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== जीवनी == लैबनीज का जन्म जर्मनी के [[लिपजिग]] नामक स्थान पर पहली जुलाई 1646 को हुआ था। उसके पिता मोरल फिलॉसफी के प्रोफेसर थे। सन् 1652 ई. में छ वर्ष की अवस्था में लाइबनिज को लिपजिग स्थित निकोलाई स्कूल में पढ़ने के लिये भेजा गया। परन्तु दुर्भाग्यवश उसी वर्ष उसके पिता की मृत्यु हो गयी। इसके कारण उसकी पढ़ाई में काफी व्यवधान आने लगा। वह कभी स्कूल जाता था तो कभी नहीं जा पाता था। अब वह प्राय स्वाध्याय द्वारा विद्या-अर्जन करने लगा। अपने पिता से उसने इतिहास संबंधी काफी जानकारी प्राप्त की थी। इसके कारण उसकी अभिरुचि इतिहास के अध्ययन में काफी बढ़ गयी थी। इसके अलावा विभिन्न भाषाओं को सीखने में उसकी काफी अभिरुचि थी। आठ वर्ष की अवस्था में उसने [[लैटिन भाषा]] सीख ली। बारह वर्ष की अवस्था में उसने [[ग्रीक भाषा]] सीख ली। लैटिन में उसने कवितायें भी लिखनी शुरू कर दीं। 15 वर्ष की अवस्था में लाइबनिज ने [[लिपजिग विश्वविद्यालय]] में कानून के एक विद्यार्थी के रूप में प्रवेश पाया। इस विश्वविद्यालय में प्रथम दो वर्ष उसने जैकौब योमासियस के निर्देशन में [[दर्शनशास्त्र]] के गहन अध्ययन में व्यतीत किये। इसी दौरान उसे उन प्राचीन विचारकों के बारे में जानकारी प्राप्त हुई जिन्होंने विज्ञान तथा दर्शन के विकास में क्रान्ति लाने का काम किया। इन महान विचारकों में शामिल थे फ्रैंसिस बैकन, केप्लर, कैम्पानेला तथा गैलीलियो इत्यादि। अब लाइबनिज की अभिरुचि गणित के अध्ययन की ओर मुड़ गयी। इस उद्देश्य से उसने जेना निवासी इरहार्ड वीगेल से सम्पर्क किया। वीगेल उस काल का एक महान गणितज्ञ माना जाता था। कुछ समय तक वीगेल के अधीन गणित का अध्ययन करने के बाद उसने अगले तीन वर्षों तक कानून का अध्ययन किया। उसके बाद उसने डॉक्टर ऑफ लॉ की डिग्री हेतु आवेदन पत्र जमा किया। परन्तु उम्र कम होने के कारण लिपजिग विश्वविद्यालय ने उसे इसकी अनुमति प्रदान नहीं की। अत उसने लिपजिग विश्वविद्यालय छोड़ दिया तथा अल्ट डौर्फ विश्वविद्यालय में डॉक्टर ऑफ लॉ की डिग्री हेतु आवेदन जमा किया। यहाँ उसका आवेदन स्वीकार कर लिया गया तथा सन् 1666 ई. के नवम्बर में उसे डॉक्टर ऑफ लॉ की डिग्री प्रदान की गयी। हालाँकि लाइबनिज मूलत कानून का विद्यार्थी रह चुका था परन्तु उसकी अभिरुचि विज्ञान के विभिन्न विषयों (विशेषकर गणित) में काफी अधिक थी। सन् 1669 ई. में उसने जैकौब थोमासियस को एक पत्र लिखा जिसमें बताया कि [[अरस्तू]] द्वारा प्रतिपादित भौतिकी के सिद्धांत प्राकृतिक क्रियाकलापों की व्यवस्था संतोजाजनक ढंग से करते हैं। परन्तु इन सिद्धांतों में अभी संशोधन की आवश्यकता है। सन् 1671 ई. में लाइबनिज ने `हाइपोथेसिस फिजिका नौवा' नामक शीर्षक से अपना एक [[शोधपत्र]] प्रकाशित किया जिसमें उसने विचार व्यक्त किया कि सभी खगोलीय क्रियाकलापों में ईथर की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। सन् 1671 में ही वह अपने शोधों के सिलसिले में [[पेरिस]] जाकर एंटोइन आर्नौल्ड, निकोलस मैलेब्रांके तथा क्रिश्चियन हॉयजन जैसे प्रमुख वैज्ञानिकों से मिला। उसने गणित, यंत्र शास्त्र, ऑप्टिक्स, हाइड्रोस्टैटिक्स, न्युमैटिक्स तथा नौटिकल साइंस जैसे विषयों से संबंधित अनेक शोध पत्र प्रकाशित किये। इन शोधों में सबसे प्रमुख था `'कैलकुलेटिंग मशीन' का आविष्कार। इस यंत्र के द्वारा अनेक प्रकार की गणनायें की जा सकती थीं। इस मशीन को लाइबनिज ने पेरिस में `एकेडमी डेस साइंसेज' तथा [[लन्दन]] की `'[[रॉयल सोसायटी]]' के समक्ष प्रस्तुत किया। इसके फलस्वरूप लाइबनिज को सन् 1673 में रॉयल सोसायटी का सदस्य मनोनीत किया गया। इसी प्रकार सन् 1700 में उसे `एकेडमी प्रेस साइंसेज' का विदेशी सदस्य भी नियुक्त किया गया। लाइबनिज वैज्ञानिक शोध के प्रति स्वयं तो पूरी तरह समर्पित था ही, उसने अन्य लोगों को भी इसके लिए प्रेरित किया। इसी उद्देश्य को ध्यान में रख कर उसने 11 जुलाई 1700 ई. को '[[बर्लिन एकेडमी]]' की स्थापना की। इस एकेडमी का वह प्रथम अध्यक्ष चुना गया। इस एकेडमी का कार्यकलाप तथा इसके सदस्यों की संख्या दिन दूनी-रात चौगुनी बढ़ती गयी।
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