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==प्रारंभिक जीवन== कामिल बुल्के का जन्म बेल्जियम के [[वेस्ट फ्लैंडर्स]] में [[नॉकके-हेइस्ट]] नगरपालिका (म्यूनीपीलिटी) के एक गांव [[रामस्केपेल]] में हुआ था।<ref name=tele>[http://www.telegraphindia.com/1070103/asp/jharkhand/story_7214414.asp Father Camille Bulcke] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20160304033004/http://www.telegraphindia.com/1070103/asp/jharkhand/story_7214414.asp |date=4 मार्च 2016 }} ''[[The Telegraph (Kolkata)|The Telegraph]]'', Wednesday, 3 January 2007.</ref> इनके पिता का नाम अडोल्फ और माता का नाम मारिया बुल्के था। अभाव और संघर्ष भरे अपने बचपन के दिन बिताने के बाद बुल्के ने कई स्थानों पर पढ़ाई जारी रखी।<ref name = deshbandhu>[http://www.deshbandhu.co.in/parishist/हिन्दी-के-अनन्य-साधक-फादर-कामिल-बुल्के-16239-2 हिन्दी के अनन्य साधक: फादर कामिल बुल्के] - [[देशबंधु]] - 1 सितंबर 2013</ref> बुल्के ने पहले से ही [[ल्यूवेन विश्वविद्यालय]] से [[सिविल इंजीनियरिंग]] में बीएससी डिग्री हासिल कर ली थी। 1930 में ये एक जेसुइट बन गए। <ref>[http://www.springerlink.com/content/q112791131725127/ Obituary]{{Dead link|date=जून 2020 |bot=InternetArchiveBot }} ''Indo-Iranian Journal'', Publisher: Springer Netherlands. ISSN 0019-7246 (Print) 1572-8536 (Online). Issue: Volume 25, Number 4 / June 1983.</ref>[[नीदरलैंड]] के [[वलकनबर्ग]], (1932-34) में अपना दार्शनिक प्रशिक्षण करने के बाद, 1934 में ये भारत की ओर निकल गए और नवंबर 1936 में भारत, [[बंबई]] (अब [[मुम्बई]]) पहुंचे। [[दार्जिलिंग]] में एक संक्षिप्त प्रवास के बाद, उन्होंने [[गुमला]] (वर्तमान [[झारखंड]]) में पांच साल तक [[गणित]] पढ़ाया। वहीं पर हिंदी, [[ब्रजभाषा]] व [[अवधी]] सीखी। 1938 में, सीतागढ़/हजारीबाग में पंडित बदरीदत्त शास्त्री से हिंदी और [[संस्कृत]] सीखा। यह यहीं था कि इन्होंने हिंदी सीखने के लिए अपना आजीवन जुनून विकसित किया, जैसा कि बाद में याद किया: {{quote|1935 में मैं जब भारत पहुंचा, मुझे यह देखकर आश्चर्य और दुःख हुआ, मैंने यह जाना कि अनेक शिक्षित लोग अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं से अंजान थे और इंग्लिश में बोलना गर्व की बात समझते थे। मैंने अपने कर्तव्य पर विचार किया कि मैं इन लोगों की भाषा को सिद्ध करूँगा।|एक ईसाई का विश्वास - हिंदी और तुलसी का भक्त - कामिल बुल्के}}<ref name=tele/> इन्होंने [[ब्रह्मवैज्ञानिक]] प्रशिक्षण (1939-42) भारत के [[कुर्सियॉन्ग]] से किया,1940 में [[हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग]] से विशारद की परीक्षा पास की। जिसके दौरान इन्हें पुजारी की उपाधि दी गयी (1941 में)। भारत की शास्त्रीय भाषा में इनकी रुचि के कारण इन्होंने [[कलकत्ता विश्वविद्यालय]] (1942-44) से [[संस्कृत]] में मास्टर डिग्री और आखिर में [[इलाहाबाद विश्वविद्यालय]] (1945-49) में [[हिंदी साहित्य]] में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की, इस शोध का शीर्षक था '' राम कथा की उत्पत्ति और विकास ''।
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