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== इतिहास == {{मुख्य|ज्यामिति का इतिहास}} [[भारत]] में यज्ञवेदियों के निर्माण कार्य में गणितज्ञों का ध्यान ज्यामिति के अध्ययन की और आकृष्ट किया, उनके अध्ययन में क्षेत्रसमिति का पुट अधिक था। इतिहासयज्ञों का मत है कि भारतवासी ईसा से 1,000 वर्ष पूर्व ऐसे संबंध जैसे 32 + 42 = 52 (32 + 42 = 52) जानते थे, परंतु ऐसे ही कतिपय छुटपुट समीकरणों के अतिरिक्त उन्होंने ऐसे संबंधों का किसी व्यापक रूप से अध्ययन नहीं किया। ईसा से लगभग 600 वर्ष पूर्व रोम के गणितज्ञ पिथागोरैस ने इस संबंध का बड़े तर्कपूर्ण ढंग से अध्ययन किया और यह बताया कि एक समकोण त्रिभुज में कर्ण पर का वर्ग अन्य भुजाओं के ऊपर वर्गों के योगफल के बराबर होता है। वैसे तो ज्यामिति का अध्ययन सभी पुराने सभ्य देशों, जैसे मिस्र, बैबिलोनिया, चीन, भारत तथा यूनान, में लगभग साथ ही साथ आरंभ हुआ, परंतु जितनी उन्नति इस विज्ञान में यूनान ने की उतनी किसी और देश ने नहीं की। ईसा से लगभग 300 वर्ष पूर्व यूनान के एक गणितज यूक्लिड ने उस समय तक जितने तथ्य ज्ञात थे उन सबको बड़े तर्कपूर्ण ढंग से क्रमबद्ध किया। ज्ञात तथ्यों के आधार पर उसने अन्य तथ्य सिद्ध करने का प्रयत्न किया। इस प्रकार तथ्यों को क्रमबद्ध करने पर वह कुछ ऐसे प्रारंभिक तथ्यों पर पहुँचा जिनको सिद्ध करना कठिन है। वैसे वे बिलकुल स्पष्ट प्रतीत होते हैं। ये तथ्य इतने सरल हैं कि [[यूक्लिड]] ने इन्हें स्वयंसिद्ध मान लिया और इन्हें स्वयं तथ्य कहा है। इन्हीं तथ्यों पर ज्यामिति के प्रमेयों का प्रमाण निर्भर है। वे तथ्य निम्नलिखित हैं : १. वे वस्तुएँ, जो एक ही वस्तु के बराबर हों, आपस में भी बराबर होती हैं। २. यदि बराबर वस्तुओं में बराबर वस्तुएँ जोड़ दी जायँ तो योगफल बराबर होते हैं। ३. यदि बराबर वस्तुओं में से बराबर वस्तुएँ घटा दी जायँ तो शेषफल बराबर होते हैं। ४. बराबर वस्तुओं के समान गुने बराबर होते हैं। ५. यदि दो रेखाओं को तीसरी रेखा काटे और एक ओर के अंत:कोणों का योग दो समकोण से कम हो तो जिधर जोड़ कम है उधर ही दोनों रेखाएँ बढ़ाई जाने पर एक बिंदु पर मिलेंगी। ६. इसी प्रकार रचनाकार्य में भी एक रचना से दूसरी रचना कर सकते हैं, परंतु अंत में कुछ ऐसी रचनाओं पर पहुँचते हैं जिनका प्रयोग दूसरे प्रयोगों पर निर्भर नहीं करता। इन रचनाओं को भी स्वयं प्रयोग मानकर ही आगे बढ़ सकते हैं। वे :(१) किसी भी बिन्दु से एक रेखा खींची जा सकती है। :(२) सीमित रेखाएँ दोनों ओर बढ़ाई जा सकती है। :(३) एक बिन्दु को केंद्र मानकर किसी त्रिज्या का एक वृत्त खींच सकते हैं। इनके अतिरिक्त वे कोई और तथ्य बिना सिद्ध किए हुए स्वीकार नहीं करते। उपर्युक्त पाँच स्वयं तथ्यों में से चार तो इतने सरल तथा सप्ष्ट हैं कि इन्हें सिद्ध