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== जीवन परिचय == श्री सीता राम गोयल का जन्म [[हरियाणा]] के एक रुढ़िवादी [[हिन्दू]] परिवार में हुआ था। किन्तु उनका बचपन [[कोलकाता]] में बीता। वे पहले [[महात्मा गांधी|गाँधीजी]] से प्रभावित थे। विद्यार्थी जीवन में उन्होंने हरिजन आश्रम के लिए काम किया। छात्रों के बीच अध्ययन केंद्र भी चलाया। बीस वर्ष के होते-होते वे [[मार्क्सवाद]] के प्रभाव में आए। उन्होंने 1944 में [[दिल्ली विश्वविद्यालय]] से इतिहास में एम.ए. किया। मेधावी छात्र के रूप में उन्हें कई पुरस्कार भी मिले। 1957 में सीताराम जी दिल्ली आ गए। कुछ समय तक [[जयप्रकाश नारायण]] के सहयोगी का भी काम किया। मार्क्सवाद और कम्युनिज्म की आलोचना से बढ़ते-बढ़ते गोयल इतिहास की ओर प्रवृत्त हुए। यह स्वभाविक था। यहाँ बौद्धिक क्षेत्र में मार्क्सवादी प्रहार इतिहास की मार्क्सवादी कीमियागिरी के माध्यम से ही हो रहा था। भारतीय मार्क्सवाद में सोवियत संघ व चीन का गुण-गान, इस्लाम का महिमामंडन तथा हिंदुत्व के प्रति शत्रुता – यही तीन तत्त्व सदैव केंद्रीय रहे। अतएव मार्क्सवादियों से उलझने वाले के लिए भी इन विषयों में उतरना लाजिमी हो जाता है। उसे हिंदुत्व के पक्ष में खड़ा होना ही पड़ता है। सीताराम जी ने भी कम्युनिज्म की घातक भूमिका, भारतीय इतिहास के इस्लामी युग, हिंदुत्व पर हो रहे इस्लामी तथा ईसाई मिशनरी हमलों के बारे में अथक रूप से लिखा। इस के लिए ही उन्होंने ‘वॉयस ऑफ इंडिया’ (हिंदी में ‘भारत-भारती’) नामक प्रकाशन संस्था कायम की जो आज भी चल रही है। 1951 से 1998 तक गोयल ने स्वयं तीस से भी अधिक पुस्तकें तथा सैकड़ों लेख लिखे। बेल्जियन विद्वान कोएनराड एल्स्ट ने नोट किया है, गोयल की बातों का या उनकी पुस्तकों में दिए तथ्यों का आज तक कोई खंडन नहीं कर सका है। उसके प्रति एक सचेत मौन रखने की नीति रही। इसीलिए उनके लेखन से हमारे आम शिक्षित जन काफी-कुछ अनजान से ही हैं। === सामाजिक कार्य === अपने विद्यार्थी जीवन में वे एक सामाजिक कार्यकर्ता थे और अपने गाँव के एक [[हरिजन]] आश्रम के लिये काम करते थे। [[आर्य समाज]], हरिजन एवं [[भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन|भारत का स्वतंत्रता संग्राम]] के लिये उनके जुड़ाव के कारण तथा [[महात्मा गांधी]] का समर्थन करने के कारण गाँव के कई लोगों से उनका बिगाड़ हो गया था।
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