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== अवलोकन == प्रथम [[तीर्थंकर]] [[ऋषभदेव]] वर्तमान [[ब्रह्माण्ड (जैन धर्म)|अवसर्पिणी]] काल के प्रथम दिगम्बर मुनि थे।{{sfn|B.K._Jain|2013|p=31}} जैन धर्म में [[मोक्ष (जैन धर्म)|मोक्ष]] की अभीलाषा रखने वाले व्रती दो प्रकार के बताय गए हैं— महाव्रती और अणुव्रति। महाव्रत अंगीकार करने वाले को महाव्रती और अणुव्रत (छोटे व्रत) धारण करने वालों को [[श्रावक]] (ग्रहस्त) कहा जाता है। दिगम्बर साधुओं को निर्ग्रंथ भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है "बिना किसी बंधन के"।<span class="mw-ref" id="cite_ref-FOOTNOTEB.K._Jain201362_4-0" rel="dc:references">[[#cite_note-FOOTNOTEB.K._Jain201362-4|<span class="mw-reflink-text"><nowiki>[4]</nowiki></span>]]</span> इस शब्द का मूल रूप से लागू उनके लिए किया जाता था जो साधु सर्वज्ञता ([[केवल ज्ञान]]) को प्राप्त करने के निकट हो और प्राप्ति पर वह मुनि कहलाते थे।<span class="mw-ref" id="cite_ref-FOOTNOTEC.R._Jain192619_5-0" rel="dc:references">[[#cite_note-FOOTNOTEC.R._Jain192619-5|<span class="mw-reflink-text"><nowiki>[5]</nowiki></span>]]</span>
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