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== सामग्री व प्रारूप == इस पुस्तक में [[दयानन्द सरस्वती|स्वामी दयानंद सरस्वती]] ने [[गाय]] आदि पशुओं की रक्षा और [[कृषि]] को प्रोत्साहन देने संबंधी कुछ प्रस्ताव रखे हैं व एक 'गोकृष्यादिरक्षिणी सभा' (गो कृषि आदि रक्षिणी सभा) की घोषणा की है। पुस्तक को तीन भागों में बाँटा जा सकता है। * '''[http://wikisource.org/wiki/गोकरुणानिधि/१ समीक्षा प्रकरणम्]{{Dead link|date=जून 2020 |bot=InternetArchiveBot }}''' गो आदि प्राणियों पर दया क्यों करनी चाहिए और इससे मनुष्य को क्या लाभ है, इसकी समीक्षा प्रथम भाग में है। एक हिंसक व रक्षक के बीच संवाद भी इस भाग में उपलब्ध है। * '''[https://web.archive.org/web/20150604014407/http://wikisource.org/wiki/%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%A3%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%A7%E0%A4%BF/%E0%A5%A7%E0%A5%A7 नियम प्रकरणम्]''' दूसरे विभाग में गो व कृषि आदि की रक्षा समिति के नियम उल्लिखित हैं। * '''[https://web.archive.org/web/20150604014407/http://wikisource.org/wiki/%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%A3%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%A7%E0%A4%BF/%E0%A5%A7%E0%A5%A7#cite_ref-0 उपनियम प्रकरणम्]''' तीसरे विभाग में समिति के नियम व उपसभा के कार्यकलाप आदि हैं, तथा विशेष स्थितियों में सभा को क्या करना चाहिए, यह वर्णित है। पुस्तक की भाषा संस्कृतनिष्ठ हिन्दी है। इस पुस्तक के समीक्षा प्रकरण में भारत के उस समय के शासकों को प्रति सुशासन करने का आह्वान है। उदाहरण के लिए, राजाओं, सरदारों व धनाढ्य व्यक्तियों से गो रक्षा के लिए शतांश से अधिक आय का योगदान करने को कहा गया है। एक परिच्छेद में [[महारानी विक्टोरिया]] (उस समय की भारत की शासिका) का भी उल्लेख है<ref>[http://wikisource.org/wiki/गोकरुणानिधि/१० गोकरुणानिधि] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20150604064213/http://wikisource.org/wiki/%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%A3%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%A7%E0%A4%BF/%E0%A5%A7%E0%A5%A6 |date=4 जून 2015 }} पृ. १०</ref>, कि उन्होंने प्राणियों पर दया करने का विज्ञापन किया है, इस संदर्भ में लेखक का कहना है कि प्राणी की हत्या करना सबसे अधिक निर्दयता है। पुस्तक में पशुओं के साथ दुर्व्यवहार को देख के करुणा के भाव और सभी संप्रदाय के लोगों को समरूप से इस कार्य में शामिल होने का अनुरोध है। वनों और पशुओं को न मारकर उन्हें बचा के रखना, ये आज के पर्यावरणवादियों के विचारों से काफ़ी मिलती जुलती विचार धारा है जो इस पुस्तक में उजागर होती है। माना जाता है कि यह विश्व की पहली ऐसी पुस्तक जिसमें पशुओं को न मारने के अनेक तर्कों सहित पशुओं जैसे गाय, बकरी से प्राप्त दूध की सटीक जानकारी दी गई है। पुस्तक के अनुसार एक गाय अपने जीवन में २५७४० (पच्चीस हजार सात सौ चालीस) मनुष्यों को तृप्त कर सकती है तथा गाय को कुछ मनुष्यों द्वारा मांस के रूप में खाना अत्यंत अस्वाभाविक व निंदनीय है। लेखक का यह मंतव्य है कि गोमांस छिलके के समान है और दुग्ध सार के समान। अतः मांसाहार से बच के दुग्धपान करना चाहिए और पशुओं की रक्षा करनी चाहिए।<ref>(अंग्रेज़ी) [http://www.satyavidya.org/component/content/article/38-health-and-fitness/26-milk-veg-or-non-veg दूध - मांसाहार या नहीं] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20090908024728/http://www.satyavidya.org/component/content/article/38-health-and-fitness/26-milk-veg-or-non-veg |date=8 सितंबर 2009 }}</ref> [[भारत]] में [[गोरक्षा आन्दोलन]] के प्रारंभिक समय में इस पुस्तक का कई लोगों पर गहरा प्रभाव<ref>(अंग्रेज़ी) [http://www.cscsarchive.org/dataarchive/textfiles/textfile.2008-02-13.3417255307/file गोरक्षा]{{Dead link|date=जून 2020 |bot=InternetArchiveBot }}, पृष्ठ २ (पीडीएफ़)</ref> माना जाता है।
सारांश:
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