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== कर्मवाद की उत्पत्ति == कर्मवाद की प्रथम अनुभूति वैदिक [[यज्ञ]] के विधान में होती है। वैदिक विश्वास के अनुसार यदि यज्ञ का विधिवत् संपादन किया जाए तो उससे एक अदृश्य शक्ति उत्पन्न होती है। इसे अदृष्ट अथवा अपूर्व कहते हैं। यही उचित अवसर आने पर यज्ञ के वांछित फल को उत्पन्न करती है। इस प्रकार यज्ञ का फल मनुष्य को अवश्य प्राप्त होता है। इस कर्म और फल के संबंध की सार्वभौम नियम के रूप में अभिव्यक्ति सर्वप्रथम [[ऋग्वेद]] के ऋत के सिद्धांत में मिलती है। ऋत समस्त विश्व में व्याप्त है तथा उसका संचालन और नियंत्रण करता है। यह जगत् की भौतिक तथा नैतिक व्यवस्था का आधार है। देवता तथा मनुष्य सभी इसका पालन करते हैं। वरुण ऋत के अधिष्ठाता माने गए हैं। वह पाप करनेवालों को घोर अंधकार के गह्वर में डालते हैं जहाँ से उनका प्रत्यावर्तन नहीं होता। इसी प्रकार अच्छे कर्म करनेवालों को सर्वोत्तम सुखों की प्राप्ति होती है। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार मृत्यु के उपरांत जीव को दो अग्नियों के मध्य से होकर जाना पड़ता है। वे अशुभ कर्म करनेवालों को जलाती हैं पर शुभ करनेवालों को नहीं।
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