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== परिचय == पगोडे प्राय: सूचीस्तंभीय (पिरैमिड आकार के), गुंबदीय, अथवा बुर्ज की आकृति के होते हैं। 13 मंजिलों और 200 फुट ऊँचाई तक के पगोडे बने हैं। भारत तथा पूर्वी एशिया के पगोडों के शिखर पर एक मस्तूल पर बहुत सी राजकीय छतरियाँ लगी हुई होती हैं। भारत में पगोडे प्राय: मंदिरों के द्वार पर अथवा मुख्य मूर्तिस्थल के ऊपर बनाए जाते हैं। चीन तथा जापान के पगोडों में स्तंभ वर्गीय, बहुभुजीय, अथवा वृत्तीय आकृति का होता है। उसमें अनेक, बहुधा पाँच, मंजिलें होती हैं। प्रत्येक मंजिलें पर बाहर को निकलती हुई छतें होती हैं जिनमें काँसे की घंटियाँ लटकी होती हैं। संपूर्ण ऊँचाई लगभग 150 फुट होती है और भवन पत्थर, ईंट, अथवा लकड़ी का बना होता है। नीचे की मंजिल में मूर्तियों अथवा मंदिरों की स्थापना की हुई होती है। स्याम देश में पगोडा को "फ्रा" कहते हैं और यह या तो बेलनाकार बुर्जयुक्त सूचीस्तंभ होता है या पतले कुंतल शिखर युक्त एवं घंटाकार होता है। [[चीन|चीनी]] पगोडे प्राय: स्मारक होते हैं। ये ईंट, काचवत् चमकाए हुए खर्पर अथवा चीनी मिट्टी के बने और हाथीदाँत, हड्डी तथा पत्थर के काम से सजे होते हैं। इनकी आकृति प्राय: अष्टभुजी होती है और ये कई मंजिलों में धीरे धीरे ऊपर की ओर पतले होते चले जाते हैं। प्रत्येक मंजिल की छत किनारे पर ऊपर को मुड़ी हुई होती है और वहाँ से घंटियाँ लटका करती हैं। प्रत्येक छत के कोनों में सजावटी काम भी हुआ रहता है। चीन में तीन से लेकर तेरह मंजिल तक के पगोडे हैं, परंतु प्राय: मंजिलें नौ होती हैं। किसी किसी चीनी पगोडे में प्रत्येक मंजिल को एक सीढ़ी जाती है। जापानी पगोडे प्राय: लकड़ी के बने होते हैं। पगोडों के निर्माण में धातु का उपयोग कदाचित् कहीं नहीं होता। [[भारत]] का प्रतिद्धतम पगोडा [[तंजौर]] में है। यह बहुत सुंदर और भारी है। इसका ऊपरी भाग लंबाकार 100 फुट का है और उसपर मूर्तिकला तक्षण का बहुत बारीक काम किया हुआ है। उड़ीसा प्रदेश में कोणार्क में नवीं शती ईसवी में बना एक काला पगोडा है। यह सूर्यमंदिर है और हिंदू मंदिरों की भाँति बना है। इसकी केवल तीन मंजिलें शेष हैं। [[बर्मा]] में लगभग प्रत्येक गाँव में, जंगल में, मार्गों पर और प्रत्येक मुख्य पहाड़ी में पगोडे मिलेंगें। इनमें से अधिकांश धार्मिक दानशील व्यक्तियों द्वारा बनवाए गए हैं। वहाँ विश्वास प्रचलित है कि इनके निर्माण से पुण्य की प्राप्ति होती है। बर्मा के पगोडे प्राय: बहुभुज की बजाय गोलाकृति के होते हैं। उन्हें डगोवा अथवा चैत्य कहा जाता है। वहाँ का प्राचीनतम चैत्य पगान में वुपया में है। यह तीसरी शती ईसवी में बना हुआ बताया जाता है। दसवीं शती में बना म्यिंगान प्रदेश का नगकडे नदाउंग पगोडा, सातवीं अथवा