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== संक्षिप्त जीवनी == गोपालदास सक्सेना 'नीरज' का जन्म 4 जनवरी 1925 को [[ब्रिटिश भारत के प्रेसीडेंसी और प्रांत|ब्रिटिश भारत]] के [[संयुक्त प्रान्त आगरा व अवध]], जिसे अब [[उत्तर प्रदेश]] के नाम से जाना जाता है, में [[इटावा जिला|इटावा जिले]] के ब्लॉक महेवा के निकट पुरावली [[गाँव]] में बाबू ब्रजकिशोर सक्सेना<ref>हमारे लोकप्रिय गीतकार '''गोपालदास नीरज''' सम्पादक:शेरजंग गर्ग 2006 पृष्ठ 131 [[वाणी प्रकाशन]] दरिया गंज [[नई दिल्ली]] 110002 ISBN 81-7055-904-0</ref> के यहाँ हुआ था। मात्र 6 वर्ष की आयु में पिता गुजर गये। 1942 में [[एटा]] से हाई स्कूल परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। शुरुआत में [[इटावा]] की कचहरी में कुछ समय टाइपिस्ट का काम किया उसके बाद सिनेमाघर की एक दुकान पर नौकरी की। लम्बी बेकारी के बाद [[दिल्ली]] जाकर सफाई विभाग में टाइपिस्ट की नौकरी की। वहाँ से नौकरी छूट जाने पर [[कानपुर]] के डी०ए०वी कॉलेज में क्लर्की की। फिर बाल्कट ब्रदर्स नाम की एक प्राइवेट कम्पनी में पाँच वर्ष तक टाइपिस्ट का काम किया। नौकरी करने के साथ प्राइवेट परीक्षाएँ देकर 1949 में इण्टरमीडिएट, 1951 में बी०ए० और 1953 में प्रथम श्रेणी में [[हिंदी साहित्य|हिन्दी साहित्य]] से एम०ए० किया। मेरठ कॉलेज ,[[मेरठ]] में हिन्दी प्रवक्ता के पद पर कुछ समय तक अध्यापन कार्य भी किया किन्तु कॉलेज प्रशासन द्वारा उन पर कक्षाएँ न लेने व रोमांस<ref>हमारे लोकप्रिय गीतकार '''गोपालदास नीरज''' सम्पादक:शेरजंग गर्ग 2006 पृष्ठ 6 [[वाणी प्रकाशन]] दरिया गंज [[नई दिल्ली]] 110002 ISBN 81-7055-904-0</ref> करने के आरोप लगाये गये जिससे कुपित होकर नीरज ने स्वयं ही नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। उसके बाद वे [[अलीगढ़]] के धर्म समाज कॉलेज में हिन्दी विभाग के प्राध्यापक नियुक्त हो गये और मैरिस रोड जनकपुरी अलीगढ़ में स्थायी आवास बनाकर रहने लगे। [[कवि सम्मेलन|कवि सम्मेलनों]] में अपार लोकप्रियता के चलते नीरज को [[मुम्बई|बम्बई]] के फिल्म जगत ने गीतकार के रूप में '''नई उमर की नई फसल''' के गीत लिखने का निमन्त्रण दिया जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। पहली ही [[फ़िल्म]] में उनके लिखे कुछ गीत जैसे ''कारवाँ गुजर गया गुबार देखते रहे'' और ''देखती ही रहो आज दर्पण न तुम, प्यार का यह मुहूरत निकल जायेगा'' बेहद लोकप्रिय हुए जिसका परिणाम यह हुआ कि वे बम्बई में रहकर फ़िल्मों के लिये [[गीत]] लिखने लगे। फिल्मों में गीत लेखन का सिलसिला [[मेरा नाम जोकर]], [[शर्मीली]] और [[प्रेम पुजारी]] जैसी अनेक चर्चित फिल्मों में कई वर्षों तक जारी रहा। किन्तु बम्बई की ज़िन्दगी से भी उनका मन बहुत जल्द उचट गया और वे फिल्म नगरी को अलविदा कहकर फिर अलीगढ़ वापस लौट आये। पद्म भूषण से सम्मानित कवि, गीतकार गोपालदास 'नीरज' ने दिल्ली के एम्स में 19 जुलाई 2018 की शाम लगभग 8 बजे अन्तिम सांस ली। अपने बारे में उनका यह शेर आज भी मुशायरों में फरमाइश के साथ सुना जाता है: : ''इतने बदनाम हुए हम तो इस ज़माने में, लगेंगी आपको सदियाँ हमें भुलाने में।'' : ''न पीने का सलीका न पिलाने का शऊर, ऐसे भी लोग चले आये हैं मयखाने में॥''
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