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== जीवन वृत्त == आचार्य रघुवीर का जन्म ३० दिसम्बर १९०२ को [[रावलपिंडी|रावलपिण्डी]] (पश्चिमी पंजाब) में हुआ था। पंजाब विश्वविद्यालय, [[लाहौर]] से एमए करने के उपरान्त उन्होने [[लंदन|लन्दन]] से पी-एचडी किया तथा हालैण्ड से डी लिट किया। सन् १९३१ में आपने डच भाषा में उपनिवेशवाद के विरुद्ध क्रांतिसमर्थक ग्रंथ लिखा, जिससे हिंदेशिया के स्वतंत्रता आंदोलन को विशेष प्रेरणा एवं शक्ति मिली। इसके बाद उनके आरम्भिक कार्य का केन्द्र लाहौर ही रहा जहाँ वे सनातन धर्म कालेज में संस्कृत विभाग के अध्यक्ष थे। वे अपने आप में एक संस्था थे। उन्होने सन १९३२ में [[लाहौर]] के निकट '''इछरा''' (Ichhra) में '''इन्टरनेशनल एकेडमी ऑफ इण्डियन कल्चर''' कीस्थापना कर भारतीय संस्कृति के अनुसंधान का कार्य आरंभ किया। इस कार्य के लिए आपने योरोप, सोवियत संघ, चीन तथा दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों की अनेक बार यात्राएँ कीं। इन यात्राओं में आपने भारतीय संस्कृति विषयक अपन विशेष दृष्टि तो रखी ही, साथ ही उन देशों की राजनीतिक विचारधारा तथा भारत पर पड़नेवाले संभावित प्रभावों को भी ध्यान में रखा। अपने तीन यूरोप प्रवासों के समय व उसके बाद वे वहाँ के अधिकांश भारतविदों के सम्पर्क में रहे। १९४६ में वे इसे [[नागपुर]] ले आये। फिर १९५६ में उनका यह '''सरस्वती विहार''' (International academy of Indian culture) [[दिल्ली]] आ गया। उनके एक पुत्र (डा [[लोकेश चंद्र|लोकेश चन्द्र]]) तथा दो पुत्रियाँ हैं। अपनी मृत्यु के पूर्व ही उन्होने अपने इस महान कार्य में अपने पुत्र, पुत्र-बधु, पुत्रियों एवं दामाद को लगा दिया था। === मंगोलिया यात्रा === अपने जीवन के अन्तिम दशक में आचार्य रघुवीर [[मंगोलिया]] देश की यात्रा पर गए। उस समय उनके अनुसंधान का विषय था- मंगोलिया की भाषा, साहित्य, संस्कृति और धर्म। वह इतिहास जिसमें छठी शताब्दी के उन भारतीय आचार्यों का वर्णन है जो धर्म की ज्योति लिए मंगोल देश में गये और 6000 संस्कृत ग्रन्थों का मंगोल भाषा में भाषान्तर किया, जिनके द्वारा निर्मित दास लाख मूर्तियां, सात सौ पचास विहारों में सुरक्षित थीं, जिनके द्वारा लिखी अथवा लिखवायी गयीं बत्तीस लाख [[पाण्डुलिपि]]यां 1940 तक विहारों में सुरक्षित थीं, लाखों प्रभापट थे। आचार्य जी इन सब का अवलोकन करना चाहते थे। मंगोल भाषा में लिखा गया [[विक्रमादित्य]], [[परमार भोज|राजा भोज]] और [[कृष्ण]] की कथाएं वे अपने साथ लाए। बीसवीं शताब्दी में भारत से मंगोलिया जाने वाले वे पहले आचार्य थे। 