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==प्रकृतिवाद के रूप== 'प्रकृति' के अर्थ के सम्बन्ध में दार्शनिकों में मतभेद रहा है। एडम्स का कहना है कि यह शब्द अत्यन्त जटिल है जिसकी अस्पष्टता के कारण अनेक भूलें होती हैं। प्रकृति को ३ प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है- *(१) [[पदार्थ विज्ञान]] का प्रकृतिवाद *(२) यन्त्रवादी प्रकृतिवाद *(३) जीववैज्ञानिक क्रमविकासवादी प्रकृतिवाद ===पदार्थ विज्ञान का प्रकृतिवाद=== यह विचारधारा [[पदार्थ विज्ञान]] पर आधारित है। इसके अनुसार समस्त प्रकृति में अणु विद्यमान है। जगत की रचना इन्हीं अणुतत्वों से हुई है। जीव और मन सभी का निर्माण भौतिक तत्वों के संयोग से हुआ है। पदार्थ विज्ञान केवल बाह्य प्रकृति के नियमों का अध्ययन करता है और इन्हीं नियमों के आधार पर अनुभव के प्रत्येक तथ्यों की व्याख्या करता है। अतः प्रकृति के नियम सर्वोपरि हैं। यह मनुष्य को भी पदार्थ विज्ञान के नियमों के अनुसार समझने का प्रयास करता है। इसका मनुष्य की आन्तरिक प्रकृति से कोई प्रयोजन नहीं है किन्तु शिक्षा एक मानवीय प्रक्रिया है जिसका संबंध मानव की आन्तरिक प्रकृति से है। अतः शिक्षा के क्षेत्र में पदार्थ विज्ञान के प्रकृतिवाद का कोई विशेष योगदान नहीं है। ===यन्त्रवादी प्रकृतिवाद=== इस सम्प्रदाय के अनुसार सृष्टि यन्त्रवत है जो पदार्थ और गति से निर्मित है। इस प्राणहीन यन्त्र में कोई ध्येय, प्रयोजन या आध्यात्मिक शक्ति नहीं है। मानव यद्यपि इस जगत का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है तथापि उसमें स्वचेतना नहीं होता, उसका व्यवहार वाह्य प्रभावोें के कारण नियंत्रित होता है। ज्यों-ज्यों मानव वाह्य वातावरण के सम्पर्क में आता है, मानव यन्त्र सुचारू रूप से क्रिया करता रहता है। मनुष्य की प्रयोजनशीलता, क्रियात्मकता उसके आत्मिक गुणों की विवेचना इस विचारधारा में संभव नहीं है। पशु की स्थिति, यन्त्र की स्थिति तथा मनुष्य की स्थिति तीनों में अन्तर है। अतः मनुष्य की शिक्षा भिन्न प्रकार से होनी चाहिए। इसलिए शिक्षा के क्षेत्र में यन्त्रवादी प्रकृतिवाद का कोई विशेष योगदान नहीं है। ===जीव विज्ञान का प्रकृतिवाद=== यह विचारधारा ‘विकास के सिद्धान्त’ में विश्वास रखती है। इसलिए इस विचारधारा का उदगम [[चार्ल्स डार्विन|डार्विन]] के [[क्रम-विकास|क्रमविकास]] सिद्धान्त से हुआ है। इस मत के अनुसार जीवों के क्रम विकास में मनुष्य सबसे अन्तिम अवस्था में है। मस्तिष्क विकास के कारण ही मनुष्य ने भाषा का विकास किया जिसके फलस्वरूप वह ज्ञान को संचित रख सकता है। नये विचार उत्पन्न कर सकता है तथा सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन का विकास कर पाया है। अन्य सभी दृष्टियों से मनुष्य अन्य प्राणियों से भिन्न नहीं है। उसकी नियति तथा विकास की संभावनायें वंशक्रम तथा परिवेश पर निर्भर करती हैं। उसमें किसी प्रकार की इच्छा शक्ति जैसी कोई चीज नहीं होती। वास्तव में इस प्रकृतिवाद से मनुष्य की पूर्व स्थिति का ज्ञान किया जा सकता है। किन्तु उसके भविष्य के आदर्शों की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। यह कमी होते हुए भी इस प्रकृतिवाद का शिक्षा में योगदान माना जा सकता है।
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