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== हिन्दू धर्म अनुसार == === [[विष्णु पुराण]] के अनुसार वर्णन === * यह ब्रह्माण्ड कपित्थ (कैथे) के फ़ल की भांति, अण्डकटाह से घिरा हुआ है। * यह कटाह अपने से दस गुने परिमाण के जल से घिरा हुआ है। * यह जल अपने से दस गुने परिमाण के अग्नि से घिरा हुआ है। * यह अग्नि अपने से दस गुने परिमाण के वायु से घिरा हुआ है। * यह वायु अपने से दस गुने परिमाण के आकाश से घिरा हुआ है। * यह आकाश अपने से दस गुने परिमाण के तामस अंधकार से घिरा हुआ है। * यह तामस अंधकार अपने से दस गुने परिमाण के महत्तत्व से घिरा हुआ है। * महत्तत्व अपरिमेय, असीमित तत्वों के वृहद् से वृहद्तर रूप से निर्मित सम्पूर्ण ग्रह, उपग्रह्, तारे आदि जो ब्रह्माण्ड के एक एक अंग हैं, इनका वर्गिकरण मानव ने इनकी प्रकृति के अनुसार किया हैं। भारत के ॠषियों ने इन तारों और ग्रहों के विषय में खगोल शास्त्र के माध्यम से लगभग २२०० साल पहले ही पता लगा लिया था। भागवत पुराण के अनुसार ॠषि बाराहमिहिर ने २७ नक्षत्र, ७ ग्रहों तथा ध्रुव तारे को वेधने के लिये एक जलाशय में मेरु स्तम्भ का निर्माण करवाया था। इस मेरु स्तम्भ में ७ ग्रहों के लिये ७ मंजिल और २७ नक्षत्रों के लिये २७ रोशनदानों का निर्माण काले पत्थरों से करवाया गया था तथा इसके चारों तरफ़ मन्दिर स्वरूपी २७ वेधशालायें स्थापित की गयीं थीं
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