सामग्री पर जाएँ
मुख्य मेन्यू
मुख्य मेन्यू
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
मार्गदर्शन
मुखपृष्ठ
हाल में हुए बदलाव
बेतरतीब पृष्ठ
मीडियाविकि के बारे में सहायता
भारतपीडिया
खोजें
खोजें
दिखावट
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
व्यक्तिगत उपकरण
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
लॉग-आउट किए गए संपादकों के लिए पृष्ठ
अधिक जानें
योगदान
वार्ता
"
प्रतिमा
" (अनुभाग) सम्पादित करें
पृष्ठ
चर्चा
हिन्दी
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
उपकरण
उपकरण
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
क्रियाएँ
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
सामान्य
कड़ियाँ
पृष्ठ से जुड़े बदलाव
विशेष पृष्ठ
पृष्ठ की जानकारी
दिखावट
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
चेतावनी:
आपने लॉग-इन नहीं किया हुआ है। अगर आप सम्पादन करते हैं तो इस पृष्ठ के सम्पादन इतिहास में आपका IP पता दृश्य होगा। अगर आप
लॉग-इन
करते हैं या
खाता बनाते हैं
तो दूसरी सुविधाओं के साथ-साथ आपके सम्पादनों का श्रेय आपके सदस्यनाम पर दिया जाएगा।
ऐन्टी-स्पैम जाँच। इसे
नहीं
भरें!
== आविर्भाव == इस परिभाषा से प्रतिमापूजा पर अनायास ध्यान जाता है। पहले लोग प्रकृतिपूजक थे१ उसमें वृक्षपूजा, पर्वतपूजा, नदीपूजा, आदि आती हैं। हमारे देश में पूजापरंपरा में दो महान प्रसार हुए : एक वैदिक दृष्टि तथा दूसरा पौराणिक पूर्त। इसी को इष्ट पूर्त कहते हैं जिसके द्वारा भारतीय जनता का योगक्षेम वहन होता आया है। प्राचीन वैदिक कर्मकांड : यज्ञवेदी, यजमान, पुरोहित, बलि, हव्य, हवन एवं देवता तथा त्याग आदि के बृहत् उपबृंहण के अनुरूप ही देवार्चा में अर्चा, अर्च्य एवं अर्चक के नाना संभार, प्रकार एवं कोटियाँ पल्लवित हुईं। अर्चा के सामान्य षोडशोपचार एवं विशिष्ट चतुष्षष्ठि उपचार, आर्च्य देवों के विभिन्न वर्ग-महादेव, विष्णु, देवी, सूर्य, नवग्रह आदि-तथा अर्चकों की विभिन्न श्रेणियाँ इन सभी की समीक्षा हमारे प्रतिमाविज्ञान की पूर्वपीठिका की दशाध्यायी में द्रष्टव्य है। किसी भी वस्तु, व्यक्ति, पशु, या पक्षी की प्रतिमा प्रतिमा कही जा सकती है परंतु भारत में प्रतिमाविज्ञान एवं प्रतिमा कला या मूर्तिकला का जन्म तथा विकास एवं प्रोल्लास देवार्चा से पनपा। सभी ध्यानी, योगी, ज्ञानी नहीं हो सकते थे, अत: 'भावना' के लिये प्रतिमा की कल्पना हुई। कालांतर पाकर पौराणिक पूर्तधर्म (देवतायननिर्माण, देवप्रतिष्ठा एवं देवार्चन) ने प्रतिमानिर्माण की परंपरा में महान योगदान दिया। देवमंदिरों के निर्माण में न केवल गर्भगृह के प्रधान देवता के निर्माण की आवश्यकता हुई वरन् देवगृह के सभी अंगों, भित्तियों, शिखरों आदि पर भी प्रतिमाओं के चित्रणों का एक अनिवार्य अंग प्रस्फुटित हुआ। इस प्रकार प्रधान देवों के साथ साथ परिवार देवों तथा भित्तिदेवताओं की भी प्रतिमाएँ बनने लगीं। मंदिर की भित्तियाँ पौराणिक आख्यानों के चित्रणों से भी विभूषित होने लगीं। अत: हिंदू प्रासाद या विमान पुरुषाकार (विराट् पुरुष के उपलक्षण पर विनिर्मित या प्रतिपादित) हैं अत: नाना उपलक्षणों, प्रतीकों, की पूर्ति के लिये यक्ष, गंधर्व, किन्नर, कूष्मांड, ऋषिगण, वसुगण, शार्दूल, मिथुन, सुर, सुंदरी, वाहन, आयुध आदि भी चित्रित होने लगे जिनकी प्रतिमाएँ भारतीय मूर्तिकला के समुज्वल निदर्शन हैं। उपासना परंपरा में नाना संप्रदायों, शैव, वैष्णव, शाक्त, गाणपत्य, सोर, बौद्ध, (विशेषकर वज्रयान) एवं जैन आदि धार्मिक संप्रदायों में अपनी अपनी धारणाओं के अनुसार प्रतिमा में देवों एवं देवियों के अगणित रूप परिकल्पित किए गए। पुराणों, आगमों, तंत्रों की आधारशिला पर यह वृंहण बहुत आगे बढ़ गया।
सारांश:
भारतपीडिया पर किया कोई भी योगदान अन्य सदस्यों द्वारा बदला जा सकता है और हटाया भी जा सकता है। अगर आपको अपने लिखे हुए पाठ में संपादन होना नामंजूर है तो यहाँ पर न लिखें।
आप हमें यह भी वचन देतें हैं कि यह आपने स्वयं लिखा है अथवा सार्वजनिक क्षेत्र या किसी समान मुक्त स्रोत से प्रतिलिपित किया है (अधिक जानकारी के लिये
भारतपीडिया:कॉपीराइट
देखें)।
कॉपीराइट सुरक्षित कार्यों को बिना अनुमति के यहाँ न डालें!
रद्द करें
सम्पादन सहायता
(नए विंडो में खुलता है)