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=== त्याग का उत्थान=== बकरीद का त्यौहार [[हिजरी]] के आखिरी महीने [[ज़ु अल-हज्जा]] में मनाया जाता है। पूरी दुनिया के मुसलमान इस महीने में [[मक्का]] [[सउदी अरब|सऊदी अरब]] में एकत्रित होकर हज मनाते है। ईद उल अजहा भी इसी दिन मनाई जाती है। वास्तव में यह हज की एक अंशीय अदायगी और मुसलमानों के भाव का दिन है। दुनिया भर के मुसलमानों का एक समूह मक्का में हज करता है बाकी मुसलमानों के अंतरराष्ट्रीय भाव का दिन बन जाता है। ईद उल अजहा का अक्षरश: अर्थ त्याग वाली ईद है इस दिन जानवर की कुर्बानी देना एक प्रकार की प्रतीकात्मक कुर्बानी है।<ref>{{Cite web|url=https://navbharattimes.indiatimes.com/astro/photo/bakrid-2020-why-and-how-eid-al-adha-is-celebrated-82852/|title=Page 2 : Eid Al-Adha Bakrid 2020: क्यों मनाई जाती है बकरीद और क्या होता है बकरे के गोश्त का|last=नवभारतटाइम्स.कॉम|date=2020-07-30|website=नवभारत टाइम्स|language=hi-IN|access-date=2020-08-01}}</ref> [[गरीबदास|संत गरीबदास जी]] ने अपनी वाणी में कहा है:<blockquote>नबी मुहम्मद नमस्कार है, राम रसूल कहाया। एक लाख अस्सी कूं सौगंध, जिन नही करद चलाया।।</blockquote><blockquote>अर्श कुर्स पर अल्लह तख्त हैं, खालिक बिन नही खाली। वे पैगम्बर पाक पुरुष थे, साहिब के अब्दाली।।</blockquote><blockquote>मारी गऊ शब्द के तीरम, ऐसे थे मोहम्मद पीरम। शब्दे फिर जिवाई, हंसा राख्या माँस नही भाख्या, ऐसे पीर मुहम्मद भाई।।</blockquote>पवित्र तौरात पुस्तक के अंदर ‘पैदाइश’ में पृष्ठ नंबर 2 और 3 में लिखा है कि अल्लाह ने मनुष्यों को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया। जो बीज वाले फल हैं, उन्हें मनुष्यों को खाने का आदेश दिया तथा जीव जंतुओं को घास फूस खाने का आदेश दिया, मांस खाने का आदेश कहीं पर भी नहीं है यदि कुरान में मास कहने का आदेश कहीं है तो वह अल्लाह का नहीं बल्कि जिब्रईल देवता का है। इस प्रकार परमेश्वर ने छः दिन में सृष्टि रची औऱ सातवें दिन तख्त पर जा विराजा।<ref name=":0" /> हज और उसके साथ जुड़ी हुई पद्धति हजरत इब्राहीम और उनके परिवार द्वारा किए गए कार्यों को प्रतीकात्मक तौर पर दोहराने का नाम है। हजरत [[अब्राहम|इब्राहीम]] के परिवार में उनकी पत्नी हाजरा और पुत्र इस्माइल थे। मान्यता है कि हजरत इब्राहीम ने एक स्वप्न देखा था जिसमें वह अपने पुत्र इस्माइल की कुर्बानी दे रहे थे हजरत इब्राहीम अपने दस वर्षीय पुत्र इस्माइल को ईश्वर की राह पर कुर्बान करने निकल पड़े। पुस्तकों में आता है कि ईश्वर ने अपने फरिश्तों को भेजकर इस्माइल की जगह एक जानवर की कुर्बानी करने को कहा। दरअसल इब्राहीम से जो असल कुर्बानी मांगी गई थी वह थी उनकी खुद की थी अर्थात ये कि खुद को भूल जाओ, मतलब अपने सुख-आराम को भूलकर खुद को मानवता/इंसानियत की सेवा में पूरी तरह से लगा दो। तब उन्होनें अपने पुत्र इस्माइल और उनकी मां हाजरा को मक्का में बसाने का निर्णल लिया। लेकिन [[मक्का]] उस समय रेगिस्तान के सिवा कुछ न था। उन्हें मक्का में बसाकर वे खुद मानव सेवा के लिए निकल गये।<ref>{{Cite web|url=https://www.bhaskar.com/jharkhand/giridih/news/today-will-be-sacrificed-in-memory-of-hazrat-ismail-alaihis-salam-094005-5229673.html|title=हजरत इस्माइल अलैहिस सलाम की याद में आज होगी कुर्बानी|date=2019-08-12|website=Dainik Bhaskar|language=hi|access-date=2020-09-27}}</ref> इस तरह एक रेगिस्तान में बसना उनकी और उनके पूरे परिवार की कुर्बानी थी जब इस्माइल बड़े हुए तो उधर से एक काफिला (कारवां) गुजरा और इस्माइल का विवाह उस काफिले (कारवां) में से एक युवती से करा दिया गया फिर प्रारम्भ हुआ एक वंश जिसे इतिहास में इश्माइलिट्स, या वनु इस्माइल के नाम से जाना गया। हजरत मुहम्मद साहब का इसी वंश में जन्म हुआ था। ईद उल अजहा के दो संदेश है पहला परिवार के बड़े सदस्य को स्वार्थ के परे देखना चाहिए और खुद को मानव उत्थान के लिए लगाना चाहिए ईद उल अजहा यह याद दिलाता है कि कैसे एक छोटे से परिवार में एक नया अध्याय लिखा गया।
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