisher= Theosophical Publishing Society |location= Benares }}</ref> उन्होंने तीन प्रकार के सामाजिक आदान-प्रदान की कल्पना कर आपसी सहायता की विवेचना की। इस प्रकार के सम्बंधों में एक दाता है तो दूसरा प्रापक, जिसे किसी वस्तु या सेवा की ज़रुरत होती है। किसी अन्य वस्तु की प्रापक में बहुतायत है, तो वह दाता को देगा, और इस वस्तु की दृष्टि से दाता कहलायेगा। यह आपसी सहायता का सबसे सामान्य सम्बन्ध है। ऐसा भी सम्भव है कि कोई व्यक्ति ऊंचे पद पर है और उसके पास एक वस्तु बहुतायत में है, फिर भी एक नीचे स्तर का व्यक्ति उसे खुश करने के लिए उसे वह वस्तु देगा। तीसरी प्रकार के सम्बन्ध में एक ऊंची श्रेणी का व्यक्ति, जिसके पास कोई वस्तु बहुतायत में है, उसका थोड़ा सा हिस्सा स्वेच्छा से निम्न श्रेणी के व्यक्ति को देता है, जिसे उसकी ज़रुरत है। भगवान दास ने इस तीसरी प्रकार के सम्बन्ध को विशेष माना, जिसकी व्याख्या कठिन है। समाज में इसे परोपकार कहते हैं, भगवान दास कहते हैं, जब कि इस व्यवहार से परोपकारी को मानसिक लाभ मिलता है। क्रोपोत्किन ने कहा की आपसी सहायता जंतुओं के उद्विकास में एक महत्वपूर्ण कारक है।<ref name="aid"/> इससे जुड़े तथ्य, जंतुओं और मनुष्यों पर किये गए निरीक्षण, उन्होंने १९०२ में अपनी पुस्तक में रखे। इस पुस्तक के प्राक्कथन में आशले मौन्टागू ने लिखा है कि, वास्तव में क्रोपोत्किन ने प्राकृतिक चयन (स्वार्थ) के पूरक पक्ष (सहयोग) को ज़ोरदार शब्दों में रखा, जिसे डार्विन के अनुयायों ने दबा दिया था। मौन्टागू आगे कहते हैं कि एक सच्चे अराजक के नाते उन्होंने प्राकृतिक दर्शन को ध्यान में रखकर समता और आपसी सहायता को आधार माना। प्राकृतिक प्रतिभा से ओत-प्रोत गोथे से भी, क्रोपोत्किन ने लिखा, जंतुओं में आपसी मदद की गहनता छिपी नहीं थी। [[File:Brian Goodwin in a village in the Himalayas, India.jpg|500px|thumb|Brian Goodwin in a village in the Himalayas, near Shimla, India addressing to students of Global Ecology. Photo by R. S. Pirta | ब्राएन गुडविन सुदूर हिमालय के गाँव में गोथे की जानने की पद्धति से रूबरू कराते]] आधुनिक [[उद्विकास]] के विशेषज्ञ, ब्राएन गुडविन ने गोथे की जीवन के बारे में गतिशील दृष्टि से आगे बढ़कर, कहा कि जीवन की उत्पत्ति ही कोशिकाओं के आपसी सहयोग से होती है, और यह क्रम विभिन्न रूपों में मनुष्य के सामाजिक संस्थानों में भी दिखाई देता है।<ref name="systems">{{पुस्तक सन्दर्भ|last1= Goodwin |first1=B.|title= The evolution of cooperative systems. In P. Bunyard (Ed.), Gaia in action. Science of the living earth (pp. 115-146) |date=1996b |publisher= Floris Books |location= Edinburgh }}</ref> गुडविन कहते हैं कि जीव विज्ञान में प्रतिस्पर्धा, परोपकार, स्वार्थी जीन, सबसे सक्षम का जीना, आदि शब्द अलंकार या रूपक की तरह प्रयोग किया जाता है। एक ओर यह शब्द इन सिद्धान्तों के मतलब को आम लोगों तक आसानी से ले जाते हैं, दूसरी ओर समकालीन सांस्कृतिक सोच में प्रचलित स्वार्थ और प्रतिस्पर्धा वैज्ञानिक सिद्धान्तों का हिस्सा बनते हैं। गुडविन आगे लिखते हैं कि वास्तव में इन रूपकों का कोई आतंरिक मूल्य नहीं है। आखिर जीव विज्ञान ने प्रतिस्पर्धा को इतना अधिक महत्त्व क्यों दिया, गुडविन ने पूछा, सहयोग को क्यों नहीं उद्विकास का प्रेरक माना। आपसी सहायता के उदाहरण कोशिका से लेकर मनुष्य के जटिल व्यवहारों में है।<ref name="complexity"/> *गुडविन ने जीवन को एक सहयोगी उद्यम कहा और निम्न तथ्यों को उजागर किया।<ref name="systems"/> **जीवित प्राणी ऐसे सहयोगी तंत्र हैं जो सतत विकसित होते रहते हैं, यह जटिलता में वृद्धि गतिशील किन्तु स्थिर और सही रास्ते से होती है। **जीवन की उत्पत्ती के समय से, चाहे वह एक आरएनए का अणु क्यों न हो, अपनी प्रतिलिपी बनाने के लिए एक अनुकूल वातावरण चाहिए। **प्रतिलिपी अपने आप को उस वातावरण में एक स्वतंत्र इकाई की तरह विकसित करे। **वातावरण में होने वाले बदलाव का संज्ञान ले जिससे लगातार सूचना का आदान-प्रदान हो। **इस जीवित इकाई के चारों ओर का वातावरण एक संस्कृति है, जो इस इकाई को बनाये रखती है तथा प्रेरित करती है। **उपरोक्त प्रक्रियाएं प्राणियों का सहयोगी एवम् संज्ञानात्मक तंत्र बनाती है, जो एक प्रतिलिपि से व्यस्क प्राणी के विकास के लिए ज़रूरी है। **सामाजिक प्राणियों में, अन्य प्राणी उसके चारों तरफ के वातावरण का हिस्सा होते हैं, जिनके साथ सहयोगी सम्बन्ध बनते हैं। **आपसी क्रियाओं से प्रत्येक स्तर पर नए आकार और नयी व्यवस्था का श्रेणीबद्ध क्रम में उदगमन होता है। **व्यक्तियों से सम्बन्ध बाहरी वातावरण में ही नहीं, प्राणी के अन्दर भी संज्ञानात्मक रूप में बनते हैं, जिससे जीवन को एक निश्चित मार्गदर्शन मिलता है। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है की आपसी सहायता के उद्विकास के बारे में वैज्ञानिकों की सोच में बदलाव आ रहा है। हर्दी कहती है की वानर और मानव में प्रतिस्पर्धा में इतना अन्तर नहीं जितना सहयोगी व्यवहार में है, अर्थात मनुष्य अत्याधिक सामाजिक प्राणी है।<ref name="human">{{पुस्तक सन्दर्भ|last1= Hrdy |first1= S.B.|title= Evolutionary context of human development: The cooperative breeding model. In: C. S. Carter, L. Ahnert, K.E. Grossmann, S.B. Hrdy, M. E. Lamb, S.W. Porges & N. Sachser (Eds.), Attachment and Bonding: A New Synthesis (pp. 9-32)|date=2005|publisher= M.I.T. Press |location= Cambridge }}</ref> इसका एक कारण हर्दी के अनुसार बच्चे के पालन-पोषण में समूह के अन्य सदस्यों का योगदान है।
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