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== भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त विधिक उपचार == [[भारत का संविधान|भारतीय संविधान]] का तृतीय खंड संविधान द्वारा शासित प्रत्येक व्यक्ति को कुछ अधिकार प्रदान करता है। राज्य को यह शक्ति प्राप्त है कि समाज के कल्याण के लिये वह (राज्य) इन अधिकारों के उपभोग का विनियमन (regulate) करे। इन संवैधानिक अधिकारों में से अनेक अधिकार अन्य लिखित संविधानवाले देशों द्वारा भी स्वीकृत हैं। पर [[भारत का संविधान]] इस विषय में अप्रतिम है क्योंकि इन अधिकारों के प्रवर्तन (enforcement) के उपाय भी उसमें स्पष्टतया निर्दिष्ट हैं। हमारे संविधान की धारा 32 (1) यह उद्घोषण करती है कि संविधान के तृतीय खंड द्वारा प्रदत्त अधिकारों के प्रवर्तन के लिये सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष निर्धारित नियमानुसार याचिका प्रस्तुत की जा सकती है। इस प्रकार यह उपचार संविधान द्वारा प्रत्याभूत (guranted) है। उक्त धारा की ही उपधारा (2) [[भारत का उच्चतम न्यायालय|सर्वोच्च न्यायालय]] को यह अधिकार प्रदान करती है कि वह अधिकारों के प्रवर्तन के लिये '''बंदी प्रत्यक्षीकरण प्रादेश''' (writ of habeas corpus), '''परमादेश''' (mandamus), '''निषेधादेश''' (prohibition), '''अधिकरपृच्छा प्रादेश''' (Quo warranto) तथा '''उत्प्रेषण''' (certiorari) सहित किसी प्रकार का प्रादेश, निर्देश अथवा आदेश (writs, directions and orders) जारी कर सकता है। संविधान की धारा 226 द्वारा राज्य के उच्च न्यायालय को यह अधिकार प्राप्त है कि वह निर्देश, आदेश तथा प्रादेश का निर्गम (issuing) केवल संविधानप्रदत्त अधिकारों के प्रवर्तन के लिये ही नहीं, अपितु "किसी अन्य उद्देश्य के लिये" भी कर सकता है। इन उपचारों का उद्देश्य मनुष्य के विधिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिये शीघ्रता तथा मितव्ययितापूर्ण उपाय प्रदान करना है जिससे ये अधिकार [[विधानपालिका|विधायिका]] (legistature) तथा [[कार्यकारिणी (सरकार)|कार्यपालिका]] (executive) के हस्तक्षेप से मुक्त रहें। भारतीय संविधान की धारा 32 तथा 226 में उल्लिखित प्रादेशों तक ही सर्वोच्च न्यायलय तथा उच्च न्यायलय के उपचारात्मक अधिकार सीमित नहीं हैं, अपितु वे आवश्यकतानुसार कोई आदेश, निर्देश तथा प्रादेश भी जारी कर सकते हैं। इस प्रकार ये उपचारात्मक प्रतिबंध (remedial provisos) पर्याप्त व्यापक तथा असीमित हैं। ऐसा अवसर उपस्थित होने पर जबकि उक्त प्रादेश (writs) राज्य के अवैध कृत्य के विरुद्ध, व्यक्ति के अधिकारों के पुन: स्थापन (enforcement) में अक्षम हो, तब न्यायालय किसी अन्य आदेश प्रादेशादि की अवतारणा करने के लिये भी स्वतंत्र है। उपयुक्त मामलों में, यदि न्यायालय उचित समझे तो, वह घोषणाएँ करने के लिये भी स्वतंत्र है। सर्वोच्च न्यायालय भारतीय सीमा के अंतर्गत किसी भी अधिकारी के नाम आदेश, निर्देश अथवा प्रादेश जारी कर सकता है। उच्च न्यायालय के अधिकार उसकी क्षेत्रीय सीमा तक ही सीमित हैं। उच्च न्यायालय द्वारा निर्गमित (issued) आदेश अथवा प्रादेश, संपिधानप्रदत्त मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिये अथवा "अन्य किसी उद्देश्य के लिये" जारी किए जाते हैं। "अन्य किसी उद्देश्य के लिये" इस अंश की व्याख्या करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने यह निष्कर्ष निकाला है कि इस शक्ति का प्रयोग उच्च न्यायालय "अन्य विधिक अधिकारों" के प्रवर्तन के लिये ही कर सकता है। अत: स्पष्ट है कि संवैधानिक तथा अन्य विधिक अधिकारों के प्रवर्तन के अतिरिक्त अन्य किसी अधिकार के प्रवर्तन के लिये उच्च न्यायालय संभवत: अपनी शक्ति का प्रयोग नहीं करेगा। फलत: नैतिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिये न्यायालय इस शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकता। भारतीय संविधान की धारा 32 अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष, मूलभूत