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== परिचय == [[चित्र:Stohrem.jpg|right|thumb|200px|एक क्रिस्टलीय ठोस (strontium titanate) की परमाणु आकार के रिजोल्युशन में ली गयी छबि : चमकीले परमाणु स्ट्रान्सियम के हैं और काले परमाणु टाइटेनियम के]] मणिभविज्ञान, या क्रिस्टलकी वह विद्या है, जिसमें मणिभों या क्रिस्टलों की आकृति, गुण और संरचना का अध्ययन किया जाता है। 'क्रिस्टल' [[यूनानी भाषा|ग्रीक भाषा]] के शब्द क्रुस्टालॉस (Krustallos) से व्युत्पन्न है। क्रुस्टोलॉस का मूल अर्थ है "हिम", पर यह शब्द बाद में शैल-क्रिस्टल के लिये, जो [[स्फटिक|क्वार्ट्ज]] की एक रंगहीन पारदर्शक किस्म है, प्रयुक्त किया जाने लगा। इसके विषय में प्राचीन काल में लोगों की धारणा थी कि यह अत्यधिक ठंढ के कारण पानी के जमने से बनता है। शनै: शनै: "क्रिस्टल" शब्द किसी भी ऐसे खनिज के लिये प्रयुक्त किया जाने लगा, जो स्वभाव से ही साधरण फलकों (faces) से घिरा होता है। यह शब्द अंगूठी में जड़े जानेवाले रत्नों तथा अन्य आभूषणों के लिये प्रयुक्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि उनमें जो सुव्यवस्थित समतल फलक दिखाई देते हैं वे प्राकृतिक रीति से नहीं बने हैं, वरन् कृत्रिम हैं। ये फलक काटकर पॉलिश करने के बाद बनाए जाते हैं। सच्चे क्रिस्टल के फलक प्राकृतिक क्रिस्टलन के फलस्वरूप बनते हैं, क्रिस्टलन क्रिया चाहे भूपटल में हुई हो या प्रयोगशाला में। दूसरी अवस्था में किस्टलन के लिये पदार्थ और वातावरण तो मनुष्य द्वारा तैयार किया जाता है, लेकिन क्रिस्टल की वास्तविक रचना तथा उसके विशिष्ट फलकों का विकास मनुष्य के हस्तक्षेप के बिना होता है। ये फलक एक विशेष आंतरिक परमाणु संरचना के फलस्वरूप निर्मित होते हैं। इसी संरचना पर क्रिस्टल के भौतिक गुण निर्भर करते हैं। काँच के बने एक कृत्रिम रत्न में नियमित आंतरिक संरचना नहीं होती है, अत: बाह्य रूप में क्रिस्टल के समान होते हुए भी उसकी गणना क्रिस्टल में नहीं की जाती। अत:, क्रिस्टल की सच्ची पहचान उसके अणुओं के परमाणुओं के नियमित विन्यास द्वारा होती है। क्रिस्टल एक सम पिंड है, जो प्राय: ठोस होता है और चारों ओर से चिकने समतल फलकों से, विशिष्ट सिद्धांतों के आधार पर, घिरा रहता है। इसके [[भौतिक गुण]] निश्चित रहते हैं। इसके बाह्य रूप और भौतिक गुण दोनों ही नियमित आंतरिक संरचना के बाहरी परिचायक हैं। अधिकतर [[खनिज]], जो उपयुक्त अवस्थाओं के अंतर्गत बनते हैं, क्रिस्टल होते हैं। कुछ ऐसे पदार्थ हैं, जिन्हें हम '''तरल क्रिस्टल''' कहते हैं। यद्यपि इनमें नियमित परमाण्वीय विन्यास का प्रमाण मिलता है, तथापि ये सच्चे ठोस नहीं है। दूसरी ओर कुछ ऐसे ठोस खनिज हैं, जिनमें नियमित परमाण्वीय संरचना नहीं मिलती। इन्हें रवाहीन (Amorphous) कहते हैं। कुछ क्रिस्टल बहुत ही छोटे होते हैं। इनके फलकों का विकास [[सूक्ष्मदर्शी]] की सहायता से भी नहीं स्पष्ट होता। इन्हें गूढ़ क्रिस्टली (Cryptocrystalline) कहते हैं। साधारणत: क्रिस्टलीय शब्द किसी भी ऐसे पदार्थ के लिये प्रयुक्त किया जा सकता है जिसमें परमाणु एक नियमित रूप में व्यवस्थित रहते हैं, लेकिन क्रिस्टल शब्द उन्हीं क्रिस्टलीय पदार्थों के लिये प्रयोग में लाया जाता है जो चारों ओर से समतल फलकों से घिरे होते हैं। क्रिस्टल का आकार [[क्रिस्टलन]]-समय पर निर्भर करता है। क्रिस्टलन जितना धीरे-धीरे होगा, क्रिस्टल उतने ही बड़े बनेंगे। जब क्रिस्टजन जल्दी होता है, तब अणुओं को विकास केंद्र की ओर अधिक संख्या में जाने का अवसर नहीं मिलता। इस कारण बड़े-बड़े क्रिस्टलों की रचना नहीं हो पाती है। साथ ही [[श्यानता]] (viscoity) बढ़ने के कारण अणुओं की गतिविधि भी धीमी पड़ जाती है। विलयन, गलन (fusion) और वाष्पन तीनों अवस्थाओं में क्रिस्टलन हो सकता है। एक विलयन में क्रिस्टल की रचना "विलायक" (solvent) के वाष्पीकरण से, विलायक का ताप गिर जाने से, अथवा दबाव कम हो जाने से होती है। इस प्रकार [[साधारण नमक|नमक]] के क्रिस्टल, सोडियम क्लोराइड के जलीय विलयन से, तीनों में से किसी भी विधि से बन सकते हैं। इसी प्रकार उसी संघटन के पिघले द्रव्य से क्रिस्टल की रचना हो सकती है। जल से हिम क्रिस्टल की रचना तथा पिघले हुए [[मैग्मा]] से [[आग्नेय शैल]] की रचना इसके साधारण उदाहरण हैं। पिछले उदाहरण में ज्यों-ज्यों तरल मैग्मा ठंडा होता जाता है, उसमें विद्यमान खनिज अणुओं के समुदाय बनाते हैं और अंतत: पिंडित शैल के खनिज अवयवों का निर्माण करते हैं। [[वाष्प]] से क्रिस्टल की रचना अपेक्षाकृत दुर्लभ है। इसके उदाहरण हैं, [[पृथ्वी का वायुमण्डल|वायुमंडल]] के जलवाष्प से बने हिम क्रिस्टल और [[ज्वालामुखी]] से संबंधित गरम पानी के झरनों से निकले [[गंधक]]मय वाष्प से बने गंधक क्रिस्टल।
सारांश:
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