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== शिक्षा के केन्द्र == [[चित्र:Viharas in Thotlakonda, Visakhapatnam.jpg|right|thumb|300px|[[थोतलाकोण्डा]], [[विशाखापत्तनम]] का प्राचीन विहार]] शिक्षा का एक अन्य प्रमुख केन्द्र कश्मीर था। इस काल में कश्मीर में शैव मत तथा अन्य मतावलंबी शिक्षा केन्द्र थे। दक्षिण भारत में [[मदुरई]] तथा [[शृंगेरी]] में भी कई महत्त्वपूर्ण मठों की स्थापना हुई। इन केन्द्रों में प्रमुख रूप से [[धर्म]] तथा [[दर्शन]] पर विचार-विमर्श होता था। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित मठों और शिक्षा केन्द्रों के कारण विचार विनिमय आसानी और शीघ्रता से देश के एक भाग से दूसरे भाग तक हो सकते थे। किसी दर्शन शास्त्री की विद्या उस समय तक पूर्ण नहीं मानी जाती थी जब तक वह देश के विभिन्न भागों में जाकर वहाँ के लोगों से शास्त्रार्थ न करता हो। इस तरह देश में विचारों के मुक्त और शीघ्रतापूर्ण आदान-प्रदान से भारत की सांस्कृतिक एकता को बहुत बल मिला, लेकिन इसके बावजूद इस काल में शिक्षित वर्ग का दृष्टिकोण अधिक संकीर्ण होता गया। वे नये विचारों का प्रतिपादन अथवा उसका स्वागत करने के स्थान पर केवल अतीत के ज्ञान पर ही निर्भर करते थे। वे भारत के बाहर पनपने वाले वैज्ञानिक विचारों से भी स्वयं को अलग रखते थे। इस प्रवृत्ति की झलक हमें मध्य एशिया के प्रसिद्ध वैज्ञानिक और विद्वान अलबेरूनी की रचनाओं में मिलती है। [[अल बेरुनी|अलबेरूनी]] ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में क़रीब दस वर्षों तक भारत में रहा। यद्यपि वह भारतीय ज्ञान और विज्ञान का प्रशंसक था, उसने यहाँ के शिक्षित वर्गों और विशेषकर ब्राह्मणों की संकीर्णता की चर्चा भी की हैः- 'ये घमण्डी, गर्वीले, दंभी तथा संकीर्ण प्रवृत्ति के हैं। ये प्रवृत्ति से ही अपने ज्ञान को दूसरों को बाँटने के मामले में कंजूस हैं और इस बात का अधिक से अधिक ख्याल रखते हैं कि कहीं और कोई जात के किसी आदमी, विशेषकर किसी विदेशी को उनका ज्ञान नहीं मिल जाए। उनका विश्वास है कि उनके अलावा और किसी को भी विज्ञान का कोई ज्ञान नहीं है।' ज्ञान को ही कुछ लोगों तक सीमित रखने की उनकी इस प्रवृत्ति तथा घमण्ड के कारण तथा किसी और स्रोत से प्राप्त ज्ञान को तुच्छ समझने के कारण भारतवर्ष इस मामले में पिछड़ गया। कालान्तर में उसे इस प्रवृत्ति का बहुत बड़ा मूल्य चुकाना पड़ा।
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