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== अब्राहमिक धर्म == === यहूदी धर्म === {{Original research|section|date=सितम्बर 2007}} ==== विधि ==== यहूदी धर्म को स्वीकार करने वाले नव-धर्मांतरितों के लिये यहूदी नियम के दिशानिर्देशों को “''गियुर (giyur)'' ” कहा जाता है। संभावित धर्मांतरितों में यहूदी धर्म को अपनाने की स्वतःस्फूर्त इच्छा होनी चाहिये और इसका कोई अन्य उद्देश्य नहीं होना चाहिये। पुरूष धर्मांतरित को यहूदी नियम के अनुसार धार्मिक [[ख़तना|खतना]] करवाना पड़ता है (यदि उसका खतना पहले ही हो चुका है, तो रक्त एक प्रतीकात्मक बूंद बहाने के लिये एक सुई का प्रयोग किया जाता है और इस दौरान उपयुक्त आशीर्वचन कहे जाते हैं), तथा 613 मित्ज़्वोट व यहूदी नियम के पालन की शपथ लेनी होती है। धर्मांतरित व्यक्ति को अनिवार्य रूप से यहूदी समुदाय में शामिल होना पड़ता है और धर्मांतरण के पूर्व के अपने धर्मशास्र को अस्वीकार करना होता है। जल के एक छोटे तालाब, जिसे ''मिकवाह'' कहते हैं, में एक धार्मिक निमज्जन आवश्यक होता है। ==== इतिहास ==== हेलेनिस्टिक व रोमन काल में, कुछ फैरिसी लोग उत्सुक नवदीक्षित थे और पूरे साम्राज्य में उन्हें कुछ हद तक सफलता मिली। कुछ यहूदी लोग भूमध्यसागरीय विश्व के बाहर यहूदी धर्म में धर्मांतरित हुए लोगों के भी वंशज हैं। यह ज्ञात है कि पहले कुछ कज़ार, एडोमाइट, ईथियोपियाई और साथ ही अनेक अरब, विशिष्ट रूप से [[यमन|येमन]] में, अतीत में यहूदी धर्म में धर्मांतरित हुए थे; आज पूरी दुनिया में लोग यहूदी धर्म में धर्मांतरित होते हैं। मूल रूप से "नवदीक्षित (proselyte)" शब्द यहूदी धर्म में धर्मांतरित होने वाले ग्रीक व्यक्ति का उल्लेख करने के लिये प्रयोग किया जाता था। छठीं सदी तक भी पूर्वी रोमन साम्राज्य (अर्थात बाइज़ेन्टाइन साम्राज्य) यहूदी धर्म में धर्मांतरण के विरूद्ध आदेश जारी करता रहा था, जिससे स्पष्ट है कि यह कार्य उस समय भी हो रहा था। हालिया समय में, रिफॉर्म ज्यूडाइज़्म (Reform Judaism) आंदोलन के सदस्यों ने अंतर्धार्मिक विवाह करने वाले अपने सदस्यों के गैर-यहूदी जीवन-साथियों तथा [[यहूदी धर्म]] में रूचि रखने वाले गैर-यहूदियों को यहूदी धर्म में धर्मांतरित करने के लिये एक कार्यक्रम की शुरुआत की। उनका तर्क यह है कि [[यहूदी अग्निकांड|यहूदियों के नरसंहार]] के दौरान इतने अधिक यहूदी मारे गये कि अब नये नवागतों को ढूंढना व उनका स्वागत करना अनिवार्य हो गया है। आर्थोडॉक्स व कंज़र्वेटिव यहूदियों द्वारा इस पद्धति को अवास्तविक तथा खतरनाक कहकर अस्वीकार कर दिया गया है। उनका कहना है कि इन प्रयासों के द्वारा यहूदी धर्म अपनाने और पालन करने में सरल दिखाई देता है, जबकि वास्तविकता यह है कि यहूदी धर्म में अनेक कठिनाइयां और त्याग आवश्यक होते हैं। === ईसाईयत === ईसाईयत में होने वाला धर्मांतरण किसी पूर्व गैर-ईसाई व्यक्ति का ईसाईयत के किसी रूप में होने वाला धार्मिक परिवर्तन