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== इतिहास == खूनी दरवाजे का यह नाम तब पड़ा जब यहाँ [[मुग़ल साम्राज्य|मुग़ल]] सल्तनत के तीन शहज़ादों - [[बहादुर शाह ज़फ़र|बहादुरशाह ज़फ़र]] के बेटों मिर्ज़ा मुग़ल और किज़्र सुल्तान और पोते अबू बकर - को ब्रिटिश जनरल [[विलियम हॉडसन]] ने [[१८५७ का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम|१८५७ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम]] के दौरान गोली मार कर हत्या कर दी। मुग़ल सम्राट के आत्मसमर्पण के अगले ही दिन विलियम हॉडसन ने तीनों शहज़ादों को भी समर्पण करने पर मजबूर कर दिया। २२ सितम्बर को जब वह इन तीनों को [[हुमायूँ का मकबरा|हुमायूँ के मक़बरे]] से [[लाल क़िला|लाल किले]] ले जा रहा था, तो उसने इन्हें इस जगह रोका, नग्न किया और गोलियाँ दाग कर मार डाला। इसके बाद शवों को इसी हालत में ले जाकर कोतवाली के सामने प्रदर्शित कर दिया गया। इसके नाम के कारण बहुत सी अमानवीय घटनाएँ इसके साथ जोड़ी जाती हैं, जिनको सत्यापित करना संभव नहीं है। बहुत संभव है कि ये सब पुरानी दिल्ली के काबुल दरवाजे पर हुईं। इनमें से कुछ हैं- * [[अकबर]] के बाद जब [[जहाँगीर|जहांगीर]] मुग़ल सम्राट बना तो अकबर के कुछ नवरत्नों ने उसका विरोध किया। जवाब में जहांगीर ने नवरत्नों में से एक [[अब्दुल रहीम खाने-खाना]] के दो लड़कों को इस दरवाजे पर मरवा डाला और इनके शवों को यहीं सड़ने के लिए छोड़ दिया गया।<ref name="hinduonnet">{{cite web | title = हिन्दू ऑनलाइन | url = http://www.hinduonnet.com/thehindu/mp/2002/12/02/stories/2002120200470200.htm | accessdate = 3 दिसम्बर 2006 | archive-url = https://web.archive.org/web/20061215033701/http://www.hinduonnet.com/thehindu/mp/2002/12/02/stories/2002120200470200.htm | archive-date = 15 दिसंबर 2006 | url-status = live }}</ref> * [[औरंगज़ेब]] ने अपने बड़े भाई [[दारा शिकोह]] को सिंहासन की लड़ाई में हरा कर उसके सिर को इस दरवाजे पर लटकवा दिया।<ref name="hinduonnet"/> * १७३९ में जब [[नादिर शाह]] ने दिल्ली पर चढ़ाई की तो इस दरवाजे के पास काफ़ी खून बहा।<ref name="Indiaheritage">{{cite web| title = इंडिया हैरिटेज| url = http://www.indiaheritage.org/history/history_of_europeans.htm| accessdate = 3 दिसम्बर 2006| archive-url = https://web.archive.org/web/20060701042213/http://www.indiaheritage.org/history/history_of_europeans.htm| archive-date = 1 जुलाई 2006| url-status = dead}}</ref> लेकिन कुछ सूत्रों के अनुसार यह खून-खराबा [[चाँदनी चौक]] के दड़ीबा मुहल्ले में स्थित इसी नाम के दूसरे दरवाजे पर हुआ था।<ref name="hinduonnet" /> और कुछ कहानियों से भी ऐसा लगता है कि मुग़ल काल में भी इसे खूनी दरवाजा कहा जाता था, लेकिन ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार १८५७ की घटनाओं के बाद से ही इसका यह नाम पड़ा।
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