सामग्री पर जाएँ
मुख्य मेन्यू
मुख्य मेन्यू
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
मार्गदर्शन
मुखपृष्ठ
हाल में हुए बदलाव
बेतरतीब पृष्ठ
मीडियाविकि के बारे में सहायता
भारतपीडिया
खोजें
खोजें
दिखावट
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
व्यक्तिगत उपकरण
खाता बनाएँ
लॉग-इन करें
लॉग-आउट किए गए संपादकों के लिए पृष्ठ
अधिक जानें
योगदान
वार्ता
"
ललित कला
" (अनुभाग) सम्पादित करें
पृष्ठ
चर्चा
हिन्दी
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
उपकरण
उपकरण
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
क्रियाएँ
पढ़ें
सम्पादित करें
स्रोत सम्पादित करें
इतिहास देखें
सामान्य
कड़ियाँ
पृष्ठ से जुड़े बदलाव
विशेष पृष्ठ
पृष्ठ की जानकारी
दिखावट
साइडबार पर ले जाएँ
छिपाएँ
चेतावनी:
आपने लॉग-इन नहीं किया हुआ है। अगर आप सम्पादन करते हैं तो इस पृष्ठ के सम्पादन इतिहास में आपका IP पता दृश्य होगा। अगर आप
लॉग-इन
करते हैं या
खाता बनाते हैं
तो दूसरी सुविधाओं के साथ-साथ आपके सम्पादनों का श्रेय आपके सदस्यनाम पर दिया जाएगा।
ऐन्टी-स्पैम जाँच। इसे
नहीं
भरें!
== नृत्य कला (दक्षिण भारतीय) == === [[भरतनाट्यम्|भरत नाट्यम]] === [[तमिल नाडु|तमिलनाडु]] में प्रसिद्ध यह नृत्य पहले पहल आडल, कूलू, दासियाट्टम, चिन्नमेलम आदि नामों से जाना जाता था। इस नृत्य में भरतमुनि कृत नाट्यशास्त्र में वर्णित प्रणालियों का शुद्ध अनुकरण होने के कारण इसे 'भरतनाट्यम्' कहने लगे। भरत शब्द ही भाव, राग और ताल के संयोग को सूचित करता है। यह नाट्य तांडव, लास्य दो प्रकार के हैं। शिवजी द्वारा तंडु नामक भूतगण को प्रदत्त तांडव तथा पार्वती देवी से प्रदत्त लास्य है। अलग अलग रहनेवाली तथा शृंगार के आधार धरकर विकसित होनेवाली भावभूमिकाओं का अभिनय ही लास्य के रूप में वर्णित है। यह नृत्य अत्यंत प्राचीन माना जाता है। सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेष रूप में मिली हुई वस्तुओं में एक नर्तकी की प्रतिमा है। तमिल के पंचमहाकाव्यों में श्रेष्ठ शिप्पधिकारम में भी हम इस नाट्यप्रणाली का उल्लेख पाते हैं। यह प्रणाली केवल दक्षिण भारत में ही प्रचलित नहीं थी, अपितु उत्तर भारत में भी एक काल में यह प्रचलित थी। प्रमाणस्वरूप हम उत्तर भारत के अनेक भग्न शिलाखंडों में इस नृत्यप्रणाली का प्रतिपादन पाते हैं। आज सांस्कृतिक नवजागरण के इस युग में पाश्चात्य देशों का ध्यान भरतनाट्यम की ओर आकृष्ट हुआ है। भरतनाट्यम में एक ही नर्तकी के अश्रुप्रवाह, नयनमार्जन, हस्ताभिनय आदि से भावों का प्रतिपादन करने के कारण इसमें कलात्मकता अधिक विकासशील हो पाई है। भरत के द्वारा वर्णित गतिविधि, ग्रीवा-चालन-विधि आज भी व्यापक रूप से भरतनाट्यम में प्रचलित हैं। उनके द्वारा वर्णित हस्ताभिनय ही आज के हस्ताभिनय का आधार है। भरतनाट्यम के संबंध में प्राप्त होनेवाला प्राचीन ग्रंथ अभिनयदर्पण ही, जो नदिकेश्वर रचित माना जाता है, आज के नर्तनाचार्यों का आधारग्रंथ है। इन नृत्यप्रणाली में पहले पुष्पांजलि, फिर मुखशाली, फिर शुद्ध यति नृत्य, शब्दशाली, सूडादि शब्द नृत्त, शब्दसूड, फिर अनेक प्रकार के गीतों का अभिनय, फिर प्रबंध नर्तन तथा अंत में सिंधुतरु ध्रुवपद आदि का क्रम रखा गया है। यह नाट्य कविता, अभिनय, रस, राग आदि का सम्मिश्रित रूप है जो क्रमश: यजु:, साम, अथर्वण वेदों का सार तथा धर्म, अर्थ काम, मोक्ष को प्रदान करनेवाला माना जाता है। आजकल इस नृत्यप्रणाली का प्रचलन व्यापक हो गया है। राग, ताल, अभिनय, नृत्त, चित्रकारी, शिल्पकला आदि से युक्त इस कला का संपोषण इसकी वारीकियों की ओर विशेष ध्यान देते हुए बड़ी श्रद्धा के साथ हो रहा है। === भागवत