अधिकारों (fundamental rights) के उपभोग में बाधा प्रमाणित किए जाने के बाद न्यायालय अपनी शक्ति का प्रयोग करने के लिये बाध्य है, जबकि दूसरी ओर उच्च न्यायालय संविधान की धारा 226 के अनुसार उसकी शक्ति उसके विवेक के अधीन है तथा कतिपय अवसरों पर उसका प्रयोग नहीं किया जाता। यदि कथित आपतितजन्य अवैध कार्य द्वारा याचिकादाता (petitioner) को कोई प्रत्यक्ष हानि न होती हो तो उच्च न्यायालय अपनी शक्ति का प्रयोग न करने के लिये भी स्वतंत्र है। इसी प्रकार यदि याचिकादाता के लिये अन्य उपयुक्त वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध है, यदि वह छलयुक्त भावना से (with unclean hands) न्यायालय में उपस्थित होता है अथवा यदि वह अनावश्यक प्रमाद का दोषी है, तो इन दशाओं में साधारणत: न्यायालय याचिकादाता को अनुतोष (relief) प्रदान करना अस्वीकार कर देगा। न्यायालय उन दशाओं में भी हस्तक्षेप करना अस्वीकार कर देगा जबकि वांछित हस्तक्षेप के परिणामहीन तथा अनावश्यक होने की संभावना हो। उन अवसरों की विस्तृत तालिका देना सर्वथा असंभव है जिन दशाओं में उच्च न्यायालय अपनी शक्ति का प्रयोग करना अस्वीकार कर सकता है। प्रत्येक मामले की परिस्थिति, प्रकृति उद्देश्य तथा शक्ति के विस्तारय को दृष्टिगत रखकर ही न्यायालय अपने न्यायिक विवेक का प्रयोग करेगा। सामान्यत: मामले से प्रत्यक्ष रूप ते सम्बन्धित व्यक्ति ही सर्वोच्च न्यायालय अथवा उच्च न्यायालयों से उनकी शक्ति के प्रयोग की याचना कर सकता है किंतु यह नियम सर्वथा निरपवाद प्रतीत नहीं होता। संविधानप्रदत्त मूलभूत अधिकारों के प्रवर्तन के लिये न्यायालय द्वारा जारी किए जानेवाले निर्देश, आदेश अथवा प्रादेश राज्य के नाम जारी किए जाते हैं। संविधान की धारा (12) में राज्य की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि संसद तथा केंद्रीय सरकार, राज्य सरकार एवं राज्य विधान मंडल, भारतीय सीमांतगत स्थित अथवा भारतीय शासन के अधीनस्थ कार्य करनेवाले सभी स्थानीय अथवा अन्य अधिकारीगण (इस व्याख्या के अनुसार) राज्य की परिधि में आते हैं। बंदी प्रत्यक्षीकरण (उच्च न्यायालय द्वारा) उस व्यक्ति विशेष के नाम भी जारी किया जा सकता है जिसकी अवैध हिरासत में कोई व्यक्ति बंदी हो। राष्ट्रपति तथा राज्यपाल के आधिकारिक कार्यों (official acts) के विरुद्ध कोई निर्देश, आदेश अथवा प्रादेश जारी नहीं किया जा सकता है जिसकी अवैध हिरासत में कोई व्यक्ति बंदी हो। राष्ट्रपति तथा राज्यपाल के आधिकारिक कार्यों (official acts) के विरुद्ध कोई निर्देश, आदेश अथवा प्रादेश जारी नहीं किया जा सकता। संविधान की धारा 329 (ब) के अनुसार भारतीय संसद् अथवा राज्य-विधान-मंडल के निर्वाचन से सम्बन्धित अधिकारी की चुनाव सम्बन्धी आज्ञाओं में उच्च न्यायालय हस्तक्षेप नहीं कर सकता। इसी प्रकार संविधान की 122 तथा 212 वीं धाराओं के अनुसार संसद् तथा विधानमंडलों के विरुद्ध, उनकी आन्तरिक गतिविधियों के मार्ग में बाधा उपस्थित कर उनकी आंतरिक कार्यवाहियों की अनियमितता तथा वैधता अवैधता की जाँच के सम्बन्ध में कोई आदेश उच्च न्यायालय जारी नहीं कर सकता। संविधान के अंतर्गत बनाए गए कानूनों द्वारा सर्वोच्च तथा उच्च न्यायालयों की शक्तियों को सीमित नहीं किया जा सकता। न्यायालयों की शक्ति की समाप्ति अथवा उनमें न्यूनता केवल संविधान में संशोधन करने के पश्चात् ही की जा सकती है। अथवा संविधान की धारा 359 (1) के अनुसार राष्ट्रपति मूलभूत अधिकारों का न्यायालयों द्वारा प्रवर्तन स्थगित कर सकता है। सारांश यह कि युद्ध अथवा बाह्य आक्रमणकाल में या देश की अथवा देश के किसी भाग की सुरक्षा खतरे में डालनेवाले किसी गृहसंकट के समय मूलभूत अधिकारों का न्यायालय द्वारा प्रवर्तन स्थगित किया जा सकता है। पर ऐसे समय में भी उच्च न्यायालयों के अधिकार प्रवर्तन की शक्ति - मूलभूत अधिकारों के प्रवर्तन की शक्ति को छोड़कर - अक्षुण्ण रहती है।
सारांश:
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