सामग्री पर जाएँ
मुख्य मेन्यू
मुख्य मेन्यू
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
मार्गदर्शन
मुखपृष्ठ
हाल में हुए बदलाव
बेतरतीब पृष्ठ
मीडियाविकि के बारे में सहायता
भारतपीडिया
खोजें
खोजें
दिखावट
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
व्यक्तिगत उपकरण
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
लॉग-आउट किए गए संपादकों के लिए पृष्ठ
अधिक जानें
योगदान
वार्ता
"
गौरीशंकर हीराचंद ओझा
" (अनुभाग) सम्पादित करें
पृष्ठ
चर्चा
हिन्दी
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
उपकरण
उपकरण
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
क्रियाएँ
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
सामान्य
कड़ियाँ
पृष्ठ से जुड़े बदलाव
विशेष पृष्ठ
पृष्ठ की जानकारी
दिखावट
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
चेतावनी:
आपने लॉग-इन नहीं किया हुआ है। अगर आप सम्पादन करते हैं तो इस पृष्ठ के सम्पादन इतिहास में आपका IP पता दृश्य होगा। अगर आप
लॉग-इन
करते हैं या
खाता बनाते हैं
तो दूसरी सुविधाओं के साथ-साथ आपके सम्पादनों का श्रेय आपके सदस्यनाम पर दिया जाएगा।
ऐन्टी-स्पैम जाँच। इसे
नहीं
भरें!
==जीवन परिचय== पण्डित गौरीशंकर हीराचंद ओझा का जन्म 15 सितम्बर, 1863 ई. को [[मेवाड़]] और [[सिरोही]] राज्य की सीमा पर स्थित 'रोहिड़ा' नामक छोटे से गाँव में एक [[ब्राह्मण]] परिवार में हुआ था।<ref>[http://books.google.com/books?id=BM8BAAAAMAAJ&q=gaurishankar+hirachand+ojha&dq=gaurishankar+hirachand+ojha&hl=en&sa=X&ei=ni9PUrDMAu_EiwK7jYGYCQ&ved=0CEsQ6AEwBziCAQ पांड्य ए. के. (१९५२) ''आबु इन बॉम्बे स्टेट'' पृष्ठ ४०, प्रकाशक: चारुतर विद्या मंडल, बम्बई]</ref>उनकी प्रारम्भिक शिक्षा गांव में ही हुई। [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]] का अध्ययन इन्होंने अपने पिता के पास रहकर किया। बाद में 1877 में मात्र 14 वर्ष की आयु में उच्च शिक्षा के लिये वे [[मुम्बई]] गये, जहां 1885 में 'एलफिंस्टन हाईस्कूल' से मेट्रिक्यूलेशन की परीक्षा उत्तीर्ण की। रोगग्रस्त हो जाने के कारण वे इन्टरमीडिएट की परीक्षा न दे सके और गांव लौट आये। === व्यवसाय === 1888 ई० में ओझा जी उदयपुर पहुँचे थे। कविराज श्यामलदास इनसे इतना प्रभावित हुए थे कि उन्होंने इन्हें अपने इतिहास कार्यालय में सहायक मंत्री बना दिया था, जिससे इन्हें [[मेवाड़]] के भिन्न-भिन्न ऐतिहासिक स्थानों को देखने और ऐतिहासिक सामग्री संकलित करने का अवसर मिला। बाद में इन्हें [[उदयपुर]] के विक्टोरिया हाल के पुस्तकालय एवं म्यूजियम का अध्यक्ष बनाया गया। वहाँ पुरातत्व विभाग के लिए इन्हें शिलालेखों, सिक्कों, मूर्तियों आदि ऐतिहासिक सामग्री संग्रह करने का अवसर मिला। यहाँ रहते हुए ही ओझा जी ने '''भारतीय प्राचीन लिपिमाला''' नामक ग्रंथ लिख कर पुरातत्व जगत में विशिष्ट ख्याति प्राप्त की।<ref name="ReferenceA">राजस्थान : इतिहास एवं संस्कृति एन्साइक्लपीडिया, डॉ० हुकमचंद जैन एवं नारायण माली, जैन प्रकाशन मंदिर, जयपुर, संस्करण-2010, पृ०-336.