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==मक्खलि गोसाल से जुड़े स्रोतों की प्रामाणिकता== मक्खलि गोसाल के बारे में कोई भी प्राथमिक और प्रामाणिक स्रोत उपलब्ध नहीं है। मक्खलि गोसाल और आजीवक संप्रदाय की जानकारी के लिए इतिहासकार पूरी तरह से जैन आगम के ‘भगवती सूत्र’ और बौद्ध ग्रंथ [[दीघनिकाय|दीघ निकाय]] के ‘'''समन्नफल सुत्त'''’ तथा मौर्ययुगीन [[बराबर गुफाएँ|बराबर गुफाओं]] में प्राप्त शिलालेखों पर निर्भर हैं, जिनमें मक्खलि गोसाल और उनके आजीवक अनुयायीयों को महावीर और बुद्ध से निम्नतर बताते हुए उनकी खिल्ली उड़ाई गई है। तब भी इतिहासकारों में इस बात पर विवाद नहीं है कि मक्खलि गोसाल के आजीवक संप्रदाय और दर्शन का प्रभाव व प्रचलन पहली सदी तक संपूर्ण भारत में व्यापक रूप से था।<ref>{{Cite web |url=https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%86%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95 |title=संग्रहीत प्रति |access-date=24 अप्रैल 2018 |archive-url=https://web.archive.org/web/20171219173853/https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%86%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95 |archive-date=19 दिसंबर 2017 |url-status=live }}</ref> डी. आर. भंडारकर ने ‘आजीविकाज’ (1912), के. बी. पाठक ने ‘ ए सेक्ट ऑफ बुद्धिस्ट भिक्षुज’ (1912), जे. कारपेंटर ने ‘आजीवक’ (1913), बेणी माधव बरुआ ने ‘द आजीविकाज: ए शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ देयर रिलिजन एंड फिलॉसफी’ (1920) व ‘ए हिस्ट्री ऑफ प्री-बुद्धिस्टिक इंडियन फिलॉसफी’ (1921), ए. एल. बाशम ने ‘हिस्ट्री एंड डॉक्टराइन ऑफ आजीवकाज’ (1951) और हरिपद चक्रवर्ती ने ‘एस्केटिसिज्म इन एनसिएंट इंडिया इन ब्राम्हणीकल, बुद्धिस्ट, जैन एंड आजीविका सोसायटीज (1973) जैन और बौद्ध ग्रंथों के सहारे आजीवकों और मक्खलि गोसाल के इतिहास का पुनर्निर्माण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। लेकिन ए. एफ. रूडोल्फ हॉर्न<ref>Annual Address Delivered to the Asiatic Society of Bengal by A. F. Rudolf Hoernle, Calcutta: Baptist Mission Press, 1898</ref> पहले अध्येता हैं जिन्होंने 1898 में पहली बार मक्खलि गोसाल और आजीवकों के बारे में दुनिया का ध्यान खींचा।
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