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== मध्यकालीन दर्शन == प्राचीन दर्शन में मनुष्य की बुद्धि को प्रत्येक विषय पर सोचने का अधिकार था। मध्यकाल में [[ईसाई धर्म|ईसाइयत]] की ओर से इस अधिकार को ललकारा गया। मध्यकालीन दर्शन का मुख्य काम विश्वास (faith) और बुद्धि (reason) के दावों की जाँच करना था। विश्वास का दावा था कि सत्य का महत्वपूर्ण भाग दैवी आविष्कार है, वह बुद्धि की समझ में आए या न आए इसे तो मानना ही होगा। आरंभ में ईसाई विचारकों ने विश्वास और बुद्धि की धारणाओं को अभिन्न स्वीकार किया। इसके बाद दर्शन को धर्म की अपेक्षा गौण पद दिया और बुद्धि को विश्वास की दासी बनाया; अन्त में बुद्धि ने अपने अधिकार पर बल दिया और विश्वास तथा बुद्धि के क्षेत्र पृथक् हो गए। [[विलियम ड्युरंड्स]] ने कहा कि सत्य दो प्रकार का होता है- एक ही सिद्धांत एक दृष्टि से सत्य और दूसरी दृष्टि से असत्य हो सकता है। मध्यकाल का दर्शन प्रमुख रूप में [[विद्वन्मण्डल]] (scholasticism) का दर्शन है। आठवीं शती में इसका आरम्भ हुआ; 11वीं और 12वीं शतियों में इसका विकास हुआ; 13वीं शती इसका यौवन काल था, 14वीं और 15वीं शतियों में आंतरिक विरोधों तथा कुछ बाहरी कारणों ने इसे समाप्त कर दिया। जो विचारविषय तीव्र मतभेद का कारण बन गए उनमें दार्शनिक दृष्टिकोण के [[यथार्थवाद]] और [[नामवाद]] का संघर्ष प्रमुख था। वैयक्तिक स्थिति में हम अनेक मनुष्यों को देखते हैं, इसके अतिरिक्त मनुष्य का प्रत्यय भी हमारा एक विचार है। इस प्रत्यय की स्थिति सत्ता में क्या है? यथार्थवाद के अनुसार यह प्रत्यय विशेष मनुष्यों से अलग अस्तित्व रखता है; विशेष मनुष्य तो इसकी अपूर्ण नकलें या इसके उदाहरण मात्र हैं। नामवाद के अनुसार वास्तविक सत्ता विशेष मनुष्यों की है, "मनुष्य" केवल एक नाम है, जो कुछ समानताओं के आधार पर हम कुछ व्यक्तियों में से हर एक को दे देते हैं। वास्तव में यह यथार्थवाद और आभासवाद का झगड़ा था। इसी से मिलता हुआ विवेकवाद और अनुभववाद का मतभेद था। जो लोग सामान्य को मानते ही न थे, उनके लिए सारा ज्ञान इंद्रियदत्त ज्ञान था। इस दार्शनिक मतभेद ने धर्म में कई सिद्धांतों का भेद खड़ा कर दिया। विवाद के प्रमुख विषय ये थे- *(१) '''[[त्रिमूर्ति]] का सिद्धान्त''' - परमात्मा एक है और इसके साथ ही वह "पिता", "पुत्र" तथा "पवित्र आत्मा", तीन स्वाधीन सत्ताओं का संयोग भी है (देखिए, "[[त्रित्व]]")। [[अवेलार्ड]] (1039-1122) ने "त्रिमूर्ति" पर निबंध लिखा। एक परिषद् ने उसे सुने बिना उसे अपराधी ठहराया और आदेश दिया कि वह अपने हाथों से [[निबन्ध]] को जलाए। *(२) '''[[पाप]] का प्रायश्चित्त''' - सारे मनुष्य जन्म से पायी है। न्याय की माँग यह है कि पापी को पाप का [[दण्ड]] मिले। कोई मनुष्य पर्याप्त दंड को सह नहीं सकता है। क्या एक मनुष्य के पाप का दंड दूसरे को देना न्याय के अनुकूल है? क्या श्री यीशु की मृत्यु सभी मनुष्यों के पाप का पर्याप्त प्रायश्चित्त है? *(३) मोक्ष मनुष्य के कर्मों का फल है या परमात्मा के अनुग्रह से मिलता है? वह अनुग्रह किसी नियम पर आधारित होता है या परमात्मा की अविहित इच्छा पर? *(४) मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है, या सब कुछ पहले से ही भाग्य के रूप में निर्णीत है? *(५) मौलिक पाप निरपेक्ष रूप में तथ्य है, या श्री यीशु की माता इससे विमुक्त थीं? === विद्वन्मण्डल के प्रमुख विचारक === '''[[एन्सैल्म]]''' (Anselm 1033-1109) विद्वत् सिद्धान्त का स्थापक समझा जाता है। दर्शन के इतिहास में उस युक्ति का विशेष स्थान है, जो एन्सैल्म ने ईश्वर के अस्तित्व के पक्ष में दी। [[इमानुएल काण्ट|कांट]] ने इस युक्ति को माना नहीं, परंतु कहा कि जो अन्य युक्तियाँ दी जाती हैं, वे एन्सैल्म की युक्ति की रूपांतर ही हैं। मध्यकाल के दर्शन में [[थामस एक्विनास|टामस एक्विनस]] और [[डंस स्कोट्स]] के नाम विशेष महत्व के हैं। [[यथार्थवाद]] और [[नामवाद]] के तीव्र विवाद में वे दोनों पक्षों के प्रमुख प्रवक्ता थे। टामस एक्विनस की धारणा थी कि ज्ञान के कुछ क्षेत्र विश्वास के ही विषय हैं; इसपर भी इंद्रियदत्त ज्ञान उन मूल नियमों की सहायता से, जो प्रत्येक की सक्रिय बुद्धि में विद्यमान हैं, विश्व और परमात्मा के स्वरूप के विषय में कुछ बता सकता है। डंस स्कोटस का विचार था कि सारा ज्ञान विशेषों तक सीमित है; सामान्य प्रत्ययों का अस्तित्व नाम मात्र है। डंस स्कोट्स के योग्य शिष्य [[ओखम]] ने नामवाद के प्रसार में सफल यत्न किया। विद्वद्वाद तर्क में इतना उलझ गया कि धर्म से इसका सम्बन्ध टूट सा गया। धार्मिक वृत्ति के लोगों को "संशोधन" ने अपनी ओर खींच लिया। धर्म (रेलिजन) और दर्शन के पार्थक्य ने आधुनिक दर्शन के लिए मार्ग खोल दिया।
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