है। इसकी सटीक आवश्यकताएं विभिन्न चर्चों व संप्रदायों के अनुसार भिन्न-भिन्न होती हैं। मुख्यतः इसमें पाप की स्वीकारोक्ति और प्रायश्चित्त तथा ईसा मसीह (की प्रायश्चित्त के लिये हुई मृत्यु और पुनरूत्थान) में विश्वास के द्वारा एक ऐसा जीवन जीने का निर्णय शामिल होता है, जो [[ईश्वर]] को स्वीकार्य हो तथा पवित्र हो। यह सब संबंधित व्यक्ति की इच्छा से किया जाता है और एक सच्चे धर्मांतरण के लिये विशिष्ट आवश्यकता है। इस प्रकार, स्वाभाविक रूप से किसी का सच्चा धर्मांतरण बलपूर्वक नहीं किया जा सकता। जहां तक ईसाई विश्वास का प्रश्न है, बलपूर्वक किया जाने वाला धर्मांतरण एक विरोधाभास है क्योंकि सच्चा धर्मांतरण कभी भी किसी मनुष्य पर लादा नहीं जा सकता। धर्मांतरितों से लगभग सदैव ही बपतिस्मा की उम्मीद की जाती है। ==== बपतिस्मा ==== कैथलिक, आर्थोडॉक्स व अनेक प्रोटेस्टेंट संप्रदाय बच्चों में अपनी अवस्था की समझ विकसित होने से पूर्व ही नवजात बपतिस्मा किये जाने को प्रोत्साहित करते हैं। रोमन कैथलिकवाद तथा प्रोटेस्टेंटवाद के कुछ उच्च चर्च वाले रूपों में, बपतिस्मा किये जाने वाले बच्चों से यह अपेक्षित होता है कि वे पूर्व-किशोरावस्था में पुष्टिकरण की कक्षाओं में शामिल हों। पूर्वी आर्थोडॉक्सी पद्धति, बपतिस्मा के तुरंत बाद, सभी धर्मांतरितों पर पुष्टि के समतुल्य, विलेपन (chrismation) किया जाता है, जो कि वयस्कों व नवजात शिशुओं दोनों पर समान रूप से लागू होता है। बपतिस्मा की विधियों में निमज्जन, छिड़काव (फुहार) तथा बौछार (अभिसिंचन) शामिल हैं।<ref>ब्रोमिली, जेफ्री डब्ल्यू. " बपतिस्मा." अंतर्राष्ट्रीय मानक बाइबल विश्वकोश: ई. (पृष्ठ. 419). डब्ल्यूएम. बी. एर्डमैन्स प्रकाशन, 1995. ISBN 0-8028-3781-6 "बपतिस्मा का प्रयोजन."</ref> ऐसे वयस्कों या युवा लोगों, जो समझदारी की आयु तक पहुंच चुके हों और अपने व्यक्ति धार्मिक निर्णय ले पाने में सक्षम हों, के द्वारा प्राप्त किया जाने वाले बपतिस्मा का उल्लेख कंज़र्वेटिव व इवैन्जेलिकल प्रोटेस्टेंट समूहों में विश्वासकर्ता के बपतिस्मा के रूप में किया जाता है। यह व्यक्ति के ईसाई बनने के पूर्व निर्णय की एक सार्वजनिक घोषणा के रूप में होना अभीष्ट है।<ref>{{Cite web |url=http://gospelway.com/salvation/baptism_purpose.php |title=gospelway.com |access-date=25 मार्च 2011 |archive-url=https://web.archive.org/web/20110103214005/http://www.gospelway.com/salvation/baptism_purpose.php |archive-date=3 जनवरी 2011 |url-status=dead }}</ref> कुछ ईसाई समूह, जैसे कैथलिक, चर्चेस ऑफ क्राइस्ट तथा [[क्रिस्ताडेल्फियन|क्रिस्टाडेल्फियाई]], मानते हैं कि बपतिस्मा मोक्ष प्राप्ति के लिये आवश्यक है। ==== ईसा को स्वीकार करना और पाप का परित्याग करना ==== [[चित्र:RepentanceisContrition&faith.jpg|thumb|220px|ऑग्सबर्ग कन्फेशन (Augsburg Confession) प्रायश्चित्त को दो भागों में बांटता है: "पहला पश्चाताप है, अर्थात पाप के ज्ञान के माध्यम से अंतरात्मा को दण्ड देने वाले भय; दूसरा विश्वास है, जो कि धर्मोपदेश या पाप-क्षमा से उत्पन्न हुआ है और मानता है कि ईसा के लिये, पापों को क्षमा कर दिया गया है, अंतरात्मा को शांति प्रदान करता है और इसे भय से मुक्त करता है।"