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== जीवनी == बलराज मधोक का जन्म २५ फ़रवरी १९२० को [[जम्मू और कश्मीर|जम्मू एवं काश्मीर]] राज्य के अस्कार्डू में हुआ था। उनका परिवार मूलतः जम्मू का एक [[खत्री]] परिवार था जो [[आर्य समाज]] से निकट से जुड़ा हुआ था।<ref>[https://en.wikipedia.org/wiki/Balraj_Madhok#CITEREFJaffrelot,_Religion,_Caste_and_Politics2011 Jaffrelot, Religion, Caste and Politics] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20190522011928/https://en.wikipedia.org/wiki/Balraj_Madhok#CITEREFJaffrelot,_Religion,_Caste_and_Politics2011 |date=22 मई 2019 }} 2011, p. 288.</ref> उनके पिता जगन्नाथ मधोक पश्चिमी पंजाब के [[गुजरवालां जिला|गुजरवालां जिले]] के जालेन के रहने वाले थे। वे जम्मू कश्मीर रियासत के लद्दाख डिविजन में एक कर्मचारी थे।<ref>[http://janasangh.com/jsart.aspx?stid=194 Balraj Madhok: A Life Sketch"] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20170826232248/http://janasangh.com/jsart.aspx?stid=194 |date=26 अगस्त 2017 }}. Jana Sangh Today. February 2007. Retrieved 3 March 2016.</ref> बलराज मधोक का बचपन जालेन में बीता। उन्होने [[श्रीनगर]] और जम्मू के प्रिन्स ऑफ वेल्स कॉलेज में हुई। उच्च शिक्षा [[लाहौर विश्वविद्यालय]] के दयानन्द ऐंग्लो-वैदिक कॉलेज में हुई। उन्होने १९४० में इतिहास में हॉनर्स के साथ बीए किया।<ref>[http://janasangh.com/jsart.aspx?stid=194 Balraj Madhok: A Life Sketch"] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20170826232248/http://janasangh.com/jsart.aspx?stid=194 |date=26 अगस्त 2017 }}. Jana Sangh Today. February 2007. Retrieved 3 March 2016.</ref> [[विनायक दामोदर सावरकर]], [[भगत सिंह]] और [[मदन लाल ढींगरा]] उनके आदर्श थे। सन १९३८ में १८ वर्ष की आयु में अपने छात्रजीवन में ही वे [[राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ]] के सम्पर्क में आये जिसे वे [[आर्य समाज]] के विचारों के निकट समझते थे। सन १९४२ में [[भारतीय सशस्त्र सेनाएँ|भारतीय सेना]] में सेवा (कमीशन) का प्रस्ताव ठुकराते हुए उन्होने [[आर एस एस]] के प्रचारक के रूप में देश की सेवा करने का व्रत लिया। १९४२ में उन्हें [[जम्मू]] में आरएसएस के प्रचारक का दायित्व सौंपा गया। लगभग ८ मास तक इस कार्य को करते हुए उन्होने संघ का एक नेटवर्क खड़ा किया।<ref>{{Cite web |url=https://en.wikipedia.org/wiki/Balraj_Madhok#CITEREFSahagala,_Jammu_&_Kashmir:_A_State_in_Turbulence2011 |title=Sahagala, Jammu & Kashmir: A State in Turbulence 2011, p. 73. |access-date=15 मई 2020 |archive-url=https://web.archive.org/web/20190522011928/https://en.wikipedia.org/wiki/Balraj_Madhok#CITEREFSahagala,_Jammu_&_Kashmir:_A_State_in_Turbulence2011 |archive-date=22 मई 2019 |url-status=live }}</ref> बाद १९४४ मे सिर्फ 24 वर्ष की आयु में [[श्रीनगर]] के डीएवी पोस्ट ग्रेड्यूट कालेज में इतिहास के व्याख्या बनाए गए। यहाँ भी उन्होने संघ कार्य जारी रखा। उन्होने [[कश्मीर घाटी]] में संघ का नेटवर्क खड़ा कर दिया। अगस्त १९४७ में पाकिस्तान बनने के बाद पूरे जम्मू-कश्मीर में [[पाकिस्तान]] के षड्यंत्र पूरे उफान पर थे। जवाहर लाल नेहरू, शेख अब्दुल्ला की मोहब्बत में गिरफ्तार थे। जिन्ना की हार्दिक इच्छा थी कि सम्पूर्ण कश्मीर पर पाकिस्तान का शासन हो। वे जम्मू कश्मीर के डोगरा हिन्दू शासक को पदच्युत कर घाटी में इस्लामी शासन की स्थापना करना चाहते थे। पाकिस्तान से भागकर आने वाले हिन्दू शरणार्थी कुछ श्रीनगर भी आए। कुछ संघ की शाखाओं में भी आने लगे। इन लोगों से मधोक ने गुप्त सूचना एकत्र की जिससे पता चला पाकिस्तान २१ अक्टूबर को कश्मीर पर आक्रमण की योजना बना रहा है। यह सूचना उन्होने अधिकारियों को भी बता दी। महाराजा के कहने पर मधोक ने २३ अक्टूबर को श्रीनगर हवाई अड्डे की रक्षा के लिए २०० स्वयंसेवक तैयार किए। समय आने पर ये स्वयंसेवक बहुत काम आए।