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== भगवान == {{मुख्य|जैन धर्म में भगवान}} जैन ईश्वर को मानते हैं जो सर्व शक्तिशाली [[त्रिलोक]] का ज्ञाता द्रष्टा है पर त्रिलोक का कर्ता नही | जैन धर्म में जिन या [[अरिहन्त]] और [[सिद्ध (जैन धर्म)|सिद्ध]] को ईश्वर मानते हैं। अरिहंतो और केवलज्ञानी की आयुष्य पूर्ण होने पर जब वे जन्ममरण से मुक्त होकर निर्वाण को प्राप्त करते है तब उन्हें सिद्ध कहा जाता है। उन्हीं की आराधना करते हैं और उन्हीं के निमित्त [[मन्दिर|मंदिर]] आदि बनवाते हैं। जैन ग्रन्थों के अनुसार अर्हत् देव ने संसार को द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा से अनादि बताया है। जगत का न तो कोई कर्ता है और न जीवों को कोई सुख दुःख देनेवाला है। अपने अपने कर्मों के अनुसार जीव सुख दुःख पाते हैं। जीव या आत्मा का मूल स्वभान शुद्ध, बुद्ध, सच्चिदानंदमय है, केवल पुदगल या कर्म के आवरण से उसका मूल स्वरुप आच्छादित हो जाता है। जिस समय यह पौद्गलिक भार हट जाता है उस समय आत्मा परमात्मा की उच्च दशा को प्राप्त होता है। जैन मत 'स्याद्वाद' के नाम से भी प्रसिद्ध है। स्याद्वाद का अर्थ है अनेकांतवाद अर्थात् एक ही पदार्थ में नित्यत्व और अनित्यत्व, सादृश्य और विरुपत्व, सत्व और असत्व, अभिलाष्यत्व और अनभिलाष्यत्व आदि परस्पर भिन्न धर्मों का सापेक्ष स्वीकार। इस मत के अनुसार आकाश से लेकर दीपक पर्यंत समस्त पदार्थ नित्यत्व और अनित्यत्व आदि उभय धर्म युक्त है। === तीर्थंकर === [[चित्र:Photo of lord adinath bhagwan at kundalpur.JPG|thumb|250px|प्रथम तीर्थंकर '''[[ऋषभदेव]]''' की प्रतिमा (कुण्डलपुर, मध्य प्रदेश)]] [[Image:Mahavir.jpg|right|thumb|250px|भगवान महावीर]] {{मुख्य|तीर्थंकर}} जैन धर्म मे 24 तीर्थंकरों को माना जाता है। तीर्थंकर धर्म तीर्थ का प्रवर्तन करते है। इस काल के २४ तीर्थंकर है- {| |- |क्रमांक|| तीर्थंकर |- |1 |[[ऋषभदेव]]- इन्हें '[[ऋषभदेव|आदिनाथ]]' भी कहा जाता है |- |2 |[[अजितनाथ]] |- |3 |[[सम्भवनाथ]] |- |4 |[[अभिनंदननाथ|अभिनंदन जी]] |- |5 |[[सुमतिनाथ|सुमतिनाथ जी]] |- |6 |[[पद्मप्रभ जी|पद्मप्रभु जी]] |- |7 |[[सुपार्श्वनाथ|सुपार्श्वनाथ जी]] |- |8 |[[चन्द्रप्रभ जी|चंदाप्रभु जी]] |- |9 |[[सुविधिनाथ]]- इन्हें 'पुष्पदन्त' भी कहा जाता है |- |10 |[[शीतलनाथ|शीतलनाथ जी]] |- |11 |[[श्रेयांसनाथ]] |- |12 |[[वासुपूज्य|वासुपूज्य जी]] |- |13 |[[विमलनाथ|विमलनाथ जी]] |- |14 |[[अनन्तनाथ|अनंतनाथ जी]] |- |15 |[[धर्मनाथ|धर्मनाथ जी]] |- |16 |[[शांतिनाथ]] |- |17 |[[कुन्थुनाथ|कुंथुनाथ]] |- |18 |[[अरनाथ|अरनाथ जी]] |- |19 |[[मल्लिनाथ|मल्लिनाथ जी]] |- |20 |[[मुनिसुव्रतनाथ|मुनिसुव्रत जी]] |- |21 |[[नमिनाथ|नमिनाथ जी]] |- |22 |[[नेमिनाथ|अरिष्टनेमि जी]] - इन्हें 'नेमिनाथ' भी कहा जाता है। जैन मान्यता में ये नारायण [[कृष्ण|श्रीकृष्ण]] के चचेरे भाई थे। |- |23 |[[पार्श्वनाथ]] |- |24 |[[महावीर|वर्धमान महावीर]] - इन्हें वर्धमान, सन्मति, वीर, अतिवीर भी कहा जाता है। |} वैदिक दर्शन परम्परा में भी ॠषभदेव का विष्णु के 24 अवतारों में से एक के रूप में संस्तवन किया गया है। [[भागवत पुराण|भागवत]] में ''अर्हन्'' राजा के रूप में इनका विस्तृत वर्णन है। हिन्दूपुराण [[भागवत पुराण|श्रीमद्भागवत]] के पाँचवें स्कन्ध के अनुसार मनु के पुत्र प्रियव्रत के पुत्र आग्नीध्र हुये जिनके पुत्र राजा नाभि (जैन धर्म में नाभिराय नाम से उल्लिखित) थे। राजा नाभि के पुत्र ऋषभदेव हुये जो कि महान प्रतापी सम्राट हुये। [[भागवत पुराण|भागवतपुराण]] अनुसार भगवान ऋषभदेव का विवाह [[इन्द्र]] की पुत्री [[जयन्ती]] से हुआ। इससे इनके सौ पुत्र उत्पन्न हुये। उनमें [[भरत चक्रवर्ती]] सबसे बड़े एवं गुणवान थे।<ref>श्रीमद्धभागवत पंचम स्कन्ध, चतुर्थ अध्याय, श्लोक ९</ref> उनसे छोटे कुशावर्त, इलावर्त, ब्रह्मावर्त, मलय, केतु, भद्रसेन, इन्द्रस्पृक, विदर्भ और कीकट ये नौ राजकुमार शेष नब्बे भाइयों से बड़े एवं श्रेष्ठ थे। उनसे छोटे कवि, हरि, अन्तरिक्ष, प्रबुद्ध, पिप्पलायन, आविर्होत्र, द्रुमिल, चमस और करभाजन थे। [[विष्णु पुराण]] में श्री ऋषभदेव, [[मनुस्मृति]] में प्रथम जिन (यानी ऋषभदेव) [[स्कन्द पुराण|स्कंदपुराण]], [[लिङ्ग पुराण|लिंगपुराण]] आदि में बाईसवें तीर्थंकर अरिष्टनेमि का उल्लेख आया है। जैन नगर पुराण में कलयुग में एक [[जैन मुनि]] को भोजन कराने का फल सतयुग में दस ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर कहा गया है। अंतिम दो तीर्थंकर, पार्श्वनाथ और महावीर स्वामी ऐतिहासिक पुरुष है{{sfn|Zimmer|1953|p=182-183}}। महावीर का जन्म ईसा से 599 वर्ष पहले होना ग्रंथों से पाया जाया है। शेष के विषय में अनेक प्रकार की अलौकिक और प्रकृतिविरुद्ध कथाएँ हैं। [[ऋषभदेव]] की कथा [[भागवत पुराण|भागवत]] आदि कई पुराणों में आई है और इनमें विष्णु के २४ [[अवतार|अवतारों]] के रूप में की गई है। महाभारत के अनुशासन पर्व, महाभारत के शांतिपर्व, स्कन्ध पुराण, जैन प्रभास पुराण, जैन लंकावतार आदि अनेक ग्रंथो में अरिष्टनेमि का उल्लेख है।
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