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== मुतज़्लवाद == यह विचार संप्रदाय हिजरी संवत् की प्रथम शताब्दी का अंत होते होते स्थापित हुआ। यह दो महान् सिद्धांतों -ईश्वरीय एकत्व तथा ईश्वरीय न्याय - पर आधृत था। ईश्वरीय एकत्व से यह अभिप्राय था कि ईश्वर एक है -उसमें द्वैतता की गंध तक नहीं मिल सकती। उसमें अपने 'मूलसत्व' से परे कोई अन्य गुण नहीं है। उसका अपना सत्व ही सभी गुणों की लक्ष्यपूर्ति करता है। वह सर्वज्ञ एवं सर्वशक्तिमान् है, किंतु इसका कारण यह नहीं है कि उसमें अपनी सत्ता या सत्व से पृथक् सर्वज्ञता या सर्वशक्तिमता के कोई गुण हैं, बल्कि इसका कारण यह है कि उसका मूलसत्व ही इन गुणों के नाम से जानी जानेवाली विशेषताओं को अपने में निहित करता है। इस मत का प्रतिपादन इस संप्रदाय के प्रवर्तक वासिल बिन' अता (मृत्यु 748 ई0) ने किया तथा अब्दुल हुधैल (अबुल हुजैल) अल्लाफ़् ने (मृत्यु 840 ई0) इसकी सुस्पष्ट व्याख्या की (दे0 अरबी दर्शन)। ईश्वरीय न्याय का अभिप्राय यह है कि ईश्वर सदैव न्यायी है और वह कभी निर्दय नहीं होता। इसी विश्वास की एक उपशाखा की यह मान्यता है कि ईश्वर ने मनुष्य को एक सीमा तक इच्छास्वातंत््रय एवं कार्य की स्वतंत्रता से विभूषित किया। मनुष्य अपने सभी कर्मों के लिए उत्तरदायी है, अपने सत्कर्मों के लिए वह पुरस्कार तथा दुष्कर्मों के लिए दंड पाता है। मु'तज़्ली लोग अपने को 'अह्ल अत् तवहीद् वल् अद्ल' (ईश्वरीय एकत्व एवं न्याय के अनुयायी) कहते थे क्योंकि वे ईश्वर के न्याय एवं एकत्व के दृढ़ समर्थक थे। मु'तज़्लियों के अन्य प्रमुख मत थे, कुरान की शाश्वतता से इन्कार तथा परलोक में ईश्वर दर्शन की असंभाव्यता। पुरातनपंथी यह मानते थे कि विवेक ईश्वर का गुण है। और वह कुरान में अभिव्यक्त है। यों कुरान स्वयंभू है और वह ईश्वर की शाश्वतता से संबद्ध है। मु'तज़्ली कहते हैं कि यदि यह ज्ञान ईश्वर की शाश्वतता से संबद्ध है तो इसका अर्थ दो शाश्वत सत्यों का अस्तित्व हुआ। दूसरे शब्दों में कहें तो इससे दो ईश्वरों की सत्ता मान्य हो जाती है। पुरातनपंथी यह मानते थे कि कम से कम कुछ लोगों को स्वर्ग में ईश्वर का दर्शन होना संभव है और यह परम आनंद का विषय होगा। मु'तज़लियों का कहना था कि स्वर्ग में भी ईश्वर नहीं दिखाई दे सकता क्योंकि ऐसा होना इस बात की पूर्वकल्पना करना है कि इस विस्तार में वह भी कुछ जगह घेरता है। लेकिन ईश्वर विस्तारमय है ही नहीं, अत: उसे कभी कहीं भी नहीं देखा जा सकता। मु'तज़लियों ने इस्लाम के रूढ़ नियमों का उदात्तीकरण अच्छी भावना से प्रेरित होकर शुरू किया था किंतु कुरान की दैवी उत्पत्ति के संबंध में उनमें से बहुतों की आस्था अनजाने में हिल उठी। परिणामत: अपनी ही तर्कपद्धति को लेकर वे मजहब के अनेक रूढ़ नियमों को न मानने के लिए विवश हो गए, यथा इलहाम का सिद्धांत, इत्यादि। मु'तज़्ली विचारकों का पहला दल अपने मजहब के प्रति जागरूक था और मानवीय विवेक बुद्धि के साथ संगति बिठाने के लिए उसका उदात्तीकरण चाहता था। मु'तज़लियों के संप्रदाय का उद्गम बाहरी प्रभाव से अछूते रहकर हुआ था। (दे0 स्टाइनर और ओबरमान)। किंतु जब ग्रीक दर्शन अनूदित होकर आया तो मु'तज़लियों ने उसे बड़े हौसले के साथ पढ़ा। ग्रीक दर्शन के अध्ययन ने इनके मन में नई नई समस्याएँ उत्पन्न कीं और धर्म में उनकी अभिरुचि स्वत: उसकी ही खातिर पीछे ठेल दी गई। मुतज़्लियों में कुछ प्रमुख थे, नज्जाम (मृत्यु 845 ई0) जुब्बा' ई (मृत्यु 915 ई0), [[अल-जाहिज़]] (मृत्यु 868 ई0) इत्यादि।<ref>{{cite web|url=https://www.bbc.com/hindi/science-47231397|title=डार्विन से पहले बंदर से इंसान बनने के सफ़र को बताने वाला मुस्लिम विचारक|access-date=12 अप्रैल 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20190615045436/https://www.bbc.com/hindi/science-47231397|archive-date=15 जून 2019|url-status=live}}</ref><ref>{{cite web|url=https://www.thelallantop.com/tehkhana/history-of-islam-story-of-pre-islamic-arabia/|title=जब काबे की हिफ़ाज़त के लिए एक सांप तैनात करना पड़ा|access-date=12 अप्रैल 2020|archive-url=https://web.archive.org/web/20171014000033/http://www.thelallantop.com/tehkhana/history-of-islam-story-of-pre-islamic-arabia/|archive-date=14 अक्तूबर 2017|url-status=live}}</ref>
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