<ref>{{Cite web |url=https://en.wikipedia.org/wiki/Balraj_Madhok#CITEREFMadhok,_Kashmir_Storm_Centre_of_the_World1992 |title=Madhok, Kashmir Storm Centre of the World 1992, Chapter 6. |access-date=15 मई 2020 |archive-url=https://web.archive.org/web/20190522011928/https://en.wikipedia.org/wiki/Balraj_Madhok#CITEREFMadhok,_Kashmir_Storm_Centre_of_the_World1992 |archive-date=22 मई 2019 |url-status=live }}</ref> १९४८ में मधोक [[दिल्ली]] आ गए और [[पंजाब विश्वविद्यालय कॉलेज]] में शिक्षण करने लगे जो पंजाब से आए शरणार्थियों की शिक्षा के के लिए स्थापित किया गया था। बाद में वे [[दिल्ली विश्वविद्यालय]] से सम्बद्ध डीएवी कॉलेज में इतिहास के प्रवक्ता बन गए। १९५१ में उन्होने [[अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद]] की स्थापना की जो [[राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ]] का विद्यार्थियों का संगठन है। [[श्यामा प्रसाद मुखर्जी]] ने 1951 में जब [[भारतीय जनसंघ]] की स्थापना की तब मधोक उनके सम्पर्क में आए और पार्टी के प्रचार और विकास में हाथ बंटाया। उन्हें पार्टी का संस्थापक सचिव बनाया गया। दिल्ली और पंजाब में पार्टी को बढ़ाने का काम मधोक को सौंपा गया। उन्होंने दोनों जगह जनसंघ की राज्य इकाई की स्थापना की। इसी साल मधोक ने आरएसएस की छात्र इकाई [[एबीवीपी]] की स्थापना भी की। इसके बाद मधोक निरन्तर बढ़ते रहे। मधोक 1961 में नई दिल्ली से लोकसभा का चुनाव जीते। वर्ष 1966 में उन्हें भारतीय जनसंघ का अध्यक्ष बना दिया गया। १९६७ में उन्हीं के नेतृत्व में पहली बार पार्टी ने देशभर में चुनाव लड़ा और 35 सीटें जीतीं। वह खुद भी दूसरी बार दिल्ली से सांसद बने। दिल्ली में जनसंघ ने सात में से छह सीटें जीती थीं, उन्होंने उन जगहों पर जीत हासिल की थीं जहाँ कोई उम्मीद नहीं कर सकता था। यही नहीं, [[पंजाब]] में जनसंघ की संयुक्त सरकार बनी थी और [[उत्तर प्रदेश]] और [[राजस्थान]] सहित आठ प्रमुख राज्यों में जनसंघ मुख्य विपक्षी दल बनने में सफल हुआ था। इसी के बाद ही जनसंघ की विपक्षी दल के तौर पर पुख्ता पहचान बनी। 1968 में जनसंघ अध्यक्ष [[दीनदयाल उपाध्याय]] की [[मुग़लसराय]] (अब, दीदयाल उपाध्याय नगर) में हुई हत्या के बाद जब भारतीय जनसंघ ने उनकी जगह [[अटल बिहारी वाजपेयी]] को अपना अध्यक्ष चुना, तभी से बलराज मधोक के राजनीति में हाशिए में जाने का सिलसिला शुरू हो गया। विश्लेषकों का कहना है कि वाजपेयी और मधोक दोनों ही महत्वाकाँक्षी थे और दोनों ही आगे आना चाहते थे, वाजपेयी मधोक की तुलना में अधिक उदार थे, इसलिए दूसरे लोगों को अधिक स्वीकार्य थे। 