<ref>ऑग्सबर्ग कन्फेशन, धारा बारह: पश्चाताप के बारे में (Augsburg Confession, Article XII: Of Repentance)</ref>|कड़ी=Special:FilePath/RepentanceisContrition&faith.jpg]] धर्मांतरण से केवल धार्मिक पहचान में होने वाला एक सरल परिवर्तन ही नहीं, बल्कि मूल्यों में परिवर्तन के द्वारा स्वभाव में परिवर्तन (पुनर्जीवन) होना अपेक्षित है। ग्रीक शब्द ''मेटानोइया (metanoia)'' का अनुवाद करने पर बने लैटिन शब्द ''कॉन्वर्सियो (conversio)'', का शाब्दिक अर्थ "दूसरे मार्ग पर जाना" या "अपना मन बदलना" होता है। ईसाईयत के अनुसार, एक धर्मांतरित व्यक्ति वह है, जो अपने पाप को व्यर्थ मानकर उसका त्याग कर देता है और इसके बजाय ईसा मसीह के परम महत्व को संभालकर रखता है; धर्मांतरित व्यक्ति ईसा मसीह की त्यागमयी मृत्यु व पुनरूत्थान में ईसा के महत्व को देखता है और पाप का परित्याग करता है।<ref name="ConversionToChrist" /> ईसाई धर्मांतरित से यह विश्वास करने की उम्मीद की जाती है कि ईश्वर से उसके पृथक्करण को व्यक्तिगत नैतिक आत्म-संतुष्टि प्राप्त करने की इच्छा से किये जाने वाले अच्छे कार्यों के द्वारा नहीं जीता जा सकता; इसके बजाय, उसे ईसा के रक्त में अपने पापों के लिये क्षमा प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिये और अपनी इच्छाओं को ईसा की धार्मिकता से आच्छादित करना चाहिये। चूंकि धर्मांतरण मूल्यों में एक ऐसा परिवर्तन है, जो ईश्वर को अपनाता है और पाप को अस्वीकार करता है, अतः इसमें पवित्रता के एक ऐसे जीवन, जो कि टार्सस के पॉल द्वारा वर्णित है और जिसका उदाहरण ईसा मसीह ने प्रस्तुत किया है, के प्रति व्यक्तिगत प्रतिबद्धता शामिल होती है। कुछ प्रोटेस्टेंट परंपराओं में, इसे "ईसा को व्यक्ति के उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करना तथा उसे अपना रक्षक मानकर उसका अनुसरण करना” कहा जाता है।<ref name="BeSaved" /> एक अन्य संसकरण में, 1910 कैथलिक शब्दकोश “धर्मांतरण” को “पाप की अवस्था से पश्चाताप की अवस्था की ओर, धर्मभ्रष्टता से जीवन के एक अधिक सच्चे व गंभीर तरीके की ओर, अविश्वास से विश्वास की ओर, पाखंड से सच्चे धर्म की ओर मोड़ने या परिवर्तित करने वाले कार्य” के रूप में परिभाषित किया गया। धर्मांतरण की पूर्वी आर्थोडॉक्स समझ बपतिस्मा की रस्म में दिखाई देती है, जिसमें धर्मांतरित व्यक्ति सार्वजनिक रूप से अपने पापों का प्रायश्चित्त करते समय पश्चिम दिशा की ओर मुंह करके खड़ा होता है तथा प्रतीकात्मक रूप से शैतान पर थूकता है और इसके बाद “राजा व ईश्वर के रूप में” ईसा की आराधना करने के लिये पूर्व की ओर मुड़ता है। ==== उत्तरदायित्व ==== अधिकांश ईसाइयों का विश्वास है कि धर्मपरिवर्तन (proselytism), जिसे ईसा मसीह के वचनों व कर्मों में धर्मोपदेश को साझा करने के रूप में समझा जाता है, प्रत्येक ईसाई का उत्तरदायित्व है। [[नया नियम|नये करार (New Testament)]] के अनुसार, ईसा ने अपने शिष्यों को “सभी राष्ट्रों में जाने व शिष्य बनाने” का आदेश दिया था {{bibleref2c|Matthew|28:19}}, जिसे सामान्यतः ग्रेट कमीशन के नाम से जाना जाता है। तदनुसार, अनेक ईसाइयों द्वारा प्रचारवाद (evangelism)—"सुसमाचार का प्रचार करना"—का पालन किया जाता रहा है। कुछ प्रचारवादी प्रोटेस्टेंट मानते हैं कि ग्रेट कमीशन की पूर्ति के लिये, प्रत्येक ईसाई को अनिवार्य रूप से अपने संपर्क में आने वाले लगभग प्रत्येक व्यक्ति को धर्मांतरित करने के प्रयास के लिये तैयार रहना चाहिये.{{Citation needed|date=अक्टूबर 2010}} ईसाइयत के अन्य रूप, जैसे रोमन कैथलिकवाद तथा पूर्वी आर्थोडॉक्सी, मानते हैं कि धर्मोपदेश की व्याख्या अचूक और विश्वासपूर्ण तरीके से नहीं की जा सकती, इसके बजाय वे उदाहरण के द्वारा प्रचारवाद का समर्थन करते हैं।{{Citation needed|date=अक्टूबर 2010}} ==== पुनर्संबद्धता ==== एक ईसाई संप्रदाय से किसी अन्य में स्थानांतरण में सदस्यता का एक अपेक्षाकृत सरल स्थानांतरण शामिल हो सकता है, विशेषतः यदि एक त्रिमूर्तिवादी (Trinitarian) संप्रदाय से दूसरे में जाना हो और यदि व्यक्ति [[त्रीएक|त्रिमूर्ति]] के नाम पर जल बपतिस्मा ले चुका हो। यदि ऐसा नहीं है, तो नये चर्च के द्वारा व्यक्ति का बपतिस्मा या पुनर्बपतिस्मा करने की आवश्यकता हो सकती है। कुछ संप्रदायों, जैसे एनाबैप्टिस्ट परंपरा को मानने वालों, में पहले बपतिस्मा ले चुके ईसाइयों का पुनर्बपतिस्मा आवश्यक होता है। पूर्वी आर्थोडॉक्स चर्च ईसाइयत के किसी अन्य संप्रदाय से आर्थोडॉक्सी (जिसे एक सच्चा चर्च माना जाता है) में होने वाले स्थानांतरण को धर्मांतरण व प्रायश्चित्त की ही एक श्रेणी मानता है, हालांकि सदैव ही पुनर्बपतिस्मा की आवश्यकता नहीं होती। ईसाइयत में धर्मांतरण की प्रक्रिया में ईसाई संप्रदायों के बीच कुछ अंतर होते हैं। अधिकांश प्रोटेस्टेंट मोक्ष प्राप्ति के लिये ''विश्वास'' के द्वारा धर्मांतरण को मानते हैं। इस समझ के अनुसार, व्यक्ति अपने रक्षक के रूप में [[ईसा मसीह]] के प्रति विश्वास की घोषणा करता है। हालांकि कोई व्यक्ति यह निर्णय निजी तौर पर ले सकता है, लेकिन सामान्यतः इसके लिये बपतिस्मा किया जाना और किसी संप्रदाय या चर्च का सदस्य बनना आवश्यक होता है। इन परंपराओं में, ईसाईयत के इन बुनियादी सिद्धांतों, कि ईसा मसीह की मृत्यु हुई थी, उन्हें दफनाया गया था और पाप को क्षमा करने के लिये वे पुनर्जीवित हुए थे, को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने पर व्यक्ति को [[ईसाई]] माना जाता है।