1956 में जब वे वहां गए तो वहां की जनता के लिए मानो एक युगप्रवर्तक घटना घटी हो। प्रधानमंत्री से लेकर विद्वान, पत्रकार, जनता-जनार्दन का अपार स्नेह उन्हें मिला। जिस-जिस तम्बू में वे गए, माताओं ने अपने बच्चों को उनकी गोद में बिठा दिया, सब उनका आशीर्वाद पाने को आतुर थे। इस यात्रा से वे अपने साथ तीन लाख पृष्ठों के अणु चित्र लाये, [[पाण्डुलिपि]]यां और प्रभापट लाये। पहली बार कोई भारतीय मंगोलिया से भारत-अनुप्राणित साहित्य और कला-निधियां लेकर आया था। आचार्य जी स्वतंत्रता का उदय होते ही सर्वप्रथम अवसर की खोज में रहे कि भारत के सांस्कृतिक सखा देशों से पुनः सम्बंध स्थापित कर सकें। आचार्य जी का मंगोलों में जाना क्या था, वे तो आनन्द-विभोर हो उठे कि कई शदियों के उपरान्त भारत के आचार्य के चरण उनकी भूमि पावन कर रहे हैं। जनवरी 1956 में आचार्य जी [[सोवियत संघ]], [[साइबेरिया]] (शिबिर देश) और मंगोल गणराज्य की यात्रा पर गये तो वहां शरीर को जमा देने वाली ठण्ड थी। [[मास्को]] में चलने के लिए दो व्यक्तियों का सहारा लेना पड़ता था। गरम बनियान, ऊनी कमीज, कोट, ओवरकोट और उसके ऊपर रुई से भरा चमड़े का कोट पहन कर भी सर्दी से शरीर की रक्षा नहीं हो पाती थी। वहां उन्होंने [[चंगेज़ ख़ान|चंगेज खान]] के वंशजों के अति दिव्य मन्दिर देखे जो [[गणेश]]जी की मूर्तियों से सुशोभित थे। मन्दिरों में भिक्षु उपासना के साथ ढोल और अन्य वाद्य बजा रहे थे। मन्दिरों के बाहर लटकी छोटी-छोटी घण्टियाँ मधुर स्वर गुंजा रही थीं। मन्दिरों के भीतर [[बोधि वृक्ष|बोधिवृक्ष]] को शिशु की भांति पाला-पोसा जाता था। अगुरु और चन्दन से बनी महाघण्टी थी, श्रीवत्स से अंकित वस्त्र से ढके पटल (मेज) थे, मन्दिर के बाहर पीले नेजाबुत्का फूल थे। नेजाबुत्का का अर्थ है: मुझे भूल न जाना। चारों ओर हिम का धवल साम्राज्य था। यहां से आचार्य जी [[मंगोल भाषा]] में अनूदित अनेक ग्रन्थ लाये जिनमें [[कालिदास]] का [[मेघदूतम्|मेघदूत]], [[पाणिनि]] का [[व्याकरण]], [[अमरकोश]], [[दण्डी]] का [[काव्यादर्श]] आदि सम्मिलित हैं। इनमें से एक, "गिसन खां" अर्थात् राजाकृष्ण की कथाओं का उनकी सुपुत्री डॉ॰ सुषमा लोहिया ने अनुवाद किया है। वे भारतीयों को भारतीयता के गौरव की अनुभूति करवाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने मंगोल-संस्कृत और संस्कृत-मंगोल कोश भी लिख डाले। उन्होंने मंगोल भाषा का व्याकरण भी लिखा ताकि भावी पीढ़ियां उसका अध्ययन कर सकें। वहां "आलि-कालि-बीजहारम्" नामक, संस्कृत पढ़ाने की एक पुस्तक आचार्य जी को उपलब्ध हुई। इसमें लांछा और ववर्तुल दो लिपियों का प्रयोग किया गया है। भारत में ये लिपियां खो चुकी हैं। मंगोलिया में बौद्ध भिक्षु [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]] की धारणियों को लिखने और पढ़ने के लिए इस पुस्तक का अध्ययन किया करते थे। इसमें संस्कृत अक्षरों का तिब्बती और मंगोल लिपियों में लिप्यन्तर कर उन्हीं भाषाओं में वर्णन प्रस्तुत किए गए हैं। और भी आश्चर्य की बात है कि इसकी छपाई [[चीन]] में हुई थी। यह पुस्तक मात्र भारत के चीन, मंगोलिया और तिब्बत के साथ सांस्कृतिक सम्बंधों की गाथा ही नहीं सुनाती अपितु [[नेवारी]], [[देवनागरी]] तथा [[बंगाली लिपि]]यों का विकास जानने में भी सहायक है।
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