1971 में वे लोकसभा चुनाव हार गए। उसी वर्ष इन्दिरा गांधी ने [[बांग्लादेश]] को विमुक्त कराया था, जिससे जनसामान्य में कांग्रेस के प्रति भारी समर्थन आ गया था। अपनी विचारधारा से प्रतिबद्ध होने के बावजूद बलराज मधोक की छवि एक अव्यवहारिक राजनेता की रही। कहा जाता है कि अपनी बेबाक छवि के कारण उनकी पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं से नहीं बनती थी, उनमें से एक [[लालकृष्ण आडवाणी]] भी थे। यही कारण है कि जिस जनसंघ की स्थापना और उसे बढ़ाने में उनका खास योगदान रहा एक दिन उसी से उन्हें निकाल दिया गया। फरवरी, 1973 में [[कानपुर]] में जनसंघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सामने मधोक ने एक नोट पेश किया। उस नोट में मधोक ने आर्थिक नीति, बैंकों के राष्ट्रीयकरण पर जनसंघ की विचारधारा के उलट बातें कही थीं। इसके अलावा मधोक ने कहा था कि जनसंघ पर आरएसएस का असर बढ़ता जा रहा है। मधोक ने संगठन मंत्रियों को हटाकर जनसंघ की कार्यप्रणाली को ज्यादा लोकतांत्रिक बनाने की मांग भी उठाई थी। [[लालकृष्ण आडवाणी]] उस समय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। वे मधोक की इन बातों से इतने नाराज हो गए कि आडवाणी ने मधोक को पार्टी का अनुशासन तोड़ने और पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने की वजह से उन्हें तीन साल के लिये पार्टी से बाहर कर दिया गया। <ref>{{Cite web |url=https://en.wikipedia.org/wiki/Balraj_Madhok#CITEREFJaffrelot,_Hindu_Nationalism_Reader2007 |title=Jaffrelot, Hindu Nationalism Reader 2007, p. 159. |access-date=15 मई 2020 |archive-url=https://web.archive.org/web/20190522011928/https://en.wikipedia.org/wiki/Balraj_Madhok#CITEREFJaffrelot,_Hindu_Nationalism_Reader2007 |archive-date=22 मई 2019 |url-status=live }}</ref> इसके बारे में दूसरी कहानी यह है कि पार्टी नेतृत्व ने उन्हें एक रिपोर्ट बनाने को दी थी, मधोक ने वह रिपोर्ट पार्टी अध्यक्ष को सौंप दी थी। इससे पहले कि उस रिपोर्ट पर विचार किया जाता, बलराज मधोक का कहना है कि आडवाणी ने कुछ पत्रकारों को लंच पर बुलाया और उस रिपोर्ट की कापी दे दी। अगले दिन जब वो रिपोर्ट अख़बारों में छपी तो मधोक से पूछा गया कि ये रिपोर्ट प्रेस के हाथ में कैसे पहुंची?मधोक इस आरोप से इतने नाराज़ हुए कि उन्होंने उसी समय अधिवेशन छोड़कर बाहर निकल आये। वे पहले रेलवे स्टेशन पहुँचे और फिर रेलवे लाइन के सहारे चलते चलते अगले स्टेशन पहुँचे और वहाँ से उन्होंने दिल्ली के लिए ट्रेन पकड़ी। मधोक को लगता था जिस तरह दीनदयाल उपाध्याय की भी हत्या की गई थी, उसी तरह उनकी भी हत्या हो सकती है। इसलिए उन्होंने कानपुर स्टेशन से ट्रेन पकड़ने के बजाए अगले स्टेशन से ट्रेन पकड़ना उचित समझा। पार्टी से निकाले जाने के बाद वे इतने आहत हुए थे कि फिर पार्टी में कभी नहीं लौटे। उन्होंने [[राज नारायण]] से मिलकर [[चौधरी चरण सिंह]] के नेतृत्व में [[भारतीय लोक दल]] बनवाया, लेकिन तभी [[आपातकाल (भारत)|आपातकाल]] लग गया और मधोक को गिरफ़्तार कर लिया गया। उन्होने 18 महीने जेल में बिताए। आपातकाल समाप्त होने के बाद जब [[जनता पार्टी]] बनी तो मधोक भी उसमें सम्मिलित हुए। चरण सिंह, राज नारायण और भारतीय जनसंघ तीनों ने ये तय कर लिया कि बलराज मधोक को जनता पार्टी की मुख्य धारा से अलग रखना है। मधोक फिर अलग-थलग पड़ गए। मधोक जनसंघ के [[जनता पार्टी]] में विलय के खिलाफ थे। 1979 में उन्होंने जनता पार्टी त्याग दी और 'अखिल भारतीय जनसंघ' नाम से जनसंघ को पुनः जीवित करने का प्रयत्न किया। उन्होंने अपनी पार्टी को बढ़ाने की हर संभव कोशिश की, लेकिन सफलता हासिल नहीं हुई। मधोक जनसंघ के [[जनता पार्टी]] में विलय के खिलाफ थे। 1979 में उन्होंने 'अखिल भारतीय जनसंघ' को जनता पार्टी से अलग कर लिया। उन्होंने अपनी पार्टी को बढ़ाने की हर संभव कोशिश की, लेकिन सफलता हासिल नहीं हुई। 96 वर्ष की आयु में 2 मई 2016 को उनकी मृत्यु हो गई।
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