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==== ईश्वर का अभिप्राय ==== पूर्वेषामापि गुरुः कालेन्नान्च्छेद्दात् ।। (उक्त सूक्ति सामवेद से बताई जाती है) अर्थः परमात्मा (परम + आत्मा)जिसमें कर्म और गुण का संयोजन दिखता हैं आवश्यकता पूर्ति हेतु विभिन्न दैव संपदाओं(जल,वन,अग्नि) पर निर्भरता के कारण हम उन देवताओं का आराधन करते हैं। ---संड्गीत में स्वर को ईश्वर बताया गया है तो, (ईe~~+स्वर) तारतम्य सप्तक का स्वर बोला जाता है अर्थात् इईकार का स्वर जो प्रकृति मे आकाश मंडल से आता है या अनाहद नाद का लगातार बदलते हुये नये रूप में उपस्थित रहना ईश्वर के प्रत्यक्ष होने का प्रमाण है।
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