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== पौराणिक संदर्भ == [[पुराण|पुराणों]] में वर्णन आता है कि [[विष्णु|भगवान विष्णु]] इस दिन से चार मासपर्यन्त (चातुर्मास) पाताल में [[राजा बलि]] के द्वार पर निवास करके [[कार्तिक]] [[शुक्ल]] [[एकादशी]] को लौटते हैं।<ref>{{Cite web|url=https://news.jagatgururampalji.org/devshayani-ekadashi-in-hindi/|title=Devshayani Ekadashi 2021: देवशयनी एकादशी {{!}} विष्णु जी की वास्तविक साधना|date=2021-07-20|website=S A NEWS|language=en-US|access-date=2021-07-21}}</ref> इसी प्रयोजन से इस दिन को 'देवशयनी' तथा कार्तिकशुक्ल एकादशी को [[कार्तिक शुक्ल एकादशी|प्रबोधिनी एकादशी]] कहते हैं। इस काल में [[यज्ञोपवीत|यज्ञोपवीत संस्कार]], [[विवाह]], दीक्षाग्रहण, [[यज्ञ]], [[गृहप्रवेश]], गोदान, प्रतिष्ठा एवं जितने भी शुभ कर्म है, वे सभी त्याज्य होते हैं। [[भविष्य पुराण]], [[पद्म पुराण]] तथा [[भागवत पुराण|श्रीमद्भागवत पुराण]] के अनुसार हरिशयन को योगनिद्रा कहा गया है। संस्कृत में धार्मिक साहित्यानुसार हरि शब्द [[सूर्य]], [[चन्द्रमा]], [[वायु]], [[विष्णु]] आदि अनेक अर्थो में प्रयुक्त है। हरिशयन का तात्पर्य इन चार माह में बादल और वर्षा के कारण सूर्य-चन्द्रमा का तेज क्षीण हो जाना उनके शयन का ही द्योतक होता है। इस समय में पित्त स्वरूप अग्नि की गति शांत हो जाने के कारण शरीरगत शक्ति क्षीण या सो जाती है। आधुनिक युग में वैज्ञानिकों ने भी खोजा है कि कि चातुर्मास्य में (मुख्यतः वर्षा ऋतु में) विविध प्रकार के कीटाणु अर्थात सूक्ष्म रोग जंतु उत्पन्न हो जाते हैं, जल की बहुलता और सूर्य-तेज का भूमि पर अति अल्प प्राप्त होना ही इनका कारण है। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार आषाढ़ शुक्ल पक्ष में एकादशी तिथि को शंखासुर दैत्य मारा गया। अत: उसी दिन से आरम्भ करके भगवान चार मास तक क्षीर समुद्र में शयन करते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागते हैं। पुराण के अनुसार यह भी कहा गया है कि भगवान हरि ने वामन रूप में दैत्य बलि के यज्ञ में तीन पग दान के रूप में मांगे। भगवान ने पहले पग में संपूर्ण पृथ्वी, आकाश और सभी दिशाओं को ढक लिया। अगले पग में सम्पूर्ण स्वर्ग लोक ले लिया। तीसरे पग में बलि ने अपने आप को समर्पित करते हुए सिर पर पग रखने को कहा। इस प्रकार के दान से भगवान ने प्रसन्न होकर पाताल लोक का अधिपति बना दिया और कहा वर मांगो। बलि ने वर मांगते हुए कहा कि भगवान आप मेरे महल में नित्य रहें। बलि के बंधन में बंधा देख उनकी भार्या लक्ष्मी ने बलि को भाई बना लिया और भगवान से बलि को वचन से मुक्त करने का अनुरोध किया। तब इसी दिन से भगवान विष्णु जी द्वारा वर का पालन करते हुए तीनों देवता ४-४ माह [[सुतल]] में निवास करते हैं। विष्णु देवशयनी एकादशी से [[देव प्रबोधिनी एकादशी|देवउठानी एकादशी]] तक, शिवजी [[महाशिवरात्रि]] तक और ब्रह्मा जी शिवरात्रि से देवशयनी एकादशी तक निवास करते हैं।<ref>[http://www.livehindustan.com/news/tayaarinews/tayaarinews/67-67-128429.html भगवान का शयन करना] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20100718000112/http://www.livehindustan.com/news/tayaarinews/tayaarinews/67-67-128429.html |date=18 जुलाई 2010 }}। हिन्दुस्तान लाइव। १६ जुलाई २०१०</ref> === देवशयनी एकादशी का महत्व === * इस एकादशी को सौभाग्य की एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पद्म पुराण का दावा है कि इस दिन उपवास या उपवास करने से जानबूझकर या अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति मिलती है। * इस दिन पूरे मन और नियम से पूजा करने से महिलाओं की मोक्ष की प्राप्ति होती है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार देवशयनी एकादशी का व्रत करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। * शास्त्रों के अनुसार चातुर्मास में 16 संस्कारों का आदेश नहीं है। इस अवधि में पूजा, अनुष्ठान, घर या कार्यालय की मरम्मत, गृह प्रवेश, ऑटोमोबाइल खरीद और आभूषण की खरीद की जा सकती है।
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