{{Citation needed|date=अक्टूबर 2010}} ==== प्रोटेस्टेंट विश्वासों के बीच तुलना ==== यह सारिणी तीन भिन्न प्रोटेस्टेंट विश्वासों के पारंपरिक दृष्टिकोण का सारांश प्रस्तुत करती है। {| style="width:75%; margin:auto; border:1px solid #333;" border="2" cellpadding="5" cellspacing="1" style="margin-bottom:1em;text-align:center;border:1px solid #333;font-family:Arial;margin:0 10px;float:right" |- style="background:#cedff2" | '''विषय''' | '''लूथरनवाद (Lutheranism)''' | '''कैल्विनवाद (Calvinism)''' | '''आर्मिनियनवाद (Arminianism)''' |- | '''धर्मांतरण''' | कृपा के माध्यम से, निरोधनीय | किसी माध्यम के बिना, अनिरोधनीय | इसमें स्वेच्छा शामिल होती है और यह निरोधनीय होता है |} === इस्लाम === एक नव-धर्मांतरित [[मुसलमान|मुस्लिम]] को ''मुल्लाफ़'' कहा जाता है। [[इस्लाम]] के पांच स्तंभ, या आधार हैं, लेकिन इनमें से प्रमुख और सर्वाधिक महत्वपूर्ण यह विश्वास करना है कि ईश्वर व सृष्टिकर्ता केवल एक ही है, जिसे [[अल्लाह]] (ईश्वर के लिये [[अरबी]] शब्द) कहते हैं और यह कि इस्लामी पैगंबर, [[मुहम्मद]], उनके अंतिम और आखिरी संदेश-वाहक हैं। किसी व्यक्ति को उसी क्षण से इस्लाम में धर्मांतरित मान लिया जाता है, जब वह निष्ठापूर्वक ''विश्वास की घोषणा'' करता है, जिसे शाहदा कहते हैं। इस्लाम की शिक्षा के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति जन्म से मुस्लिम ही होता है क्योंकि जन्म लेने वाले प्रत्येक शिशु का स्वाभाविक झुकाव अच्छाई की ओर व केवल एक सच्चे ईश्वर की आराधना की ओर होता है, लेकिन उसके अभिभावक व समाज उसे इस सीधे मार्ग से भटका सकते हैं। जब कोई व्यक्ति इस्लाम को स्वीकार करता है, तो ऐसा माना जाता है कि वह अपनी मूल स्थिति में लौट आया है। हालांकि इस्लाम ''की ओर'' धर्मांतरण इसके सर्वाधिक समर्थित तत्वों में से एक है, लेकिन इस्लाम ''से'' किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण को स्वधर्म-त्याग का पाप माना जाता है और कुछ व्याख्याओं के अनुसार और कुछ न्यायिक क्षेत्राधिकारों के अंतर्गत इसके लिये मृत्यु-दंड का प्रावधान है। इस्लाम में, खतना एक ''सुन्नाह'' रिवाज है, जिसका कुरान में ज़िक्र नहीं किया गया है। मुख्य विचार यह है कि इसका पालन करना अनिवार्य नहीं है और यह इस्लाम में प्रवेश करने की शर्त नहीं है। शफी` (Shafi`i) तथा हनबली (Hanbali) संप्रदायों में इसे अनिवार्य माना जाता है, जबकि मालिकी (Maliki) और [[हनाफी]] (Hanafi) संप्रदायों का मानना है कि यह केवल अनुशंसित है। हालांकि, यह किसी व्यक्ति द्वारा इस्लामिक पद्धतियों को अपनाये जाने के लिये पूर्व-शर्त नहीं है और न ही किसी व्यक्ति द्वारा खतना करने से इंकार किया जाना कोई पाप है। यह इस्लाम के पांच स्तंभों या विश्वास के छः आधारों में से एक नहीं है। === बहाई धर्म === [[बहाई धर्म]] सक्रियता से धर्मांतरितों की खोज में रहता है। धर्म-परिवर्तन और मिशनरी कार्य जोरों पर किये जाते हैं, लेकिन इन्हें क्रमशः “शिक्षा देना” और “मार्गदर्शन करना” कहा जाता है। अपने धर्म को दूसरों के साथ साझा करते समय बहाई लोग “एक श्रवण प्राप्त करने” के प्रति सतर्क होते हैं–जिसका अर्थ यह सुनिश्चित करना होता है कि वे जिस व्यक्ति को शिक्षा देने का प्रस्ताव दे रहे हैं, वह उनकी बात सुनने को तैयार है। उनके द्वारा अपनाये गये समुदायों में, लोगों के सांस्कृतिक आधार का स्थान लेने का प्रयास करने के बजाय "बहाई मार्गदर्शकों" को समाज में शामिल होने और अपने पड़ोसियों के साथ रहने और कार्य करने के दौरान बहाई सिद्धांतों को लागू करने और बाँटने के लिये प्रोत्साहित किया जाता है। बहाई लोग सभी धर्मों की दिव्य उत्पत्ति को मान्यता देते हैं और यह मानते हैं कि ये धर्म क्रमिक रूप से एक दिव्य योजना के एक भाग के रूप में उत्पन्न हुए (प्रगतिशील प्रकटीकरण), तथा प्रत्येक नया प्रकटीकरण अपने पूर्ववर्तियों का स्थान लेता है और उन्हें पूर्ण करता है। बहाई लोग अपने स्वयं के धर्म को नवीनतम (परंतु अंतिम नहीं) मानते हैं और उनका विश्वास है कि इसकी शिक्षाएं – जो कि मानवता की एकात्मता के सिद्धांत के आस-पास केंद्रित है – वैश्विक समुदाय की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये सर्वाधिक उपयुक्त हैं। अधिकांश देशों में, धर्मांतरंण के लिये केवल विश्वास की घोषणा करने वाले एक कार्ड को भरना होता है। इसमें [[बहाउल्लाह]] – इस धर्म के संस्थापक – को वर्तमान समय के लिये ईश्वर के दूत मानने, उनकी शिक्षाओं के प्रति जागरूक होने व उन्हें स्वीकार करने, तथा उनके द्वारा स्थापित संस्थाओं व नियमों के प्रति आज्ञाकारी बनने की घोषणा शामिल होती है। बहाई धर्म में धर्मांतरण के साथ ही सभी ज्ञात धर्मों की आम बुनियाद में स्पष्ट विश्वास, मानवता की एकता और वृहत् स्तर पर समुदाय की सक्रिय सेवा, विशेषतः उन क्षेत्रों में, जिनसे एकता व मैत्री को बढ़ावा मिले, के प्रति एक प्रतिबद्धता शामिल होती है। चूंकि बहाई धर्म में कोई पुरोहित नहीं होते, अतः इस धर्म में आने वाले धर्मांतरितों को सामुदायिक जीवन के सभी पहलुओं में सक्रिय होने के लिये प्रोत्साहित किया जाता है। यहां तक कि हाल ही में धर्मांतरित हुए किसी व्यक्ति को भी स्थानीय आध्यात्मिक सभा (Local Spiritual Assembly) – सामुदयिक स्तर पर मार्गदर्शक बहाई संस्था – में कार्य करने के लिये चुना जा सकता है।<ref>{{cite book |last = Smith |first = P. |year = 1999 |title = A Concise Encyclopedia of the Bahá'í Faith |publisher = Oneworld Publications |location = Oxford, UK |isbn = 1851681841 }}</ref><ref>{{cite book |last = Momen |first = M. |year = 1997 |title = A Short Introduction to the Bahá'í Faith |publisher = One World Publications |location = Oxford, UK |isbn = 1851682090 |url = https://archive.org/details/bahaifaith00mooj |url-access = registration }}</ref>
सारांश:
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