आठवीं शती में बना प्रोम का बाउबाउग्यी पगोडा, 1059 ई. में बना पगान का लोकानंद पगोडा, तथा 15वीं शती में बना सगैंग का तुपयोन पगोडा भी विख्यात हैं। परंतु सबसे अधिक महत्वपूर्ण पेगू के श्वेहमाउडू पगोडा और रंगून के श्वेडगोन पगोडा को माना जाता है। श्वेडगोन पगोडा पवित्रतम समझा जाता है और सबसे अधिक प्रभावोत्पादक है। कहा जाता है, यह पहले केवल 27 फुट ऊँचा बनाया गया था और फिर 15वीं शती में इसे 323 फुट ऊँचा बना दिया गया। इसमें भगवान तथागत के आठ बाल ओर तीन अन्य बुद्धों के पवित्र अवशेष स्थापित बताए जाते हैं। इस पूरे पगोडे पर स्वर्णपत्र मढ़ा हुआ है। इसीलिये इसे स्वर्णिम पगोडा भी कहा जाता है। रंगून में लगभग दो हजार वर्ष पुराना सूले पगोडा और प्राचीन परंतु अब पुनर्निर्मित वोटाटांग पगोडा भी महत्वपूर्ण हैं। चीन में पगोडे भारत से गए और चीन भर में बहुत बड़ी संख्या में बने। वहाँ का सबसे अधिक आश्चर्यजनक पगोडा नैकिंग का चीनी मिट्टी का अष्टभुज स्तंभ था जो 1412 ईसवी में बना था और जो 1856 में ताइपिंगों द्वारा नष्ट कर दिया गया था। यह 200 फुट ऊँचा था। इसका व्यास 40 फुट था। इसकी दीवारों पर बाहर की ओर बढ़िया नीली चीनी मिट्टी के पत्थर लगे हुए थे। विविध मंजिलों में कुल लगभग 150 घंटियाँ लटकी हुई थीं। चीन में विश्वास प्रचलित था कि पगोडे जल और वायु, उपज और मनुष्यों के स्वास्थ्य एवं व्यवहार सब पर लाभदायक प्रभाव डालते हैं। कहा जाता है कि ताइपिंगों ने इनके लाभकारी प्रभाव को मिटाकर अपनी योजनाओं को सफल बनाने के लिये चीन के अधिकांश पगोडों को यांग सी नदी के मैदानों में गिरा दिया था। चीन के पगोंडो में पीकिंग का तेरह मंजिला तंगचाउ पगोडा, वहीं का नौमंजिला तांगचाउ पगोडा, कैंटन का फुलहरा पगोडा और शांघाई तथा निंगपो के कुछ पगोडे भी विख्यात हैं। [[जापान]] में पगोडे बौद्ध धर्म के साथ चीन से आए। अधिकांश वर्तमान जापानी पगोडे 17वीं शताब्दी के बने हुए हैं और मंदिरों में हैं। वहाँ का प्रसिद्धतम पगोडा होरियूजी मंदिर में है। यह ईसवी सन् 607 में कोरियो द्वारा बनवाया गया था। यह 100 फुट ऊँचा है। इसमें पाँच मंजिलें हैं। परंतु जापान में 13 मंजिलों तक के पगोडे हैं। निक्की नगर में तोशोगू मंदिर का पगोडा, 647 ई. में बना होकीजी पगोडा, 680 ई. में बना तिमंजिला यकुशीजी पगोडा और अष्टभुज चौमंजिला बेत्शो पगोडा भी विख्यात हैं। [[लंदन]] में भी वहाँ के क्यू उद्यान में एक विख्यात पगोडा है। इसका निर्माण चीनी नमूने पर हुआ है। इसे 1761 ई. में वास्तुविद् सर विलियम चेंबर्स द्वारा बनाए गए अभिकल्प के अनुसार तैयार किया गया था। [[चित्र:Nepal Patan Mangal.jpg|550px|center|thumb|[[नेपाल]] के [[पाटन]] स्थित मन्दिरों का विहंगम दृष्य]]
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