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==जीवन== शांतिनाथ का जन्म ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी के दिन हुआ था। तब भरणी नक्षत्र था। उनके पिता का नाम विश्वसेन था, जो [[हस्तिनापुर]] के राजा थे और माता का नाम महारानी ऐरा था।<ref>{{Cite web |url=http://dharm.raftaar.in/religion/jainism/tirthankar/shantinath |title=संग्रहीत प्रति |access-date=1 नवंबर 2015 |archive-url=https://web.archive.org/web/20150913181113/http://dharm.raftaar.in/religion/jainism/tirthankar/shantinath |archive-date=13 सितंबर 2015 |url-status=live }}</ref><br /> जैन ग्रंथो में शांतिनाथ को कामदेव जैसा स्वरुपवान बताया गया है। पिता के बाद शांतिनाथ [[हस्तिनापुर]] के राजा बने। जैन ग्रन्थो के अनुसार उनकी ९६ हजार रानियां थीं। उनके पास ८४ लाख हाथी, ३६० रसोइए, ८४ करोड़ सैनिक, २८ हजार वन, १८ हजार मंडलिक राज्य, ३६० राजवैद्य, ३२ हजार अंगरक्षक देव, ३२ चमर ढोलने वाले, ३२ हजार मुकुटबंध राजा, ३२ हजार सेवक देव, १६ हजार खेत, ५६ हजार अंतर्दीप, ४ हजार मठ, ३२ हजार देश, ९६ करोड़ ग्राम, १ करोड़ हंडे, ३ करोड़ गायें, ३ करोड़ ५० लाख बंधु-बांधव, १० प्रकार के दिव्य भोग, ९ निधियां और २४ रत्न, ३ करोड़ थालियां आदि संपदा थीं एसा माना जाता है। <ref>{{Cite web |url=http://hindi.webdunia.com/jain-religion/%E0%A4%AD%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5-%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A4%B9%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A4%B0-112051800022_1.htm |title=वेब दुनिया पर संपत्ति के विषय में दी गई जानकारी |access-date=1 नवंबर 2015 |archive-url=https://web.archive.org/web/20160305012637/http://hindi.webdunia.com/jain-religion/%E0%A4%AD%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5-%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A4%B9%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A4%B0-112051800022_1.htm |archive-date=5 मार्च 2016 |url-status=live }}</ref><br /> वैराग्य आने पर इन्होने ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी को दीक्षा प्राप्त की। बारह माह की छ्दमस्थ अवस्था की साधना से शांतिनाथ ने पौष शुक्ल नवमी को ‘कैवल्य’ प्राप्त किया। ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशी के दिन सम्मेद शिखर पर भगवान शान्तिनाथ ने पार्थिव शरीर का त्याग किया था।
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