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== परिचय == यदि [[इंजन]] से किसी दूसरी मशीन को चलाया जा रहा है, तो इंजन की घिरनी चलानेवाली घिरनी कहलाएगी और मशीन की घिरनी चलनेवाली घिरनी होगी। घिरनियाँ प्राय: ढालवाँ लोहे की होती हैं, जिनमें बीच का भाग घिरनी के हाल से बाजुओं द्वारा जुड़ा होता है। ये बाजू संख्या में चार से लेकर छ: तक होते हैं। घिरनी के बीचवाले भाग के छेद में धुरी को डालकर कस दिया जाता है। घिरनी के हर भाग की नाप ऐसी रखी जाती है कि वह उसपर पड़नेवाले हर बल को सहन कर सके। घिरनी के हाल की चौड़ाई पट्टे की चौड़ाई से कुछ ही ज्यादा रखी जाती है। इसके हाल पर दो प्रकर के बल होंगे, एक तो पट्टे के खिंचाव के कारण और दूसरा इसके घूमने के कारण। यह देखा गया है कि एक वर्ग इंच परिच्छेद के हाल की घिरनी की गति 100 फुट प्रति सेकंड से अधिक होनी चाहिए। इसलिये ढलवाँ लोहे की घिरनी को इस गति से अधिक तेज नहीं चलाया जाता। जहाँ अधिक गति की आवश्यकता होती है वहाँ कच्चे और ढलवाँ लोहे को मिलाकर घिरनी बनाई जाती है। इसका ध्यान रहे कि अधिक गति से चलनेवाली घिरनियों को ढाला नहीं जाता, बल्कि इसके विभिन्न भागों को अलग बनाकर पेचों द्वारा जोड़ा जाता है। इस प्रकार की घिरनी का भार भी प्राय: अधिक नहीं होता और न उसके टूटने का इतना डर रहता है। घिरनी बनाने में इसका भी ध्यान रखा जाता है कि उसका आकर्षणकेन्द्र ठीक बीच में हो। यदि ऐसा न हुआ तो धुरी के घूमते ही उसमें थरथराहट पैदा होगी और धुरी को तोलन खराब हो जायगा। इसलिये घिरनी को धुरी पर चढ़ाकर इसका तोलन जाँच लिया जाता है। इसको जाँचने के लिये धुरी को दोनों किनारों से आधारों पर रख दिया जाता है। यदि धुरी हर स्थान पर रुकी रहे और घूमे नहीं, तो इसका तोलन ठीक होगा और अगर यह किसी ओर घूम जाय तो इससे पता चलेगा कि घिरनी एक ओर से भारी है। घिरनी जिस ओर भारी होती है उसके दूसरी ओर उतना ही वजन बाँधकर इसका तोलन ठीक कर लिया जाता है।
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