नाट्य नाटक या भागवत् मेल नाट्य नाटक === नाट्य नाटकों में यह एक प्रकार का है जो बहुत ही श्रेष्ठ माना जाता है। इन नाटकों का अभिनय प्राय: पुरुषों के द्वारा ही होता है। गणपति, नरसिंह इत्यादि देवों की मुखाकृतियाँ होती है जिनकी पूजा नट नित्य किया करते हैं और नाट्य काल में व्रत धारण करते हैं। ये नाटक बहुधा मंदिरों में ही खेले जाते हैं, अन्यत्र नहीं। नाटक के प्रारंभ में मंगलाचरण गाया जाता है। बाद में कोणाँगीदा सर नामक विदूषक रंगमंच में प्रवेश करता है। नाटककार की विशेषताएँ और नाटक का लक्ष्य ओरडिसिंधु (एकाक्षर छंद) में गाए जाते हैं। इसके बाद पात्रप्रवेश होता है, प्रवेश तरु गाए जाते हैं। तंचावूर जिला के मेरटूर, उल्लुक्काडु, शूलमंगलम् शालियमंगलम् आदि जगहों में यह नृत्यपद्धति प्रचलित है। आंध्रप्रदेश के कूचिपुडी नामक गाँव में भी नरसिंह जयंती महोत्सव के समय यह नृत्य होता है। === सदिर === इसका नर्तन प्राय: एक अथवा दो स्त्री पात्रों द्वारा होता है। यह नर्तन पहले प्राय: देवदासियों से ही कराया जाता था। === पल्लु === स्त्री और पुरुष सम्मिलित रूप से यह नृत्य करते है। इसमें बहुधा ग्रामीण गीतों की ही प्रधानता होती है। === कथकली === इसका अर्थ ही कथाप्रधान है। यह नृत्य प्राचीन कालीन नाट्य सम्प्रदायों एवं देवी देवताओं की पूजनपद्धति से जनित माना जाता है। मुडियेट्टु, भगवती पाट्टु, काली आट्टम, तूकुआदि - ये नृत्य आर्यों के आगमन के पूर्व स्थित अनार्यों के आचारविचार को प्रतिबिंबित करनेवाले हैं। मूक अभिनय, धार्मिकता, तंत्र मंत्र, विचित्र भूषा, युद्ध, रक्तप्रवाह, आदि रूढ़िबद्ध होकर रंगमंच में प्रदर्शित किए जाते हैं। ये इस नृत्य की विशेषताएँ हैं। यह नाटक केरल के शाक्य लोगों से ही अधिक प्रचलित हुआ। तमिल महाकाव्यों में श्रेष्ठ शिलप्पधिकारम् में भी इस नृत्य का उल्लेख है। संस्कृत नाटकों का अंश कूडियाट्टम से अभिनयादि विशेष अंग कथकली में लिया गया है। शाक्यों के आंगिक अभिनय, उनकी मुद्राएँ, भावाभिनय, रंगमंच की रूढ़ियाँ इत्यादि कथानुसार अपनाई गई हैं। कथकली में जो रंग काम में लाए जाते हैं उन रंगों का विशेष अर्थ होता है। इस नृत्य में प्रयुक्त होनेवाली हर चीज विशेष अर्थसूचक होती है, जैसे हरा रंग दैवी गुणों का सूचक, काला रंग राक्षसी प्रवृत्तियों का सूचक माना जाता है। केरल में ज्यों ज्यों इस नृत्य का प्रचलन होने लगा त्यों त्यों केरल साहित्य का विकास हुआ। === कृष्णाट्टम === कथकली का ही अंश माना जाता है। इस नृत्यपद्धति के स्रष्टा थे राजा सामुद्रि। इसमें कृष्ण जीवन सबंधी कहानियों की प्रधानता होती है। इसके अलावा केरल में मोहिनीयाट्टम नामक नृत्य भी प्रचलित है। यह प्राय: स्त्रियों द्वारा ही किया जाता है। === कूच्चुप्पुडी === [[आन्ध्र प्रदेश|आंध्र प्रदेश]] में प्रचलित नृत्यपद्धति है। विजयवाड़ा के समीप का कूच्चुप्पुडी गाँव इस नृत्य का जन्मस्थान है। इसके स्रष्टा है सिद्धेंद्र योगी। इस नृत्य-प्रणाली में अभिनय, पद चालन और हस्तचालन अधिक है। इस नृत्य में पौराणिक कथांश ही अधिक होता है। === यक्षगानम् === यह [[कर्नाटक|कर्णाटक]] में प्रचलित एक पुरातन नृत्य प्रणाली है।
सारांश:
भारतपीडिया पर किया कोई भी योगदान अन्य सदस्यों द्वारा बदला जा सकता है और हटाया भी जा सकता है। अगर आपको अपने लिखे हुए पाठ में संपादन होना नामंजूर है तो यहाँ पर न लिखें।
आप हमें यह भी वचन देतें हैं कि यह आपने स्वयं लिखा है अथवा सार्वजनिक क्षेत्र या किसी समान मुक्त स्रोत से प्रतिलिपित किया है (अधिक जानकारी के लिये
भारतपीडिया:कॉपीराइट
देखें)।
कॉपीराइट सुरक्षित कार्यों को बिना अनुमति के यहाँ न डालें!
रद्द करें
सम्पादन सहायता
(नए विंडो में खुलता है)