</ref> यह पुस्तक 1894 ई० में प्रकाशित हुई थी। भारतीय अभिलेखों के अध्ययन की यह प्रथम प्रामाणिक पुस्तक थी। इसका संशोधित संस्करण 1918 ई० में प्रकाशित हुआ। पुस्तक में [[देवनागरी]] अक्षरों का [[ब्राह्मी लिपि]] से उद्भव का अत्यंत सुन्दर प्रदर्शन है। [[लॉर्ड कर्जन|लार्ड कर्जन]] के संपर्क में आने पर ओझा जी की विद्वता से प्रभावित होकर कर्जन ने इन्हें अजमेर में म्यूजियम का अध्यक्ष बना दिया। उस समय अनेक राजपूत राज्यों में भ्रमण करने का अवसर इन्हें मिला। वहीं रहते हुए 1911 ई० में इन्होंने 'सिरोही राज्य का इतिहास' लिखा था।<ref name="ReferenceA" /> ''सोलंकियों का इतिहास'' 1907 ई० में प्रकाशित हो चुका था। इस पुस्तक की समीक्षा ''जर्नल ऑफ़ दी रॉयल एशियाटिक सोसाइटी'' में प्रकाशित हुई थी<ref>[http://books.google.com/books?id=BIaLAAAAIAAJ&pg=PA283&dq=gaurishankar+hirachand+ojha&hl=en&sa=X&ei=vTJPUpGZLqrfiALn6YCwCQ&ved=0CCwQ6AEwADgU#v=onepage&q=gaurishankar%20hirachand%20ojha&f=false ''जर्नल ऑफ़ दी रॉयल एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ ग्रेट ब्रिटेन एंड आयरलैंड'' १९०८ ई. , पृष्ठ २८३ ]</ref>। ''हिस्ट्री ऑफ़ राजपुताना'' शृंखला का प्रारंभ 1926 ई० में हुआ। पंद्रह वर्षों की अवधि में उदयपुर ([[मेवाड़]]), जोधपुर, बीकानेर, डूंगरपुर, बांसवाडा तथा प्रतापगढ़ के इतिहास प्रकाशित हुए। ''मध्यकालीन भारतीय संस्कृति'' नामक पुस्तक में भारतीय संस्कृति पर शोधपूर्ण प्रकाश डाला गया है।<ref>[http://books.google.com/books?id=nKJiBUFrmfoC&pg=PA43&dq=gaurishankar+hirachand+ojha#v=onepage&q=gaurishankar%20hirachand%20ojha&f=false श्रीवास्तव, विजय शंकर (१९८१) ''कल्चरल कोंटूर्स ऑफ़ इंडिया'' पृष्ठ ३७ अभिनव प्रकाशन दिल्ली ISBN 978-0-391-02358-1]</ref> शिलालेख, दानपत्र, सिक्के, हस्तलिखित ख्यातें, बातें, राव-भाटों की बहियें, राजस्थानी व संस्कृत के काव्य, गुजराती व मराठी भाषाओं के ग्रंथ, फारसी ग्रंथों का अनुवाद और विदेशी यात्रियों के विवरण ओझा जी के इतिहास लेखन के आधार स्रोत रहे हैं। इन्होंने प्रत्येक घटना के वर्णन में प्राप्त सभी आधार स्रोतों का उपयोग करते हुए उनकी सत्यता को प्रमाणित करने का यथासंभव प्रयास किया और संदर्भ सामग्री का सुस्पष्ट उल्लेख पाद टिप्पणी में किया। आधार स्रोतों का पाद टिप्पणी में उल्लेख करने की परंपरा ओझा जी ने ही डाली थी।<ref name="ReferenceA" />
सारांश:
भारतपीडिया पर किया कोई भी योगदान अन्य सदस्यों द्वारा बदला जा सकता है और हटाया भी जा सकता है। अगर आपको अपने लिखे हुए पाठ में संपादन होना नामंजूर है तो यहाँ पर न लिखें।
आप हमें यह भी वचन देतें हैं कि यह आपने स्वयं लिखा है अथवा सार्वजनिक क्षेत्र या किसी समान मुक्त स्रोत से प्रतिलिपित किया है (अधिक जानकारी के लिये
भारतपीडिया:कॉपीराइट
देखें)।
कॉपीराइट सुरक्षित कार्यों को बिना अनुमति के यहाँ न डालें!
रद्द करें
सम्पादन सहायता
(नए विंडो में खुलता है)