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==परिचय== रमन एक अत्यन्त उत्साही, परिश्रमी, और मेधवी व्यक्ति थे। 19 वर्ष की आयु में उन्होंने प्रथम श्रेणी में प्रथम रहते हुए भौतिकी में एम.ए. किया और वित्त सेवाओं की प्रतियोगी परीक्षा में सफल होकर कलकत्ता में उपमहालेख अधिकरी बन गए। कुछ कर गुजरने की चाह और विज्ञान के प्रति रूचि ने उन्हें महेन्द्र लाल सरकार द्वारा स्थापित विज्ञान अनुसंधन संस्था इन्डियन एसोसिएशन फॉर कल्टीवेशन ऑफ साइंसेज से जोड़ दिया। वे दिन भर अपने दायित्व का निर्वाह करने में व्यस्त रहते और शाम से देर रात तक प्रयोगशाला में। उनका प्रारंभिक कार्य वाद्य यंत्रों की कार्यप्रणाली से जुड़े विज्ञान के अन्वेषण से संबद्ध रहा। रमन का विज्ञान के प्रति समर्पण इतना तीव्र था कि 1917 में जब उन्हें कलकत्ता विश्वविद्यालय में भौतिकी के पालित प्रोफेसर बनाए जाने का प्रस्ताव मिला तो अपनी सरकारी नौकरी छोड़कर लगभग आधी तन्खाह पर उन्होंने इस पद को स्वीकार कर लिया। रमन की संपूर्ण शिक्षा भारत में ही हुई थी और अभी तक दुनिया के अन्य वैज्ञानिकों के साथ उनका संपर्क पुस्तकों और अंतरराष्ट्रीय शोधपत्रिकाओं में छपे लेखों के माध्यम से ही था। 1921 में पहली बार एक अध्ययन यात्रा पर उन्हें विदेश जाने का अवसर मिला। पानी के जहाज से यात्रा करते समय सागर के नीले-नीले जल ने उनका ध्यान आकर्षित किया। [[लार्ड रैले]] ने आकाश के नीले रंग की सफल व्याख्या वायुकणों से प्रकाश-विकीर्णन के आधार पर की थी किन्तु सागर जल का नीला रंग उन्होंने आकाश का जल में प्रतिबिम्व मान लिया था। रमन को यह व्याख्या स्वीकार्य नहीं थी। उनको लगता था कि जो सिद्धांत वायु के नीले रंग के लिए उत्तरदायी था वही जल के नीले रंग के लिए भी होना चाहिए, इसलिए, अपनी वापसी यात्रा में उन्होंने एक जेबी स्पेक्ट्रममापी अपने साथ रखा। एस.एस. नरकुंडा नामक जलयान पर यात्रा के दौरान उन्होंने ग्लेशियरों और जल से प्रकीर्णन के कुछ प्रयोग इस यंत्र की सहायता से किए। भारत पहुंचते-पहुंचते उन्हें विश्वास हो गया कि उनका विचार सही था। उन्होंने '[[नेचर (पत्रिका)]] को एक छोटा लेख इस संबंध में भेजा और युवा वैज्ञानिकों के अपने दल के साथ प्रकाश-प्रकीर्णन संबंधी अपने प्रयोगों में लीन हो गए। 7 वर्ष के अथक परिश्रम और सैकड़ों द्रवों एवं ठोसों से प्रकाश-प्रकीर्णन का अध्ययन करने के बाद आखिर 28 फरवरी, 1928 को उन्होंने रमन प्रभाव की घोषणा की। 1987 से भारत में यह दिन राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता है।
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