करना अपने हाथ को अपना सिद्ध करने के बराबर है, परन्तु पाँचवाँ स्वयंतथ्य स्वयंसिद्ध सा प्रतीत नहीं होता। गणितज्ञों ने इस तथ्य को स्वयंसिद्ध मानने में आपत्ति की और इसे सिद्ध करने के बहुत यत्न किए। इन्हीं यत्नों के फलस्वरूप बड़े बड़े आविष्कार हुए। इसी प्रकार ज्यामिति में नए नए पारिभाषिक शब्दों का उल्लेख होता है। एक शब्द की परिभाषा दूसरे शब्दों की परिभाषा पर निर्भर करती है। अंत में देखते हैं कि ये परिभाषाएँ बिंदु, रेखा और तल की परिभाषाओं पर आधारित हैं। यूक्लिड के अनुसार समतल वह है जिसमें लंबाई चौड़ाई हो, परंतु मोटाई न हो। बहुत से लोग इस परिभाषा पर भी संदेह करने लगे हैं, परंतु थोड़ा मनन करने से यह स्पष्ट हो जाएगा कि परिभाषा ठीक है। उदाहरणार्थ, यदि काँच के एक बरतन में दो ऐसे तरल पदार्थ भर दिए जायँ जो आपस में न मिलते हो तो जब वे स्थिर हो जायँ तब हम देखगें कि एक तल दोनों पदार्थों को अलग करता है। उसमें मोटाई नहीं है। यदि होती तो दोनों तरलों के बीच ऐसा स्थान होता जिसमें न नीचे का पदार्थ होता न ऊपर का, परंतु ऐसा असंभव है। इस उदाहरण से स्पष्ट हो गया होगा कि तल में मोटाई नहीं होती। इसमें केवल लंबाई और चौड़ाई ही होती है। इसी प्रकार धूप में किसी समतल दीवार की छाया देखकर हम कह सकते हैं कि रेखा में चौड़ाई नहीं होती। रेखा तल में स्थित है, अत: तल की मोटाई रेखा की मोटाई हुई। इसलिये रेखा में न मोटाई होती है न चौड़ाई, केवल लंबाई ही होती है। रेखाएँ एक बिंदु पर मिलती हैं तो रेखा की चौड़ाई बिंदु की लंबाई हुई, अर्थात् बिंदु में न लम्बाई होती है, न चौड़ाई, मोटाई। केवल स्थान ही होता है। सभी इस बात से परिचित होंगे कि ज्यामिति में त्रिभुज, वर्ग, वृत्त, शंकु, बेलन इत्यादि के गुणों का अध्ययन होता है1 पुराने समय में कुछ प्रश्नों ने गणितज्ञों को काफी उलझाए रखा। उन प्रश्नों के हलों ने बहुत विचारवर्धन किया, इसमें कोई शंका नहीं, जैसे ऐसा घन बनाना जिसका घनफल दिए घन का दुगुना हो। उस समय रचना का अर्थ पटरी और परकार की सहायता से ही रचना करना समझा जाता था। दूसरा प्रश्न था ऐसा वर्ग बनाना जिसका क्षेत्रफल दिए हुए वृत्त के क्षेत्रफल के बराबर हो। तीसरा प्रश्न था कि एक दिए हुए कोण को तीन बराबर भागों में बाँटना। यह काम पटरी और परकार से असंभव है, परन्तु अन्य उपायों से हो सकता है। इन प्रश्नों ने शताब्दियों तक गणितज्ञों को व्यस्त रखा। इनके विवेचन से गणितजगत् का बहुत लाभ पहुँचा, इसमें कोई संदेह नहीं। एक शंकु को किसी समतल से काटने से जो [[दीर्घवृत्त]], [[परवलय]], तथा [[अति परवलय|अतिपरवलय]] वक्र बनते हैं उनके गुणों का भी यूनानियों ने अध्ययन किया। इन अध्ययनों ने केपलन को अपने नियम ज्ञात करने में बड़ी सहायता दी होगी।
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