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== इतिहास == छन्दशास्त्र की रचना कब हुई, इस सम्बन्ध में कोई निश्चित विचार नहीं दिया जा सकता। किंवदन्ति है कि महर्षि [[वाल्मीकि]] आदिकवि हैं और उनका [[रामायण]] नामक काव्य [[रामायण|आदिकाव्य]] है। 'मा निषाद प्रतिष्ठां त्वं गमः शाश्वती समाः यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधिः, काममोहितं' - यह [[अनुष्टुप छंद|अनुष्टुप छन्द]] वाल्मीकि के मुख से निकला हुआ '''प्रथम छन्द''' है जो शोक के कारण सहसा श्लोक के रूप में प्रकट हुआ। यदि इस किंवदन्ती को मान लिया जाए, छन्द की रचना पहले हुई और छन्दशास्त्र उसके पश्चात् आया। वाल्मीकीय रामायण में अनुष्टुप छन्द का प्रयोग आद्योपान्त हुआ ही है, अन्य [[उपजाति]] आदि का भी प्रयोग प्रचुर मात्रा में प्राप्त होता है। एक अन्य किंवदन्ती यह है कि छन्दशास्त्र के आदि आविष्कर्ता [[शेषनाग|भगवान् शेष]] हैं। एक बार [[गरुड़]] ने उन्हें पकड़ लिया। शेष ने कहा कि हमारे पास एक अप्रतिम विद्या है जो आप सीख लें, तदुपरान्त हमें खाएँ। गरुड़ ने कहा कि आप बहाने बनाते हैं और स्वरक्षार्थ हमें विभ्रमित कर रहे हैं। शेष ने उत्तर दिया कि हम असत्य भाषण नहीं करते। इसपर गरुड़ ने स्वीकार कर लिया और शेष उन्हें छन्दशास्त्र का उपदेश करने लगे। विविध छन्दों के रचनानियम बताते हुए अन्त में शेष ने "भुजङ्गप्रयाति" छन्द का नियम बताया और शीघ्र ही समुद्र में प्रवेश कर गए। गरुड़ ने इसपर कहा कि तुमने हमें धोखा दिया, शेष ने उत्तर दिया कि हमने जाने के पूर्व आपको सूचना दे दी। '''चतुर्भियकारैर्भुजङ्गप्रयातम्''' अर्थात् चार गणों से भुजङ्गप्रयाति छन्द बनता है और प्रयुक्त होता है। इस प्रकार छन्दशास्त्र का आविर्भाव हुआ। इससे प्रतीत होता है कि छन्दशास्त्र एक दैवी विद्या के रूप में प्रकट हुआ। इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि इसके आविष्ककर्ता 'शेष' नामक कोई आचार्य थे जिनके विषय में इस समय कुछ विशेष ज्ञान और सूचना नहीं है। इसके पश्चात् कहा जाता है कि शेष ने अवतार लेकर [[पिङ्गल|पिंगलाचार्य]] के रूप में [[छन्दशास्त्र|छन्दसूत्र]] की रचना की, जो [[छन्दशास्त्र|पिंगलशास्त्र]] कहा जाता है। यह ग्रंथ सूत्रशैली में लिखा गया है और इस समय तक उपलब्ध है। इसपर टीकाएँ तथा व्याख्याएँ हो चुकी हैं। यही छंदशास्त्र का सर्वप्रथम ग्रंथ माना जाता है। इसके पश्चात् इस शास्त्र पर [[संस्कृत साहित्य]] में अनेक ग्रंथों की रचना हुई। छंदशास्त्र के रचियताओं को दो श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है : एक आचार्य श्रेणी, जो छन्दशास्त्र का शास्त्रीय निरूपण करती है और दूसरी कवि श्रेणी, जो छन्दशास्त्र पर पृथक् रचनाएँ प्रस्तुत करती है। थोड़े समय के पश्चात् एक लेखक श्रेणी और प्रकट हुई जिनमें ऐसे लेखक आते हैं जो छन्दों के नियमादिकों की विवेचना अपनी ओर से करते हैं किंतु उदाहरण दूसरे के रचे हुए तथा प्रचलित अंशों से उद्धृत करते हैं। [[हिन्दी]] में भी छन्दशास्त्र पर अनेक ग्रन्थ लिखे गए हैं।
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