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== परिचय == ऊपर लिखे गए शक्तिस्रोतों में वायु, लहर, एवं सूर्य द्वारा प्राप्त शक्तियाँ आंतरायिक (intermittent) होती हैं और यही इन सब का सबसे बड़ा अवगुण है, क्योंकि शक्ति की माँग यदि संतत (continuous) हो, तो इस प्रकार की शक्तियों को उपयोग में लाने के लिए इनके संग्रह की व्यवस्था करनी होगी। शक्ति संयंत्र (plant) के आकार एवं कीमत को ध्यान में रखते हुए, बड़े पैमाने (large scale) पर शक्तिजनन की अवस्था में वायु, लहर तथा सूर्य द्वारा प्राप्त शक्ति का उपयोग लाभप्रद नहीं होता है। कुछ स्थानों में बड़े पैमाने पर शक्तिजनन के लिए ज्वारभाटा की शक्ति का उपयोग किया जा सकता है, किंतु इस प्रकार के संयंत्र के निर्माण में व्यय अत्यधिक होता है। वैज्ञानिकों द्वारा "शक्ति" शब्द का प्रयोग ऊर्जासंचरण की दर के लिए किया जाता है। सामान्य व्यवहार में शक्ति की ईकाई '''[[वाट]] होती है। ऊर्जा के प्राकृतिक स्रोतों को उपयोग में लाने के लिए अधिष्ठापन (installation) द्वारा संबंधित उपकरण तीन वर्गों में विभाजित किए जा सकते हैं : :(1) मूल चालक (Prime mover), जिसकी सहायता से प्राकृतिक ऊर्जा यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित होती है। इस प्रकार के वर्ग में भाप इंजन, भाप टरबाइन, जल टरबाइन, गैस टरबाइन, गैस इंजन, तेल इंजन आदि आते हैं, :(2) किसी भी प्रकार का यंत्र, जो मूल चालक द्वारा प्राप्त ऊर्जा से चलाया जाता हो। वस्तुत: इस वर्ग में वे सभी प्रकार के यंत्र, जैसे सभी मशीन औजार (machine tools), पंप (pump) यंत्र, लिफ्ट (lift), क्रेन (crane) आदि आते हैं, जिन्हें चलाने के लिए अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा की आवश्यकता होती है। तथा :(3) वे उपकरण, जिनकी सहायता से मूल चालक द्वारा प्राप्त ऊर्जा यंत्रों को प्रेषित (transmit) की जाती है। प्राय: मूल चालक उन स्थानों में, जहाँ ऊर्जा के प्राकृतिक स्रोत प्रचुर मात्रा में प्राप्य हों, स्थापित किया जाता है, जैसे जलप्रपात के निकट या कोयले की खानों के क्षेत्र में। जलप्रपात या प्राकृतिक जल के स्रोत, जैसे नदी, झील आदि के निकट द्रवचालित (hydraulic) शक्ति संयंत्र की, जिसें जल की ऊर्जा जल टरबाइन द्वारा यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित की जाती है, स्थापना की जाती है। दामोदर घाटी योजना के अंतर्गत इस प्रकार के संयंत्र की स्थापना, बिहार राज्य के धनवाद जिले में माइथान एवं पंचेत और हजारीबाग जिला में तिलैया नामक स्थानों पर की गई है। इस प्रकार के संयंत्र भारत में विभिन्न स्थानों पर स्थापित किए गए हैं, जैसे भाखरा नंगल, हीराकुंड, तुंगभद्रा, रिहंद आदि। कोयले की खानवाले क्षेत्रों में कोयले द्वारा प्राप्त ऊष्मा ऊर्जा को, ऊष्मीय शक्तिसंयंत्र में भाप टरबाइन, या भाप इंजन द्वारा यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है। इसके लिए कोयले को जलाकर वाष्पित्र (boiler) में भाप तैयार की जाती है और इस भाप का उपयोग मूल चालक, जैसे भाप टरबाइन या भाप इंजन को चलाने के लिए किया जाता है। इस तरह के ऊष्मीय शक्तिसंयंत्र [[बोकारो]] (बिहार राज्य) एवं [[दुर्गापुर]] (पश्चिम बंगाल) में हैं। उपर्युक्त प्रकार के द्रवचालित एवं ऊष्मीय शक्तिसंयंत्र द्वारा प्राप्त ऊर्जा विपुल परिमाण में बहुत दूरी पर स्थित कल कारखानों आदि में संचारित की जाती है। इस तरह के शक्तिसंचरण की अवस्था में शक्तिवितरण के तरीके एवं उपकरण अधिक महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि मूल चालक से उन स्थानों की दूरी, जहाँ यंत्रों द्वारा ऊर्जा का उपयोग होता है, वितरण की दक्षता पर निर्भर करती है। कुछ कारखानों में मूल चालक द्वारा प्राप्त ऊर्जा निकटवर्ती यंत्रों में ही संचारित की जाती है। इस अवस्था में तेल द्वारा चालित मूल चालक, जैसे तेल इंजन, का प्रयोग अधिक होता है। इसमें संचरणयंत्र का अधिक महत्व रहता है, क्योंकि संचरण की दक्षता पूरे संयंत्र की दक्षता को प्रभावित करती है। कभी-कभी मूल चालक को यंत्र से इस तरह जोड़ दिया जाता है कि संचरण उपकरण सुगमतापूर्वक मूल चालक, या यंत्र से अलग नहीं किया जा सकता। इस वर्ग में रेल इंजन आदि आते हैं।
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