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==जन्म एवं जीवन-कथाएँ== इनके माता-पिता के नाम के बारे में भिन्न-भिन्न स्रोतों से भिन्न-भिन्न जानकारी प्राप्त है। कुछ स्रोतों के अनुसार [[दधीचि]] ऋषि को प्रातिथेयी (वडवा अथवा गभस्तिनी) नामक पत्नी से यह उत्पन्न हुए। किन्तु कई ग्रथों में इसके माता का नाम सुवर्चा अथवा सुभद्रा दिया गया है। इनमें से सुभद्रा, दधीचि ऋषि की दासी थी। [[स्कन्दपुराण]] तथा अन्य कई ग्रंथों में, इन्हें [[याज्ञवल्क्य]] एवं उसकी बहन का पुत्र कहा गया है। फिर भी यह दधीचि ऋषि के पुत्र के रुप यें विख्यात है। दधीचि की मृत्यु के समय, उसकी पत्नी प्रातिथेयी गर्भवती थी । अपने पति की मृत्यु का समाचार सुनकर उसने उदरविदारण कर अपना गर्भ बाहर निकाला तथा उसे पीपल वृक्ष के नीचे रखकर, दधीचि के शव के साथ सती हो गयी । उस गर्भ का रक्षा पीपल वृक्ष ने की । इस कारण इस बालक को पिप्पलाद नाम प्राप्त हुआ । पशु-पक्षियों ने इसकी रक्षा की, तथा सोम ने इसे सारी विद्याओं में पारंगत कराया। बाल्यकाल में मिले हुए कष्टों का कारण, [[शनि]] को मानकर, इन्होंने उसे नीचे गिराया । त्रस्त होकर शनि इनकी शरण में आए। इन्होंने शनिग्रह को इस शर्त पर छोड़ा कि वह बारह वर्ष से कम आयु वाले बालकों को कष्ट ने दे। कई ग्रन्थों में बारह वर्ष के स्थान पर सोलह वर्ष का निर्देश भी प्राप्त है । इसीलिये आज भी शनि की पीडा से छुटकारा पाने के लिए पिप्पलाद, गाधि एवं कौशिक ऋषियों का स्मरण किया जाता है [शिव. शत. २४-२५] । एक बार अपने पिता पर क्रोधित होकर इन्होंने एक [[कृत्या]] निर्माण कर, उसे याज्ञवल्क्य पर छोड़ा । याज्ञवल्क्य [[शिव]] की शरण में गये जिन्होने इस कृत्या का नाश किया तथा याज्ञवल्क्य एवं पिप्पलाद में मित्रता स्थापित करायी [स्कंद. ५.३.४२] । यही कथा [[ब्रह्मपुराण]] में कुछ अलग ढंग से दी गयी है। अपनी माता-पिता की मृत्यु का कारण देवताओं को मानकर, उनसे बदला लेने के लिए इन्होंने [[शिव]] की आराधना की, तथा एक कृत्या का निर्माण करके इसे देवों पर छोड़ा। यह देखकर शंकर ने मध्यस्थ होकर देवों तथा इसके वीच मित्रता स्थापित करायी । बाद में, अपनी माता-पिता को देखने की इच्छा उत्पन्न होने के कारण, देवों ने स्वर्ग में इन्हें दधीचि के पास पहुँचाया। दधीचि इन्हें देखकर प्रसन्न हुए तथा इससे विवाह करने के लिए आग्रह किया । स्वर्ग से वापस आकर इसने [[गौतम]] की कन्या से विवाह किया [ब्रह्म.११०.२२५] । एकबार, जब यह पुष्पभद्रा नदी में स्नान करने जा रहे थे तब वहाँ अनरण्य राजा की कन्या पद्मा को देखकर इन्होंने उसकी मांग की । शापभय से अनरण्य राजा ने अपनी कन्या इसे प्रदान की। पद्मा से इनके दस पुत्र हुये [शिव.शत. २४-२५] । एकबार जब यह अपनी तपस्या में निमग्न थे तब वहाँ [[कोलासुर]] आकर इनका ध्यानभंग करने के हेतु इन्हें पीड़ित करने लगा । तत्काल, इनके पुत्र कहोड ने एक कृत्या का निर्माण करके उससे कोलासुर का वध कराया । इसी से इस स्थान को ‘पिप्पलादतीर्थ’ नाम प्राप्त हुआ [पद्म. उ.१५५, १५७] । ] ।
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