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==जीवन== === बचपन एवं किशोरावस्था === ओशो का मूल नाम चन्द्र मोहन जैन था। वे अपने पिता की ग्यारह संतानो में सबसे बड़े थे। उनका जन्म [[मध्य प्रदेश]] में रायसेन जिले के अंतर्गत आने वाले कुचवाडा ग्राम में हुआ था। उनके माता पिता श्री बाबूलाल और सरस्वती जैन, जो कि [[तारणपंथ|तेैरापंथी]] [[दिगम्बर|दिगंबर]] [[जैन धर्म|जैन]] थे, ने उन्हें अपने ननिहाल में ७ वर्ष की उम्र तक रखा था। ओशो के स्वयं के अनुसार उनके विकास में इसका प्रमुख योगदान रहा क्योंकि उनकी नानी ने उन्हें संपूर्ण स्वतंत्रता, उन्मुक्तता तथा रुढ़िवादी शिक्षाओं से दूर रखा। जब वे ७ वर्ष के थे तब उनके नाना का निधन हो गया और वे गाडरवारा अपने माता पिता के साथ रहने चले गए।<ref name="Mullan10_11">{{harvnb|Mullan|1983|p=10-11}}</ref><ref name="Joshi22">{{harvnb|Joshi|1982|p=22–25, 31, 45–48}}</ref> रजनीश बचपन से ही गंभीर व सरल स्वभाव के थे, वे शासकीय आदर्श उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में पढा करते थे। विद्यार्थी काल में रजनीश बगावती सोच के व्यक्ति हुआ करते थे, जिसे परंपरागत तरीके नहीं भाते थे। किशोरावस्था तक आते-आते रजनीश [[नास्तिकता|नास्तिक]] बन चुके थे। उन्हें ईश्वर और आस्तिकता में जरा भी विश्वास नहीं था। अपने विद्यार्थी काल में उन्होंने ने एक कुशल वक्ता और तर्कवादी के रूप में अपनी पहचान बना ली थी। किशोरावस्था में वे आज़ाद हिंद फ़ौज और [[राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ]] में भी क्षणिक काल के लिए शामिल हुए थे।<ref name="FF1-77" /><ref name="JSG23">{{harvnb|Gordon|1987|p=23}}</ref><ref name=Joshi38>{{harvnb|Joshi|1982|p=38}}</ref> === जीवनकाल === वर्ष 1957 में संस्कृत के प्राध्यापक के तौर पर रजनीश रायपुर विश्वविद्यालय से जुड़े। लेकिन उनके गैर परंपरागत धारणाओं और जीवनयापन करने के तरीके को छात्रों के नैतिक आचरण के लिए घातक समझते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति ने उनका स्थानांतरण कर दिया। अगले ही वर्ष वे दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक के रूप में जबलपुर विश्वविद्यालय में शामिल हुए। इस दौरान भारत के कोने-कोने में जाकर उन्होंने गांधीवाद और समाजवाद पर भाषण दिया; अब तक वह आचार्य रजनीश के नाम से अपनी पहचान स्थापित कर चुके थे। वे दर्शनशास्त्र के अध्यापक थे। उनके द्वारा [[समाजवाद]], [[महात्मा गांधी|महात्मा गाँधी]] की विचारधारा तथा संस्थागत [[धर्म]] पर की गई अलोचनाओं ने उन्हें विवादास्पद बना दिया। वे [[मानव कामुकता]] के प्रति स्वतंत्र दृष्टिकोण के भी हिमायती थे जिसकी वजह से उन्हें कई भारतीय और फिर विदेशी पत्रिकाओ में "सेक्स गुरु" के नाम से भी संबोधित किया गया।<ref name="Joshi 1982 pp=1–4" /> १९७० में ओशो कुछ समय के लिए मुंबई में रुके और उन्होने अपने शिष्यों को "नव संन्यास" में दीक्षित किया और अध्यात्मिक मार्गदर्शक की तरह कार्य प्रारंभ किया। उनके विचारों के अनुसार, अपनी देशनाओं में वे सम्पूूूर्ण विश्व के रहस्यवादियों, दार्शनिकों और धार्मिक विचारधारों को नवीन अर्थ दिया करते थे। १९७४ में पुणे आने के बाद उन्होनें अपने "आश्रम" की स्थापना की जिसके बाद विदेशियों की संख्या बढ़ने लगी, जिसे आज ''ओशो इंटरनॅशनल मेडिटेशन रेसॉर्ट'' के नाम से जाना जाता है. तत्कालीन [[जनता पार्टी]] सरकार के साथ मतभेद के बाद १९८० में ओशो "अमेरिका" चले गए और वहां ओरेगॉन, संयुक्त राज्य की वास्को काउंटी में रजनीशपुरम की स्थापना की। १९८५ में इस आश्रम में सामुहिक फ़ूड पॉइज़निंग की घटना के बाद उन्हें [[संयुक्त राज्य अमेरिका|संयुक्त राज्य]] से निर्वासित कर दिया गया.
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