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== जीवाश्मों के अभिलक्षण == जीवाश्म भी, आधुनिक जीवों की आकृति से, न्यूनाधिक रूप में, मिलते-जुलते हैं। जीवाश्म केवल अवसादी शिलाखंडों में ही (कुछ अपवादों को छोड़कर) मिला करते हैं। अनेक प्रकार के जीवजंतुओं की अनेक परिस्थितियों में मृत्यु के उपरांत उनके शवों पर जो अवसाद (Sediment) जमा हाते हते हैं, कालांतर में वे ही जीवाश्म बन जाया करते हैं। कुछ जीवाश्म तो इतने पूर्ण हैं कि उनकी आण्वीक्षिकीय परीक्षा (microscopic examination) करने पर जीवों की कोशिका तक की रचनाएँ स्पष्ट दीख पड़ती हैं। जीवों के अश्मीभूत प्रमाण (fossilized specimens) अपने (जीवों के) जीवित शरीर के रूप में ही मिल जाएँ, यह आवश्यक नहीं है। उनके शवों में सड़ाँध, आक्सीकरण (oxidation), हिंसक जीवों द्वारा विकृत कर देने, शीत, वर्षा, धूप आदि के कारण विकार उत्पन्न हो जाता है। कुछ जंतु, जिनके शरीर कैल्सियम कार्बोनेट, सिलिका आदि जैसे अकार्बनिक पदार्थों द्वारा बने होते हैं, उनपर विकार का प्रभाव अपेक्षाकृत कम पड़ता है। ऐसे जीवों के जीवाश्म बहुत कम संख्या में उपलब्ध हैं। जो उपलब्ध हैं भी वे आधुनिक जीवित जीवों से तुलना करने के लिए अपूर्ण हैं। जीवों की एक अन्य विशेषता यह भी है कि एक प्रकार के जीवाश्म कुछ विशेष प्रकार के शिलाखंडों में ही मिलते हैं। इन शिलाखंडों से जीवाश्मों के पूर्ण जीवन के परिवेश का ज्ञान हो जाता है। जीवाश्मों से यह भी मालूम होता है कि जीव कैसे स्थान पर रहा करता था और क्या खाता-पीता था। इनसे तत्कालीन भौगोलिक परिस्थितियों पर भी प्रकाश पड़ता है। हिम क्षेत्रों में पाए गए जीवाश्म अथवा संपूर्ण जीवशरीर जीवाश्म वैज्ञानिकों के लिए वरदान सिद्ध हुए हैं। विशेषत: साइबेरिया के सुदूर उत्तर ध्रुवसागरीय क्षेत्र में लगभग संपूर्ण जीव ज्यों के त्यों प्राप्त हुए हैं। इनसे सुदूर अतीत के जीवों पर अच्छा खासा प्रकाश पड़ता है। साधारण रूप से जंतुओं के शरीर के कड़े भाग-हड्डियाँ, दाँत, खोल (shell) आदि-प्रस्तरीकृत (petrifacted) हो जाते हैं। लल ने इटली के पाम्पिआई नगर को 'जीवाश्मनगर' (fossil city) की संज्ञा देते हुए बतलाया कि ईस्वी सन् 79 में विसूवियस ज्वालामुखी के उद्गार के फलस्वरूप इस सुंदर नगर में कम से कम 2,000 व्यक्तियों की जानें गईं। ज्वालामुखी की धधकती आग, तप्त राख आदि ने संपूर्ण नगर को कई फुट मोटी पर्त से ढँक दिया। अंत में पर्वत के बड़े-बड़े जलते टुकड़ों ने घरों की खिड़कियाँ तथा दरवाजों के भीतर घुसकर उनके भीतर मृत मनुष्यों एवं पशुपक्षियों को घर में ही दफन कर दिया। ्झ्ररिसर्च स्वान लल : आर्गैनिक रेवोल्यूशन, मैक्मिलन कं. टोरंटो (कैनेडा), 1929ट। कभी-कभी अश्मीभूत जंतुओं की खोखली अस्थियों, जैसे कपाल (स्कल), हाथ पैर की हड्डियों, खोलों आदि के भीतर की वसा या मज्जा नष्ट हो जाती है और उसमें दूसरे पदार्थों के अवसाद भर जाते हैं। कालांतर में ये इतने कठोर हो जाते हैं कि यदि ऊपरी खोल को तोड़ दिया जाए तो भीतर एक मूर्ति जैसी प्रतिकृति (cast) जाती है। इसी प्रकार दलदलों, गीली मिट्टयों और भूमि पर पड़े पशुपक्षियों के पदचिह्न भी अश्मीभूत हो गए हैं। इन पदचिह्नों से जंतुओं के पैरों के तलवों की रचनाकृति एवं आकार का ही ज्ञान नहीं होता वरन् उनके आवागमन के मार्ग का भी निर्देश होता है। कुछ जंतुओं की विष्ठा भी अश्मीभूत रूप में प्राप्त होती हैं। इनके रासायनिक अध्ययन से उन जंतुओं के आहार का ज्ञान होता है। कुछ समुद्री मछलियों तथा अन्य जंतुओं की अन्ननली में दूसरी छोटी मछलियाँ या कीड़े मकोड़े, पशुपक्षी, अधपके मांस (अश्मीभूत) आदि भी पाए गए हैं।
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