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==महत्व== रसविद्या का बड़ा महत्व माना गया है। रसचण्डाशुः नामक ग्रन्थ में कहा गया है- :''शताश्वमेधेन कृतेन पुण्यं गोकोटिभि: स्वर्णसहस्रदानात। :''नृणां भवेत् सूतकदर्शनेन यत्सर्वतीर्थेषु कृताभिषेकात्॥6॥ : अर्थात सौ अश्वमेध यज्ञ करने के बाद, एक करोड़ गाय दान देने के बाद या स्वर्ण की एक हजार मुद्राएँ दान देने के पश्चात् तथा सभी तीर्थों के जल से अभिषेक (स्नान) करने के फलस्वरूप जो जो पुण्य प्राप्त होता है, वही पुण्य केवल पारद के दर्शन मात्र से होता है। <ref>{{Cite web |url=http://www.ccras.nic.in/publication/CCRAS_Publication/Literary/Rasachandanshu.pdf |title=रसचण्डाशुः, पृष्ठ २ |access-date=10 मार्च 2017 |archive-url=https://web.archive.org/web/20161111102535/http://ccras.nic.in/publication/CCRAS_Publication/Literary/Rasachandanshu.pdf |archive-date=11 नवंबर 2016 |url-status=dead }}</ref> इसी तरह- :'' मूर्च्छित्वा हरितं रुजं बन्धनमनुभूय मुक्तिदो भवति। :''अमरीकरोति हि मृतः कोऽन्यः करुणाकर: सूतात्॥7॥ : जो मूर्छित होकर रोगों का नाश करता है, बद्ध होकर मनुष्य को मुक्ति प्रदान करता है, और मृत होकर मनुष्य को अमर करता है, ऐसा दयालु पारद के अतिरिक्त अन्य कौन हो सकता है? अर्थात कोई नहीं। <ref>{{Cite web |url=http://www.ccras.nic.in/publication/CCRAS_Publication/Literary/Rasachandanshu.pdf |title=रसचण्डाशुः, पृष्ठ २ |access-date=10 मार्च 2017 |archive-url=https://web.archive.org/web/20161111102535/http://ccras.nic.in/publication/CCRAS_Publication/Literary/Rasachandanshu.pdf |archive-date=11 नवंबर 2016 |url-status=dead }}</ref>
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