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==इतिहास== [[Image:Status of cow slaughter in India.png|right|thumb|300px|भारात के विभिन्न राज्यों में गोहत्या-निषेष सम्बन्धी कानूनों की स्थिति]] स्वाधीन भारत में [[विनोबा भावे|विनोबाजी]] ने गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध की मांग रखी थी। उसके लिए उन्होने [[जवाहरलाल नेहरू]] से कानून बनाने का आग्रह किया था। वे अपनी पदयात्रा में यह सवाल उठाते रहे। कुछ राज्यों ने गोवधबंदी के कानून बनाए। सन १९५५ में [[हिन्दू महासभा]] के अध्यक्ष [[निर्मलचन्द्र चटर्जी]] (लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष [[सोमनाथ चटर्जी]] के पिता) ने गोबध पर रोक के लिए एक विधेयक प्रस्तुत किया था। उस पर जवाहरलाल नेहरू ने लोकसभा में घोषणा की कि "मैं गोवधबंदी के विरुद्ध हूँ। सदन इस विधेयक को रद्द कर दे। राज्य सरकारों से मेरा अनुरोध है कि ऐसे विधेयक पर न तो विचार करें और न कोई कार्यवाही।" 1956 में इस विधेयक को कसाइयों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उस पर 1960 में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया। धीरे-धीरे समय निकलता जा रहा था। लोगों को लगा कि अपनी सरकार अंग्रेजों की राह पर है। वह आश्वासन देती रही और गोवध एवं गोवंश का नाश का होता गया। इसके बाद 1965-66 में [[प्रभुदत्त ब्रह्मचारी]], [[स्वामी करपात्री]] और देश के तमाम सन्तों ने इसे आन्दोलन का रूप दे दिया। गोरक्षा का अभियान शुरू हुआ। देशभर के सन्त एकजुट होने लगे। लाखों लोग और सन्त सड़कों पर आने लगे। इस आन्दोलन को देखकर राजनीतिज्ञ लोगों के मन में भय व्याप्त होने लगा। इसकी गंभीरता को समझते हुए सबसे पहले लोकनायक [[जयप्रकाश नारायण]] ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को 21 सितम्बर 1966 को पत्र लिखा। उन्होंने लिखा कि "गोवधबंदी के लिए लंबे समय से चल रहे आन्दोलन के बारे में आप जानती ही हैं। संसद के पिछले सत्र में भी यह मुद्दा सामने आया था और जहां तक मेरा सवाल है, मैं यह समझ नहीं पाता कि भारत जैसे एक हिन्दू बहुल देश में, जहां गलत हो या सही, गोवध के विरुद्ध ऐसा तीव्र जन-संवेग है, गोवध पर कानूनन प्रतिबन्ध क्यों नहीं लगाया जा सकता?" इंदिरा गांधी ने जयप्रकाश नारायण की यह सलाह नहीं मानी। परिणाम यह हुआ कि सर्वदलीय गोरक्षा महाभियान ने ७ नवम्बर १९६६ को दिल्ली में विराट आन्दोलन किया। दिल्ली के इतिहास का वह सबसे बड़ा प्रदर्शन था। 12 अप्रैल 1978 को डॉ. रामजी सिंह ने एक निजी विधेयक रखा जिसमें संविधान की धारा 48 के निर्देश पर अमल के लिए कानून बनाने की मांग थी। 21 अप्रैल 1979 को [[विनोबा भावे]] ने अनशन शुरू कर दिया। 5 दिन बाद प्रधानमंत्री [[मोरारजी देसाई]] ने कानून बनाने का आश्वासन दिया और विनोबा ने उपवास तोड़ा। 10 मई 1979 को एक संविधान संशोधन विधेयक पेश किया गया, जो लोकसभा के विघटित होने के कारण अपने आप समाप्त हो गया। इंदिरा गांधी के दोबारा शासन में आने के बाद 1981 में [[पवनार]] में गोसेवा सम्मेलन हुआ। उसके निर्णयानुसार 30 जनवरी 1982 की सुबह विनोबा ने उपवास रखकर गोरक्षा के लिए सौम्य सत्याग्रह की शुरुआत की। वह सत्याग्रह 18 साल तक चलता रहा। आज भी गोवध पर केंद्र सरकार किसी भी तरह का कानून नहीं ला पाई है।
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